Osho World Online Hindi Magazine :: June 2012
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सुमिरण सुमिरण के भेद

पहले में लगता है: गुरु-प्रांरभ; राम-पूर्णता। दूसरे में लगता हैः राम — प्रांरभ।
गुरु-पूर्णता। यह सुमिरण सुमिरण के भेद के कारण फर्क पड़ रहा है

प्रश्न: कबीर साहब का एक पद इस प्रकार थाः ‘मेरो संगी दोई जन, एक वैष्णो एक राम। यो है दाता मुक्ति का, वो सुमिरावै नाम।’ लेकिन शब्दकोश उलटते हुए मुझे एक दूसरी साखी मिली, जो कुछ और बात कहती हैः ‘हरि सुमिरै सो वार है, गुरु सुमिरै सो पार।’

आप क्या कहते है?

स्मरण स्मरण में फर्क है। एक तो स्मरण है, जो किया जाता है; और एक स्मरण है, जो होता है। उस भेद को समझा तो इन दोनों सूत्रों का विरोधाभास समाप्त हो जाएगा।

साधक जब शुरू करता है, तो प्रयास से शुरू करता है। जप करता है। न करे तो जप नहीं होगा। जप कृत्य होता है। चेष्टा करनी पड़ती है, स्मरण रखना पड़ता है, तो होता है।

फिर धीरे-धीरे जब भीतर के तार मिल जाते हैं, तो साधक को जप करना नहीं पड़ता। नानक ने उस अवस्था को अजपा-जाप कहा है। फिर जाप अपने से होता है। साधक तब साक्षी हो जाता है - सिर्फ देखता है। मस्त होता है, डोलता है। बीन अब खुद नहीं बजाता है। बीन अब बजती है। इसलिए उस नाद को अनाहत-नाद कहा है। अपने से होता है। न कोई वीणा है वहां, न कोई मृदंग है वहां, न कोई बजानेवाला है वहां, लेकिन नाद है। अपरम्पार नाद है। जिसका पारावर नहीं - ऐसा नाद है।

समझो: सदियों की खोज से यह अनुभव में आया है कि वह नाद कुछ-कुछ ऐसा होता है, जैसा-ओम्। लेकिन यह तो हमारी व्याख्या है कि ऐसा होता है। यह ऐसे ही है, जैसे कोई सूरज को उगते देखे, और कागज पर एक तस्वीर बना ले। सूरज उग रहा है कागज पर, और लाकर कागज तुम्हें दे दे और कहे कि सुबह बड़ी सुंदर थी और मैंने सोचा कि तस्वीर बना दूं, ताकि तुम्हें भी समझ में आ जाए - कैसी थी।

वह जो कागज पर तस्वीर है, उसमें न तो सूरज की गरमी है; न सूरज की किरणें है; न सूरज का सौंदर्य है। प्रतीकमात्र है। या ऐसे समझो कि जैसे तुम्हें कोई हिमालय का नक्शा दे दे। उसमें न तो हिमालय की शांति है, न हिमालय का सन्नाटा है, न हिमालय के उत्तुंग शिखर हैं, न उत्तुंग शिखरों पर जमी हुई कुंवारी बरफ है। कुछ भी नहीं है। नक्शा है। लेकिन नक्शा प्रतीक है।

ऐसे ही ओम प्रतीकमात्र है। कागज पर बनाया गया नक्शा है, उस अजपा-जाप का, जो भीतर कभी प्रगट होता है। वह ध्वनि जो भीतर अपने आप फूटती है। जिसको कबीर ‘शब्द’ कहते हैं।

तुम जब शुरू करोगे, तब तो तुम ओम्, ओम्, ओम् के जाप से शुरू करोगे। यह जाप तुम्हारा होगा। इस जाप को अगर करते गये। और गहरा होता गया यह जाप ...। गहरे का मतलब है: पहले ओंठ से होगा; फिर वाणी में होगा, लेकिन ओंठ पर नहीं आयेगा; कंठ में ही रहेगा; मन में ही गूंजेगा। फिर घड़ी आयेगी, जब मन में भी नहीं गूंजेगा, कंठ में भी नहीं होगा। तुम अपने भीतर ही उसे किसी गहन तल से उठता हुआ पाओगे।

तो एक तो जाप था, जो तुमने किया और एक जाप है, जिसे एक दिन तुम साक्षी की तरह देखोगे। ये दो सुमिरण हैं। इन्हीं दो सुमिरणों के कारण इन दो वचनों में भेद मालूम पड़ता है।

पहला वचन हैः ‘मेरो संगी दोइ जन, एक वैष्णो एक राम। कबीर कहते है: मेरे दो साथी हैं, दो मित्र हैं। एक तो राम - और एक राम का भक्त। एक तो राम - और एक राम की तरफ ले जाने वाला सदगुरु। एक तो राम - और एक राम से भरा हुआ - आपूर, आकंठ भरा हुआ व्यक्ति।

विष्णु से जो भरा है - वह वैष्णव। विष्णु जिसके रोयें-रोयें में गूंज रहा है - वह वैष्णव। तो एक तो विष्णुः राम यानी विष्णु का एक रूप। और एक वैष्णवजन - ये दो मेरे मित्र हैं।

‘यो है दाता मुक्ति का....।’ राम तो दाता - मुक्ति का, मोक्ष का। उससे तो परम प्रसाद मिलेगा। ‘वो सुमिरावै नाम’ - और वह जो वैष्णवजन हैं, जिसके भीतर सुमिरण आ गया है, उसके संग साथ बैठकर, उसकी संगति में उठ-बैठकर उसके भीतर उठती हुई तरंगें धीरे-धीरे तरंगित कर देती हैं। उसके भीतर बजती वीणा धीरे-धीरे तुम्हारे भीतर की सोई वीणा को भी जगा देती है। उसका स्वर आघात करता है और तुम्हारे भीतर सोया हुआ आनंद धीरे-धीरे जागने लगता है।

तो राम तो है मुक्ति का दाता, और गुरु है राम की सुरति दिलानेवाला।

बिना गुरु के राम नहीं मिलेगा। क्योंकि याद ही कोई न दिलायेगा, कोई इशारा ही न करेगा - अज्ञात की ओर; कोई तुम्हारा हाथ न पकड़ेगा। अनजान में न ले चलेगा तो राम नहीं मिलेगा। यद्यपि गुरु मुक्ति नहीं देता है। गुरु तो केवल राम की याद दिला देता है। फिर राम की याद करते-करते एक दिन राम अवतरित होता है; तुम्हारे भीतर जगा है और तुम रोशन हो जाते हो, तुम प्रकाशित हो जाते हो। मुक्ति फलती है।

तो गुरु तो राम की याद दिलाता है; राम मुक्ति देता है। यह तो पहले वचन का अर्थ। दूसरे वचन का अर्थ विपरीत मालूम पड़ता है। दूसरे वचन में कहा ‘हरि सुमिरै सो वार है’ - वार यानी यात्रा का प्रांरभ, पहला कदम।

‘हरि सुमिरै सो वार है, गुरु सुमिरै सो पार।’ और जो गुरु का स्मरण कर ले, वह पार ही हो जाता है। और हरि को याद करो, तो वह तो केवल यात्रा का प्रारंभ है। गुरु को याद करने से यात्रा का अंत हो जाता है। यह बात उलटी लगती है - स्वभावतः।

पहले वचन में गुरु तो केवल राम को याद दिलाता है; राम मुक्ति देता है। दूसरे वचन में राम की याद तो केवल शुरुआत है, और गुरु की याद यात्रा का अंत। पहले में लगता है: गुरु - प्रांरभ; राम - पूर्णता। दूसरे में लगता हैः राम - प्रांरभ। गुरु - पूर्णता। यह सुमिरण सुमिरण के भेद के कारण फर्क पड़ रहा है।

जब तुम परमात्मा को याद करना शुरू करोगे - बिना गुरु के - ‘हरि सुमिरै सो वार है’ तो तुमने यात्रा का प्रांरभ किया। तुम गुरु भी कैसे खोजोगे, अगर तुम हरि की याद न करो? ऐसे ही जुड़ी हैं ये बातें, जैसे अण्डा मुरगी जुड़े हैं।

कोई पूछे कि अंडा पहले कि मुरगी पहले? तो बड़ी मुश्किल हो जाती है। तय करना संभव नहीं होता। अंडा कहो पहले, तो अड़चन आती है - कि बिना मुरगी के अंडा रखा किसने होगा! मुरगी कहो पहले, तो अड़चन आती है कि मुरगी बिना अंडे के कैसे हुई होगी? मुरगी के पहले अंडा है; अंडे के पहले मुरगी है। असल में दोनों को दो करके देखने में ही उपद्रव हो गया है।

मुरगी और अंडा दो नहीं हैं। अंडा मुरगी की एक स्थिति है। और मुरगी अंडे की एक स्थिति है। जैसे तुम्हारा बचपन और तुम्हारी जवानी दो चीजें नहीं हैैं। एक की ही दो स्थितियां है। ऐसे ही मुरगी या अंडा, एक ही जीवन-यात्रा के दो चरण है।

तो पहले तुम गुरु ही क्यों खोजोगे, अगर राम का स्मरण न हो! अगर परमात्मा नहीं खोजना है, तो गुरु किसलिए खोजना है? आदमी बीमार होता है, स्वास्थ्य चाहता है, तो डॉक्टर के पास जाता है। जब आदमी को ईश्वर का अभाव खलने लगता है जीवन में, कि उसके बिना सब अंधेरा है, सब खाली-खाली है - रिक्त; उसके बिना सब बेस्वाद, तिक्त, कड़वा; उसके बिना जीवन में कोई रसधार बहती नहीं मालूम पड़ती; कोई गीत नहीं जगता, कोई नृत्य नहीं पैदा होता; जीवन एक बोझ मालूम पड़ता है, तो परमात्मा की याद आनी शुरू होती है। तो आदमी पूछता है: जीवन का अर्थ क्या है? किसने बनाया? क्यों बनाया? हम किस तरफ जा रहे हैं? यह जीवन का कारवां आखिर कहां पूरा होगा? कौन-सी मंजिल है? कहां मुकाम है - ऐसी जिज्ञासा उठती है, तो तुम गुरु की तलाश करते हो।

गुरु की तलाश के पहले तुम परमात्मा का स्मरण करते हो। वह स्मरण नाममात्र का स्मरण है। क्योंकि अभी तो परमात्मा को जानते नहीं, तो स्मरण कैसे करोगे? स्मरण तो उसी का हो सकता है, जिसे हमने जाना हो; जिसे हमने प्यार किया हो; जिससे हमारी कुछ स्मृति जुड़ी हो; जिससे हमारा कोई अनुभव का सम्बन्ध बना हो, उसकी ही याद करोगे। अभी परमात्मा का तो पता ही नहीं, तो याद कैसे करोगे?

तो यह तो नाममात्र की याद है। इतना ही पता चल रहा है कि जो जीवन है हमारा, व्यर्थ है। सार्थकता की खोज कर रहे हैं।

जैसा जीवन अभी तक जिया है, उसमें सार नहीं मालूम पड़ता। तो कोई और जीवन की शैली मिल जाए, इसकी खोज में निकले हैं। है भी ऐसी जीवन की शैली या नहीं, इसका भी कुछ पक्का नहीं है।

अभी तुम परमात्मा की याद नाममात्र को करोगे। तुम कहोगे: प्रभु की खोज है। तुम्हरा प्रभु बहुत सार्थक नहीं होगा। सिर्फ अभाव उसकी परिभाषा होगा। तुम्हें जिन-जिन चीजों की कमी मालूम पड़ती है - आनंद नहीं जीवन में, रस नहीं जीवन में, ज्योति नहीं जीवन में। तो तुम्हारे प्रभु में ये ही चीजें होंगी सब। ज्योति होगी, आनंद होगा, रस होगा। सच्चिदानंद - इसलिए हम परमात्मा को कहते हैं।

-ओशो
कहै कबीर मैं पूरा पाया
प्रवचन नं 16 से संकलित
(पूरा प्रवचन एम. पी. थ्री. पर भी उपलब्ध है)