Osho World Online Hindi Magazine :: June 2012
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स्वास्थ्य
मेडिसिन और मेडिटेशन

अंग्रेजी के शब्द मेडिसिन और मेडिटेशन दोनों एक ही मूल से आते हैं। दोनों का मूल एक ही है क्योंकि दोनों से उपचार होता है। मेडिटेशन भीतर से उपचार करती है और मेडिसिन बाहर से

चिकित्सा कोई सामान्य व्यवसाय की तरह नहीं है। उसे सिर्फ किसी टेक्नोलाज़ी की तरह मत समझो, क्योंकि उसमें तुम्हें आदमियों पर काम करना पड़ता है। जब तुम किसी व्यक्ति की चिकित्सा करते हो तो ऐसा नहीं कि तुम मशीन को ठीक कर रहे हो। केवल जानकारी सवाल नहीं है, यह प्रेम का गहरे से गहरा सवाल है।

चिकित्सक के हाथ में मनुष्य का पूरा जीवन होता है, और मनुष्य का जीवन जटिल घटना है। कभी तुम से गलती हो जाए, तो वह गलती किसी व्यक्ति के जीवन के लिए घातक हो सकती है। इसलिए जब किसी की चिकित्सा का काम अपने हाथ में लो तो पूरी तरह प्रेम से भरे हुए जाओ।

चिकित्सा के क्षेत्र में जो लोग इस तरह जाते हैं, जैसे वे इंजीनियरिंग में जा रहे हों वे लोग डॉक्टर बनने के लिए ठीक नहीं हैं--वे गलत लोग हैं। जो लोग जीवन के प्रति प्रेम से भरे हुए नहीं है, वे चिकित्सा के व्यवसाय में गलत हैं। उन्हें किसी की कोई परवाह ही नहीं होगी; वे मनुष्यों के साथ मशीनों जैसा व्यवहार करेंगे। वे मनुष्यों के साथ ऐसा व्यवहार करेंगे जैसा कोई मोटर मेकेनिक कार के साथ करता है। वे मरीज के प्राणों को तो महसूस ही नहीं कर पाएंगे। वे व्यक्ति का इलाज नहीं करेंगे, केवल उसके लक्षणों का इलाज करेंगे। यह बात अलग है कि वे जो भी करेंगे उसके प्रति वे पूरी तरह विश्वास से भरे होंगे--टेक्नीशियन को अपने काम पर विश्वास होता ही है।

लेकिन जब तुम मनुष्यों के साथ काम कर रहे हो तो तुम इतने निश्चिन्त नहीं हो सकते। वहां झिझक स्वाभाविक है। व्यक्ति कुछ भी करने से पहले दो तीन-बार सोचता है क्योंकि एक कीमती जीवन का सवाल है — जीवन जिसका सृजन नहीं किया जा सकता, जो एक बार गया तो बस गया। और हर व्यक्ति अनूठा होता है, उसकी जगह कभी भरी नहीं जा सकती, उसके जैसा कोई और न तो कभी हुआ और न होगा। चिकित्सक आग से खेल रहा होता है। झिझक स्वाभाविक है!

मरीज के प्रति श्रद्धा का भाव रखो। और उसका इलाज करते हुए दिव्य ऊर्जा के माध्यम बन जाओ। डॉक्टर ही मत बने रहो, आरोग्य ऊर्जा के माध्यम बन जाओ। बस वहां मरीज हो परमात्मा हो — तुम प्रार्थना की एक दशा में आ जाओ और परमात्मा को अपने मरीज की ओर बहने दो। मरीज तो बीमार है, वह उस ऊर्जा से संबंधित नहीं हो पा रहा। वह उस ऊर्जा से दूर पड़ गया है। वह स्वयं अपना उपचार करने की भाषा भूल गया है। वह असहाय अवस्था में है, उस पर तुम कुछ आरोपित नहीं कर सकते।

जो व्यक्ति स्वयं स्वस्थ हो, वह यदि माध्यम बन जाए तो बहुत सहयोगी हो सकता है। और यदि वह स्वस्थ व्यक्ति शरीर की संरचना के विषय में भी जानता हो तो उसकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि दिव्य ऊर्जा उसे सूक्ष्म इशारे दे सकती है। तुम्हें उन इशारों को डीकोड भर करना है। यदि तुम चिकित्साशास्त्र के विषय में जानते हो तो बहुत आसानी से उन संकेतों के अर्थ खोल सकते हो। और तब तुम मरीज के साथ कुछ नहीं करते, परमात्मा ही करता है। तुम स्वयं को परमात्मा के हाथों में उपलब्ध कर देते हो, और चिकित्सा की अपनी पूरी जानकारी को काम करने देते हो। परमात्मा की आरोग्य ऊर्जा और तुम्हारी जानकारी के मिलन से जो घटित होता है वह उपयोगी होता है। और उससे कभी नुकसान नहीं हो सकता। तो स्वयं को विदा करो: परमात्मा को होने दो। चिकित्सा के क्षेत्र में उतरो तो ध्यान भी शुरू करो।

और तुम्हें शायद पता न हो कि अंग्रेजी के शब्द मेडिसिन और मेडिटेशन दोनों एक ही मूल से आते हैं। दोनों का मूल एक ही है क्योंकि दोनों से उपचार होता है। मेडिटेशन भीतर से उपचार करती है और मेडिसिन बाहर से। पुराने समय में वैद्य और संत अलग-अलग व्यक्ति नहीं हुआ करते थे? वह एक ही व्यक्ति होता था।

-ओशो
गाड इज नॉट फॉर सेल से अनुवादित