Osho World Online Hindi Magazine :: March 2012
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जीवन का रूपांतरण
ओशो मेरा जीवन हैं

Swami Chaitanya Amritआज मैं खुद को देखता हूँ तो ऐसा महसूस होता है कि यह जीवन ओशो का है। ओशो जो हैं, देखते हैं, सुनते हैं, बताते हैं और साथ रहते हैं

मेरा नाम लोकेश कुमार गुलाटी है और मैं एक मल्टी नेशनल कंपनी में काम करता हूँ जहां विदेशी और भारतीय कानून के अनुसार जो भी शिकायतें होती हैं उन्हें बताना और उनका फालोअप करवाना होता है। कार्यालय से लौटकर मेरा समय ध्यान को समर्पित है।

जहां तक मुझे याद आता है, मैं छोटा था, तब परमात्मा का मतलब समझ में आता था, मंदिर। अपनी माताजी को कीर्तन में सम्मिलित होते देखता था तो मैं भी उनके साथ बैठता था। उनके साथ मंदिर जाना, कीर्तन करना, शाम को घर के मंदिर में जोत जलाना और रामायण के सुन्दरकाण्ड का पाठ करना, यही मेरे लिए परमात्मा को पाने का मार्ग था।

एक दिन घर के नजदीक कोई सत्संग था। मां मुझे अपने साथ वहां ले गयीं तब मैं कक्षा बारहवीं में था। वहां पहली बार मुझे ओशो के बारे में पता चला। फिर ज़ी-जागरण टी.वी. चैनल पर रात को ओशो को पहली बार देखा, उनका प्रवचन सुना। ओशो का हाथ जोड़ते हुए आना--मुझे भीतर तक छू जाता था। मेरा उनकी ओर खिंचाव बढ़ने लगा।

जब ज़ी-जागरण में यह कार्यक्रम आना बंद हुआ तो मैंने खोजबीन शुरू की। तब मुझे अंसल प्लाज़ा स्थित ओशो वर्ल्ड गैलेरिया का पता चला। वहां जाकर मैंने ओशो का विशाल साहित्य देखा और ध्यान पर कुछ किताबें खरीदीं। वहीं किसी ने मुझे बताया कि ओशो अब शरीर में नहीं हैं। तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ। मैं हर वक्त उनसे मिलने जाने की योजना बनाया करता था और शीघ्र ही उनसे मिलने पूना कम्यून जाने वाला था। मुझे शाक लगा। मेरे आंसू बहुत रोकने पर भी नहीं रुक रहे थे। मैंने उन्हें इतना ही बोला कि, मुझे लगता है, ‘‘वो’’ हैं। उन्होंने जवाब दिया, ‘‘हां, वो हैं।’’

फिर मैं ‘ध्यानयोग: प्रथम और अंतिम मुक्ति’ में बतायी गयी ध्यान-विधियों के अनुसार कुछ ध्यान के प्रयोग घर पर ही अकेले कमरे में करने लगा। एक दिन ध्यान के समय ऐसा डर महसूस हुआ कि उस पूरी रात मैं सो नहीं सका। और वह डर धीरे-धीरे बढ़ने लगा। मैं ओशो से दूर भागने लगा। लेकिन दूर होने पर बेचैन होने लगता। तब ओशो वर्ल्ड गैलेरिया में फोन करके पूछा कि, ‘‘मैं क्या करूं?’’ वहां से जवाब मिला कि ओशोधाम में होने वाले ध्यान-शिविर में जाकर आप ध्यान करें।

मैं ओशोधाम जाना चाहता था लेकिन मैं विद्यार्थी था और मेरे पास पैसों का अभाव था। तब ओशो राजयोग ध्यान केंद्र में एक पत्र लिखकर पूछा कि पैसों के बिना शिविर में किस प्रकार भाग ले सकता हूँ। वहां से एक प्यारा सा उत्तर आया कि, आने पर शुल्क तो लगेगा लेकिन कुछ किया जा सका तो जरूर किया जाएगा। कुछ दिनों बाद मेरी नौकरी लग गई। नौकरी लगते ही मैंने ओशोधाम जाकर ध्यान में हिस्सा लिया।

एक बार ओशोधाम में स्वामी सत्य वेदांत का ध्यान-शिविर लगा था। अचानक मेरा वहां जाना हुआ और उस ध्यान-शिविर को करके मुझे बहुत अच्छा लगा। फिर वर्ष 2008 में मैं प्रत्येक शिविर के लिए जाने लगा।

घर पर सब लोग मेरे, ओशो के विरोध में हो गए। मेरा जीवन बदलने लगा था। अब मैं परंपरागत पूजा-पाठ नहीं करता था। एक बार मैंने मम्मी से बात की कि आप भी मेरे साथ ओशोधाम चलो। फिर एक दिन वो राजी हो गयीं और मैं उनके साथ ओशोधाम आया। वहां किसका शिविर हो रहा है, तब यह पता नहीं था लेकिन वह शिविर मेरे लिए एक आमूल रूपांतरण वाला रहा। उसमें प्रातः ओशो के अमृत-प्रवचनों के बाद मैं लेटा तो उठ नहीं सका। कोई ध्यान-विधि वहां करवाई जा रही थी लेकिन मेरा रोआं-रोआं ओशो को पुकार रहा था। कितना समय गुज़रा यह तो अंदाजा नहीं रहा लेकिन जब मैंने बाहर आकर देखा तो बुद्धाहाल के बाहर सब कुछ वैसा नहीं लगा जैसे पहले लगा करता था। आज सब कुछ नया, धुला-धुला, साफ प्रकाशित सा था। भीतर एक गहन भाव जग रहा था। मुझे अभी संन्यास लेना है, पहले ऐसा था कि मुझे संन्यास की क्या जरूरत है? ध्यान तो बिना संन्यास लिए भी भलीभांति हो रहा है। उस दिन संन्यास की तड़प होने लगी। उस दिन संन्यास का मतलब समझ आने लगा कि जब संन्यास चाहिए होता है तो वह सांसों से ज्यादा जरूरी होता है, कि संन्यास के बिना जीना अब संभव नहीं है।

एक सप्ताह बाद, 19 फरवरी 2011 को मैं ओशो के नव-संन्यास में दीक्षित हुआ। ओशो की माला गले में पड़ते ही मैं फूट-फूट कर रोने लगा--जिससे बिछड़ा था, आज वह मिल गया है। मुझे नया नाम मिला--स्वामी चैतन्य अमृत। उस दिन मेरा नया जन्म हुआ। पुराना पीछे छूट चुका था।

आज कार्यालय से आने के बाद मेरे पास ओशो के अलावा और कहीं जाने को, कुछ करने को नहीं है। ओशो मेरा जीवन हैं। ओशो मेरे लिए सब-कुछ हैं। जैसा कि ओशो कहते हैं: "परमात्मा बरसने को राजी है, तुम पुकारो भर। वह आने को तैयार है। लेकिन तुम्हारे बिना बुलाये नहीं आएगा। तुम्हारे प्राण जब उसके लिए प्यास से पूरी तरह भर जाएंगे, तो क्षण भर देर न होगी।"

मेरा अनुभव है कि ओशो की करुणा अपार है। मैं ओशो के प्रेम में आनंदित हूँ।

नटराज ध्यान, सांध्य-सत्संग मेरे प्रिय ध्यान हैं। घर में अब विरोध की जगह सब प्रेम करते हैं। मैं खुद, मम्मी, पापा, छोटा भाई और सब संबंधियों के प्रति भीतर से विनम्र और प्रेमपूर्ण हो गया हूँ। आफिस में मित्रों के साथ मेरे हंसने की आदत की मज़ाक बनती है--ये मुझे अच्छा लगता है।

हां, एक और बात आप सब से शेयर करना चाहता हूँ। मेरे जीवन में जो बदलाव आया है उसे देखकर मेरे परिवार के लोग और मेरे नज़दीकी मित्र ओशो को प्रेम करने लगे हैं। ओशो के किसी भी कार्य से जुड़ने पर मैं स्वयं को ओशो के बहुत नज़दीक पाता हूँ।

ओशो को परिचित कराने, अपने पुराने स्कूल के छात्र-छात्राओं के पास जाना हुआ। वहां ओशो-वाणी, ओम् ध्यान आदि करवाया तो बहुत से बच्चों ने जिज्ञासा दिखाई। नई पीढ़ी ओशो के प्रति अपने हृदय को शीघ्रता से ओपन कर लेती है। मेरी उम्र अभी 24 वर्ष की है। आज हमारी पीढ़ी को ओशो की देशनाओं की सख्त जरूरत है। युवा वर्ग में स्ट्रेस है, निराशा है, भटकाव है, तक-वितर्क है, चकाचैंध है। जहां ओशो ने हमें जीवन का परम स्वीकार दिया है वहीं साथ में मार्गदर्शन भी दिया है। ओशो ‘युगपुरुष’ हैं। आधुनिक समय में ओशो ही सार्थक हैं।

ओशो के जीवन-उत्सव, ध्यान व प्रेम, आत्म-जागरण की क्रांति में हम सभी शामिल हों, ऐसी मेरी प्रार्थना है।

स्वामी चैतन्य अमृत
लोकेश कुमार गुलाटी
गुड़गांव, हरियाणा