Osho World Online Hindi Magazine :: March 2012
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ओशो का ओशनिक साहित्य

स्वर्णिम बचपन
एक बुद्धपुरुष का विद्रोही बचपन

ओशो के जीवन पर आधारित यह पुस्तक हिंदी तथा अंग्रेजी दोनों संस्करणों में प्रकाशित हुई है। अंग्रेजी में यह पुस्तक ‘ग्लिंप्सेज ऑफ ए गोल्डन चाइल्डहुड’ के नाम से उपलब्ध है। हिंदी में 50 सत्र तथा 23 प्रकरण हैं। इसके बैक कवर का एक उद्धरण यहां उल्लेखनीय हैं: ‘‘बुद्धों की जीवनी लिखी नहीं जा सकती, क्योंकि उनके जीवन के इतने रहस्यपूर्ण बेबूझ तल होते हैं कि वे सब उनके आचरण में प्रतिबिंबित नहीं होते। जीवनी होती है किसी भी व्यक्ति के आस-पास घटी हुई घटनाओं का दस्तावेज़, उन घटनाओं की व्याख्या। अब एक जाग्रत चेतना के आचरण की व्याख्या सोए लोग कैसे करें।’’
इसे ध्यान में रखकर यह किताब पढ़ी जाए, तो ओशो के बचपन की झलकें हमें हमारा अपना जीवन समझने में मदद कर सकती हैं।...

शिक्षा में क्रांति

प्रस्तुत पुस्तक ‘शिक्षा में क्रांति’ कालजयी चिंतक के विचारवान रचना-संसार का वह आईना है, जिसमें देखने पर पाठक की दृष्टि ही नहीं दृष्टिकोण ही बदल जाता है। जो हमारी सोच के आयामों को तराशता, निखारता है।
आज का मानव समाज, मानव-मन, सम्मोहित है, आतंकित है-हम भटक गये हैं, कोई दिशा बोध नहीं है। इस विघटित समाज, विघटित मन और विघटनकारी शक्तियों के बीच सामंजस्य लाने वाले, भेद से अभेद में लाने वाले, विघटन से संयोजन और योग की भूमिका निर्माण करने वाले-महायोगी ओशो ने एक वैश्विक स्तर पर विद्रोह का सूत्रपात किया और क्रांति की मशाल जलाई! विद्रोह के बाद ही क्रांति संभव है।
जहां किरणों की कविताएं खिलखिला रही हैं और आस्थाओं की ऋतुएं झिलमिला रही हैं... क्यों न हम भी अपने रीते पड़े ज्योति-कलशों को आकंठ भर लें आज! इन प्रवचनों की अमृत-धारा में प्रवेश करें, डुबकी लगाएं-इनमें बहुत अमूल्य हीरे हैं, जिनसे आप अपने जीवन को जगमगा सकते हैं। लीजिए, पूरी मंजूषा आपके हाथों में है।

लाइफ, लव, लाफ्टर: सेलिब्रेटिंग योर एक्ज़िसटेंस

दुनिया का साहित्य बाज़ार आज भरा पड़ा है उन पुस्तकों से जो आपको जीवन जीने की प्रेरणा देती हैं, आपके मन-प्राणों को उत्साहित करती हैं। लेकिन सेंट मार्टिन प्रेस द्वारा प्रकाशित ओशो के प्रवचनांशों का यह संकलन सर्वथा अनूठा व अद्वितीय है। जैसा कि इसका नाम है--जीवन, प्रेम और हास्य--यह अन्य पुस्तकों के बासी हो गए सुझावों से ऊपर उठ कर आपको 21वीं सदी के नए युग में प्रवेश करने की सर्वथा नई शैली देती है। इसमें प्रेरणा और मनोरंजन का, प्राचीन ज़ेन बोधकथाओं और आधुनिक जगत के चुटकुलों का अद्भुत संगम है, जिसे पढ़कर आप प्रसन्नता और प्रफुल्लता की शिखर अनुभूति करते हैं।
इस जीवंत माध्यम के द्वारा आप प्रज्ञा और हास्यबोध के मूलस्रोत के साथ सीधा जुड़ जाने की अनुभूति करते हैं। इस पुस्तक की पृष्ठ संख्या 192 है।


एक ओंकार सतनाम

ओशो द्वारा गुरु नानकदेव जी के जपुजी पर दिए गए बीस अमृत प्रवचनों का अपूर्व संकलन है। गुरुनानक के लोकप्रिय, गीतवाही वचन ‘जपुजी’ एक अद्वितीय काव्य है; उतना ही अद्वितीय जितनी की ओशो द्वारा की हुई उन वचनों की व्याख्या। उसे व्याख्या कहना ठीक नहीं है, मानो नानक देव इक्कीसवीं सदी में फिर प्रकट हुए और ओशो के मुख से अपने ही सूत्रों को उन्होंने नवजीवन दिया।
ओशो गुरु नानक के बारे में कहते हैं: ‘‘नानक कहते हैं, जब भी कोई मुक्त होता है, अकेला ही मुक्त नहीं होता। क्योंकि मुक्ति इतनी परम घटना है, और मुक्ति एक ऐसा महान अवसर है--एक व्यक्ति की मुक्ति भी--कि जो भी उसके निकट आते हैं, वे भी उस सुगंध से भर जाते हैं। उनकी जीवन-यात्रा भी बदल जाती है। जो भी उसके पास आ जाते हैं, वे भी उस ओंकार की धुन से भर जाते हैं। उनको भी मुक्ति का रस लग जाता है। उनको भी स्वाद मिल जाता है थोड़ा सा। और वह स्वाद उनके पूरे जीवन को बदल देता है।’’

गीता-दर्शन

ओशो ने श्रीमदभगवदगीता के अठारह अध्यायों पर अमृत-प्रवचन दिए हैं जिसके 8 खंड हैं। सद्गुरु ने इन पुस्तकों में जीवन के हर विषयों के साथ-साथ योग और ध्यान पर प्रवचन दिए हैं। प्रथम और द्वितीय भाग में विषादयोग, ‘सांख्ययोग, कर्मयोग, ज्ञान-कर्म-संन्यास-योग, कर्म-संन्यास-योग’ पर अपने अनमोल प्रवचनों को दिया है वहीं भाग तीन तथा चार में ‘आत्म-संयम-योग, ज्ञान-विज्ञान-योग, अक्षर-ब्रह्म-योग, तथा राजविद्या-राजगुह्य-योग’ पर प्रवचनों की अमृत-वर्षा की है। भाग पांच, छः तथा सात में ‘विभूति-योग, विश्वरूप-दर्शन-योग, भक्ति-योग, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विभाग-योग, पुरुषोत्तम-योग, दैव-असुर-संपद-विभाग-योग तथा आठवें भाग में श्रद्धात्रय-विभाग-योग एवं मोक्ष-संन्यास-योग में बत्तीस प्रवचन दिए हैं। ओशो का और उनके प्रवचनों का एक करिश्मा है जो गीता-दर्शन के हर एक भाग में आपको देखने को मिलेगा और एक बार उनकी एक पुस्तक हाथ में ली तो उनकी दूसरी पुस्तकों की ओर जाने की इच्छा को रोक नहीं पाएंगे।

ओशो: दि लूमिनस रेबॅल
संबुद्ध रहस्यदर्शी की जीवन-गाथा

इस पुस्तक के लेखक हैं स्वामी सत्य वेदांत (डॉ. वसंत जोशी)। यह पुस्तक अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित हुई है और इसके प्रकाशक हैं: विज़डम ट्री।
ओशो: दि लूमिनस रेबल के 19 अध्याय हैं। इसके संबंध में लेखक का कहना है कि इस पुस्तक में उन्होंने ‘दि अवेकन्ड वन-लाइफ एंड वर्क आफ भगवान श्री रजनीश (हार्पर एंड राउ द्वारा पूर्व-प्रकाशित) को भी समाहित किया है, जो 1983 में अमेरिका में प्रकाशित हुई थी।
स्वामी सत्य वेदांत के उनके अपने ही शब्द इसकी समीक्षा करने के लिए पूरी तरह सारगर्भित हैं। अंग्रेजी भाषी पाठक इस पुस्तक का आनंद लें।

मैंने राम रतन धन पाओ

यह पुस्तक मीरा-वाणी पर प्रश्नोत्तर सहित पूना में ओशो द्वारा दिए गए दस अमृत प्रवचनों का अनुपम संकलन है।
इसके प्रस्तावना में सुप्रसिद्ध कवि गोपालदास ‘नीरज’ लिखते हैं: ‘‘ओशो के अनुसार यह प्रवचन नहीं बल्कि मीरा के प्रेम की झील में नौका-विहार के लिए निमंत्रण-पत्र है। यह प्रेम की झील बड़ी अदभुत, बड़ी अनुपम है, क्योंकि यह झील पानी की नहीं, मीरा के आंसुओं का मानसरोवर है। इस मानसरोवर में जो निर्मलता है वह शायद गंगाजल में भी नहीं है।’’

कृष्ण स्मृति

ओशो द्वारा कृष्ण के बहु-आयामी व्यक्तित्व पर दी गई 21 वार्ताओं एवं नव-संन्यास पर दिए गए एक विशेष प्रवचन का अप्रतिम संकलन। यही वह प्रवचनमाला है जिसके दौरान ओशो के साक्षित्व में संन्यास ने नये शिखर को छूने के लिए उत्प्रेरणा ली और ‘नव-संन्यास अंतर्राष्ट्रीय’ की संन्यास-दीक्षा का सूत्रपात हुआ।
हिंदी साहित्य जगत के ख्याति प्राप्त कवि व कथाकार डॉ. दामोदर खड़से ने इसकी भूमिका लिखी है। उन्होंने कहा है: ‘‘ओशो की प्रखर आंखों ने कृष्ण को अपने वर्तमान के लिए देखा। दुख, निराशा, उदासी, वैराग्य जैसी बातें कृष्ण ने पृथ्वी पर नहीं कीं। पृथ्वी पर जीने वाले, उल्लास, उत्सव आनंद, गीत, नृत्य, संगीत को कृष्ण ने विस्तार दिया। कृष्ण ने इस संसार की सारी चीजों को उनके वास्तविक अर्थों में ही स्वीकार किया।’’
इस अद्भुत पुस्तक को पढ़िए और आनंदित होइए।

प्रेम पंथ ऐसो कठिन

‘‘प्रेम पंथ ऐसो कठिन’’ ओशो की यह पुस्तक निश्चित ही हमारे जीवन को, प्रेम में गिरना, प्रेम में होना, और प्रेम ही होना-प्रेम के इन तीन रूपों को स्पष्ट करते हुए ओशो इस प्रश्नोत्तर प्रवचनमाला का प्रारंभ करते हैं और प्रेम व जीवन से जुडे़ प्रश्नों की गहरी थाह में हमें गोता लगवाने लिए चलते हैं। यह एक इंद्रधनुषी यात्रा है-विरह की, पीड़ा की, आनंद की, अभीप्सा की और तृप्ति की।
ओशो ने अपने कम्यून में तथा ध्यान-केन्द्रों में सामूहिक ध्यान प्रयोगों के साथ देश भर में ध्यान-शिविरों के आयोजनों के निर्देश दिए हैं। इनसे व्यक्ति जो अकेला नहीं कर पाता, वह समूह में सहज ही संभव हो जाता है।
‘प्रेम-पंथ ऐसो कठिन’ पढ़ते-पढ़ते आप पाएंगे कि आप भी प्रेम में हो गए और आपके जीवन में प्रेम का एक नया सूर्योदय हुआ।

भारत: समस्याएं व समाधान

स्वामी सत्य वेदांत द्वारा संकलित, इस पुस्तक में संकलित ओशो के प्रवचन सभी पाठकों को ऐसी ही नयी चेतना, नयी दृष्टि और साहस प्रदान करेंगे तथा एक नए भारत, नए विश्व के निर्माण में सहयोगी बनने की क्षमता देंगे। ओशो का संदेश है: नया मनुष्य। नया मनुष्य ही एक नए जीवंत जगत के सृजन में अत्यंत आवश्यक है। ये नए भारत के भी निर्णायक क्षण हैं।
यह पुस्तक एक अपूर्व निमंत्रण है-एक ऊर्जस्वी, साहसिक, प्राणवान, जागरूक भारत के निर्माण के लिए, उस भूमिका के लिए जो भारत को विश्व के रंगमंच पर निभानी है।



सहज समाधि भली

यह पुस्तक कबीर-वाणी और झेन, सूफी तथा उपनिषद की बोधकथाओं पर ओशो द्वारा दिए गए इक्कीस अमृत-प्रवचनों का अनूठा-अपूर्व संकलन है। अस्तु, जिनके भीतर एकाग्र बुद्धि से, शांत मन से, प्रेमपूर्वक सत्य को जानने और परम तत्व को ग्रहण करने की जिज्ञासा है, वे इन प्रवचनों को अवश्य पढ़ें-सुनें। ओशो ने स्वयं कहा है कि--‘‘सत्य की प्यास है जिन्हें, उन्हीं के लिए हूं मैं, केवल उन्हीं के लिए!’’

संभोग से समाधि की ओर

प्रस्तुत पुस्तक ओशो द्वारा दिए गए जीवन-ऊर्जा रूपांतरण के विज्ञान पर अठारह प्रवचनों का अनूठा संकलन है। इसकी भूमिका विश्वविख्यात कवयित्री, लेखिका ‘अमृता प्रीतम’ ने लिखी है।
भूमिका की एक पंक्ति में उन्होंने बताया है: मैं समझती हूं कि ओशो हमारे युग की एक बहुत बड़ी प्राप्ति हैं, जिन्होंने सूरज की किरण को लोगों के अंतर की ओर मोड़ दिया, और सहज मन से उस संभोग की बात कह पाए...जो एक बीज और एक किरण का संभोग है, और जिससे खिले हुए फूल की सुगंध इंसान को समाधि की ओर ले जाती है, मुक्ति की ओर ले जाती है, मोक्ष की ओर ले जाती है।’’

सबै सयाने एकमत

संत दादू दयाल की समस्त साधना, सारे पद एक शब्द में समाए जा सकते हैं। वह शब्द है: समर्पण। इसी एकतारे की धुन पर उनकी साधना का संगीत गूंजता रहता है।
दादू का यह पूर्ण समर्पण है परमात्मा के प्रति, किसी और के प्रति नहीं। परमात्मा यानी हम जिसके अभिन्न अंग हैं, वह अस्तित्व। उस विराट अस्तित्व को जीतने की कल्पना ही मूढ़तापूर्ण है, इस गहरी समझ से निकला है यह समर्पण। यह समझ पैदा होते ही जीने का सारा तनाव ही खो जाता है।
और प्रारंभ में दीन-हीन, असहाय और दीवाने से दिखने वाले दादू अंत में यह शक्तिशाली उदघोष करते हैं कि:
जे पहुंचे ते कहि गए, तिनकी एकै बात।
सबै सयाने एकमत, उनकी एकै जात।।
अब प्रेम तो बिलकुल ही प्रायोगिक और अनुभव करने की बात है। फिर भी ओशो प्रेम के सूक्ष्म पहलुओं का साधकों के लिए प्रकटीकरण करते हैं। क्योंकि हमने प्रेम की क्षमता ही खो दी है। और संत जिस प्रेम की बात करते हैं उसकी तो परछाईं भी हम पर कभी पड़ी नहीं है। इसीलिए यह विवेचन बड़ा महत्वपूर्ण है।
शायद उस अज्ञात लोक की चर्चा सुन कर हम उसकी खोज में निकल पड़ें।

उपनिषद का मार्ग और अनंत से अनंत की ओर

अंग्रेज़ी भाषा में दिए गए ओशो के प्रवचनों की पुस्तक ओशो उपनिषद अनूदित होकर हिंदी में दो खंडों में प्रकाशित हुई है; इनके नाम हैं: उपनिषद का मार्ग, अनंत से अनंत की ओर। मनोज पब्लिकेशन्स इसके प्रकाशक हैं।
22 प्रवचनों का यह खंड पहले प्रवचन ‘रहस्यशाला: चमत्कार से एक भेंट’ से शुरू होकर अंतिम प्रवचन ‘एक अंतहीन यात्रा’ पर समाप्त होता है। ध्यान और समाधि का रहस्यमय लोक शुरू तो होता है लेकिन कभी खत्म नहीं होता। इसलिए इसके दूसरे खंड का नाम भी सर्वथा उपयुक्त है: अनंत से अनंत की ओर। तथा उपशीर्षक है: चरैवेति चरैवेति।



प्रेम-योग और आनंद-योग

लखनऊ के दिव्यांश पब्लिकेशन्स ने ओशो की पांच नयी पुस्तकों का प्रकाशन किया है; हिंदी पाठकों के लिए ये पुस्तकें नयी हैं क्योंकि ये ओशो की अंग्रेज़ी पुस्तकों का अनुवाद हैं। ये पुस्तकें हैं: मनुष्य होने की कला, एक नयी मनुष्यता का जन्म, भविष्य की आधारशिलाएं, प्रेम योग तथा आनंद योग। इनके अतिरिक्त मौलिक हिंदी प्रवचनों की पुस्तकें हैं: साक्षी की साधना, दीपक बारा नाम का, प्रेम की झील में अनुग्रह के फूल तथा अंतर्वीणा।
पहली पांच पुस्तकों के अनुवादक हैं: स्वामी ज्ञान भेद।
यह पुस्तकें सजिल्द तथा पेपरबैक संस्करणों में पूरी सुंदरता के साथ प्रकाशित की गई हैं।
प्रेम योग तथा आनंद योग बाउल फकीरों पर ओशो-प्रवचनों, दि बिलविड, पहले और दूसरे खंड का हिंदी अनुवाद है।

महावीर या महाविनाश

ओशो द्वारा महावीर की देशनाओं पर दिए गए ग्यारह अमृत प्रवचनों का अभूतपूर्व संकलन है।
महावीर की क्रांति इसी बात में है कि वे कहते हैं: ‘‘कोई हाथ ऐसा नहीं है जो तुम्हें आगे बढ़ाए। और किसी काल्पनिक हाथ की प्रतीक्षा में जीवन को व्यय मत कर देना। कोई सहारा नहीं है सिवाय उसके, जो तुम्हारे भीतर है और तुम हो। कोई और सुरक्षा नहीं है, कोई और हाथ नहीं है जो तुम्हें उठा लेगा, सिवाय उस शक्ति के जो तुम्हारे भीतर है।’’
प्यारे पाठकों, महावीर पर दिए गए ओशो-प्रवचनों को पढ़िए और आनंदित होइए।

प्रेम का शिखर

यह पुस्तक ओशो द्वारा ‘जो बोलैं तो हरिकथा’ में दिए गए 11 प्रश्नोत्तर में से 6-11 प्रवचनों का संकलन है।
इस पुस्तक में ओशो ने धर्म के रहस्यवाद्, धर्म और सद्गुरु, ध्यान-प्रेम-समर्पण, जीवन्त अद्वैत, प्रेम से धर्म के शिखर तक की विस्तार से चर्चा की है।
‘प्रेम का शिखर’ पढ़ते हुए आप पाएंगे कि आप भी प्रेम के उस शिखर पर पहुंचकर नए हो गए और आपके जीवन में प्रेम का एक नया प्रारंभ हुआ।




कोंपलें फिर फूट आयीं

‘कोंपलें फिर फूट आयीं’ ओशो की प्रवचनमाला अब दो संस्करणों में प्रकाशित हुई है--पेपरबैक और सजिल्द।
इसमें प्रवेश के पूर्व है: ओशो प्रवचनांश--ध्यान का परम ऐश्वर्य। ‘‘तुमने पूछा है: मैं कैसे अपने अचेतन, अपने अंधेरे को प्रकाश से भर दूं?
एक छोटा सा काम करना पड़ेगा। बहुत छोटा सा काम।
चैबीस घंटे तुम दूसरे को देखने में लगे हो--दिन में भी और रात में भी। कम से कम कुछ समय दूसरे को भूलने में लगो। जिस दिन दूसरे को बिलकुल भूल जाओगे, बुद्धि की उपयोगिता नष्ट हो जाएगी।’’
उसके बाद आत्म-साक्षात्कार की कोंपलें फूटने लगेंगी।

शिव-सूत्र

ओशो जैसे परम प्रज्ञावान सद्गुरु ने अपनी अमृतवाणी से धर्म और अध्यात्म संबंधी अनेक गूढ़ रहस्यों को उद्घाटित किया है तथा संसार के अनेक मुमुक्षुओं को मार्गदर्शन दिया है। उनके वचन हैं--‘जहां क्रांति न हो, समझना ज्ञान नहीं है। ज्ञान अग्नि की भांति है--प्रज्वलित अग्नि की भांति। और जो ज्ञान से गुजरेगा, वह अग्नि से जलकर कुंदन हो जाता है।’
‘शिव-सूत्र’ ऐसी ही क्रांति के सूत्र हैं। ओशो कहते हैं, ‘शिव कोई पुरोहित नहीं हैं। शिव तीर्थंकर हैं। शिव अवतार हैं। शिव क्रांतिद्रष्टा हैं, पैगंबर हैं। वे जो भी कहेंगे, वह आग है। अगर तुम जलने को तैयार हो, तो ही उनके पास आना; अगर तुम मिटने को तैयार हो, तो ही उनके निमंत्रण को स्वीकार करना। क्योंकि तुम मिटोगे तो ही नये का जन्म होगा। तुम्हारी राख पर ही नये जीवन की शुरुआत है।
लेकिन इन सूत्रों के क्रांतिकारी होने से भी कहीं अधिक उल्लेखनीय बात यह है कि ओशो जैसे क्रांतदर्शी बुद्धपुरुष ने इन चिनगारियों में नये प्राण फूंके हैं। एक नये जीवन की दिशा, एक नये मनुष्य के जन्म के संदर्भ में ओशो के ये अमृत वचन चेतना के रूपांतरण की भूमिका हैं।
ओशो द्वारा प्रकटाए हुए स्फुलिंग हम सब की चेतना को प्रज्वलित करें और हमारे यात्रापथ को प्रकाशमान करें, इसी प्रर्थना के साथ प्रस्तुत है ‘शिव-सूत्र’।

बीइंग इन लव
हाउ टू लव विद अवेयरनेस एन्ड रिलेट विदाउट फीयर

इस पुस्तक का प्रकाशन हुआ है रैंडम हाउस द्वारा। ओशो के विशाल साहित्य से चुने हुए ये प्रवचनांश प्रेम के संबंध में हमारी समझ पर प्रश्न खड़े करते हैं तथा नयी संभावनाओं के द्वार खोलते हैं। ऐसी संभावनाएं जिनमें हम ईर्ष्या, द्वेष, मालकियत के भाव से मुक्त होकर स्वतंत्रता के आकाश में उड़ने के समर्थ होते हैं।
अपनी अनूठी प्रज्ञापूर्ण, हास्य-व्यंगात्मक शैली में ओशो हमें एक नया साहस प्रदान करते हैं, जिसके माध्यम से हम अपने अस्वस्थ संबंधों की जांच करें, उनकी यांत्रिकता से ऊपर उठें और प्रामाणिक प्रेम को पुनः उपलब्ध करें।
प्रेम के संबंध में अनेक प्रश्न हैं, गुत्थियां हैं। ओशो के इन प्रवचनों में उनको उठाया और सुलझाया गया है। यह पुस्तक निम्नांकित विषयों को छूती है--
आसक्ति से मुक्त प्रेम
अपेक्षाओं, नियमों तथा मांगों का विसर्जन
अकेलेपन के भय से कैसे मुक्त हों
अपने संबंधों में पूर्ण उपस्थिति
अपने प्रेम को ताज़ा और जीवंत रखें
ऐसे व्यक्ति के जीवन-साथी बनें जिसके साथ निरंतर विकास और परिवर्तन हो
अपने अहंकार का समर्पण करें ताकि प्रेम के प्रति समर्पण हो सके
निश्चित ही पुस्तक आपको प्रेम के उन आयामों की स्पष्टता देगी जो अभी तक आपके लिए अस्पष्ट बने हुए हैं। आप प्रेम की एक नयी ताज़गी और जीवंतता का अनुभव करेंगे।

कैवल्य उपनिषद
जो पास ही है उसे कहां दूर खोजने चले

ओशो के अनंत-अनंत फूल झरे हैं, झरते ही जा रहे हैं, झरते ही जा रहे हैं...उनका एक-एक शब्द परम सुगंध का एक जगत है। माउंट आबू की सुरम्य पहाड़ियों में ऐसे ही एक अनूठे फूल के रूप में प्रगटा कैवल्य उपनिषद, जिसमें शाश्वत की सत्रह पंखुड़ियां हैं। अपूर्व है ओशो की भगवत्ता का यह आयाम, जो माउंट आबू की विभिन्न ध्यान-योग शिविरों के रूप में देखने-सुनने-चखने को मिला।
कैवल्य उपनिषद की व्याख्या पढ़ कर हम भले ही कैवल्य, मोक्ष या मुक्ति प्राप्त न कर पाएं किंतु यह निश्चित है कि अपने तथाकथित ज्ञान की मूर्खतापूर्ण पर्तों से, जो हमारे असंस्कृत संस्कारों ने सदियों से हमारी विवेक ग्रंथियों पर गढ़ दी है, अवश्य मुक्ति पा जाएंगे और उपनिषद प्रणेता ऋषियों द्वारा गाए हुए मंत्रों के संगीत की ध्वनि को ठीक रूप से सुन सकेंगे। अन्य ग्रंथों की तरह ‘‘कैवल्य उपनिषद’’ भी आस्वाद्य है, उसका स्वाद लिया जा सकता है, उसे चखा जा सकता है, उसे हृदयंगम किया जा सकता है।

सर्वसार उपनिषद
स्वर्ण मंदिर उभर आए जो लौट कर पीछे देखा कभी

‘‘उपनिषद शब्द का अर्थ होता है: गुरु के पास बैठ कर जो मिला--सिर्फ पास बैठ कर--उसकी सन्निकटता में, उसके सामीप्य में, उसके प्रति समर्पण में, उसके प्रेम में, उसके पास मिट कर, उसके पास अपने को भूल कर जो मिला।’’
‘‘सर्वसार उपनिषद का अर्थ है: जो भी आज तक जाना गया गुह्य ज्ञान है, इसोटेरिक नॉलेज है, उसमें भी जो सारभूत है--जिसमें से रत्ती भर भी छोड़ा नहीं जा सकता, वैसा यह उपनिषद है।’’
‘‘इस एक उपनिषद को जान लेने से मनुष्य की प्रतिभा ने जो भी गहनतम जाना है, उस सबके द्वार खुल जाते हैं। इसलिए इसका नाम है: ‘सर्वसार’--दि सिक्रेट ऑफ दि सिक्रेट्स; गुह्य में भी जो गुह्य है और सार में भी जो सार है।’’

-ओशो

करेज
दि जॉय ऑफ लिविंग डेंज्रसली

ओशो की पुस्तक ‘करेज--दि जॉय ऑफ लिविंग डेंज्रसली’--न्यूयार्क की प्रसिद्ध प्रकाशन संस्था सेंट मार्टिन प्रेस द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक उन सभी ध्यानी साधकों के लिए एक महत्वपूर्ण पुस्तक है जो अपनी ध्यान-साधना का शुभारंभ कर रहे हैं अथवा साधना पथ पर आगे बढ़ रहे हैं। यह पुस्तक सबके लिए पाथेय की भूमिका निभाती है।
इसकी भूमिका में जीवन के संबंध में दो बिंदु एक ऐसा दृष्टिकोण अपनाने को कहते हैं जो जीवन को एक ठोस आधार देता है: (1) अनिश्चितता न कहें--विस्मय कहें। (2) असुरक्षा न कहें--स्वतंत्रता कहें। शिवसूत्र में भी विस्मय को योग की भूमिका कहा गया है। और असुरक्षा में जीना संन्यास का मूल सूत्र है, ओशो ने जिसकी चर्चा अपने सैकड़ों प्रवचनों में की है। संन्यास के लिए साहस और स्वतंत्रता मुख्य बिंदु हैं।
200 पृष्ठों की पेपरबैक पुस्तक में इस विषय पर ओशो के महत्वपूर्ण प्रवचनांशों के अतिरिक्त कुछ विशेष प्रश्नोत्तर भी संकलित किए गए हैं तथा भयमुक्त होने के लिए ध्यान-प्रयोग भी।

मिट्टी के दीये

प्रस्तुत पुस्तक ओशो द्वारा लिखी गई 59 बोधकथाओं का अनूठा-संकलन है।
इसकी भूमिका भी ओशो द्वारा ही रचित है जिसके कुछ अंश यहां उल्लेखनीय हैं--‘‘वह देखते हो? उस दीये को देखते हो? मिट्टी का मर्त्य दीया है, लेकिन ज्योति तो अमृत की है। दीया पृथ्वी का--ज्योति तो आकाश की है। जो पृथ्वी का है, वह पृथ्वी पर ठहरा है, लेकिन ज्योति तो सतत अज्ञात आकाश की ओर भागी जा रही है। ऐसे ही मिट्टी की देह है मनुष्य की, किंतु आत्मा तो मिट्टी की नहीं है। वह तो मर्त्य दीप नहीं, अमृत ज्योति है। किंतु अहंकार के कारण वह भी पृथ्वी से नहीं उठ पाती है।
परमात्मा की ओर केवल वे ही गति कर पाते हैं, जो सब भांति स्वयं से निर्भार हो जाते हैं।’’



जीवन रहस्य

‘‘धर्म विज्ञान है जीवन के मूल स्रोत को जानने का। धर्म मेथडोलाजी है, विधि है, विज्ञान है, कला है उसे जानने का जो सच में जीवन है। वह जीवन जिसकी कोई मृत्यु नहीं होती। वह जीवन जहां कोई दुख नहीं है। वह जीवन जहां न कोई जन्म है, न कोई अंत। वह जीवन जो सदा है और सदा था और सदा रहेगा। उस जीवन की खोज धर्म है। उसी जीवन का नाम परमात्मा है। परमात्मा कहीं बैठा हुआ कोई आदमी नहीं है आकाश में। परमात्मा समग्र जीवन का, टोटल लाइफ का इकट्ठा नाम है। ऐसे जीवन को जानने की कला है धर्म।’’
यह पुस्तक जीवन के विभिन्न पहलुओं पर ओशो द्वारा दिए गए तेरह प्रवचनों का संकलन है।

वर्क इज़ लव मेड विज़िबल

अंग्रेजी भाषा में यह नव-प्रकाशित पुस्तक ओशो के कार्य के प्रचार-प्रसार में संलग्न कार्यकताओं के साथ ओशो की लोनावला, नारगोल, मुंबई तथा माथेरान में हुई 14 अंतरंग चर्चाओं का अनूठा संकलन है।
हिंदी के पाठक इन प्रवचनों को ‘अनंत की पुकार’ में पढ़ सकते हैं। इस पुस्तक की पृष्ठ संख्या 257 है। ‘अनंत की पुकार’ पुस्तक का यह उद्धरण उल्लेखनीय है: ‘‘आनंद को कोई खोज नहीं सकता। न ही आनंद कहीं मिलता है कि कोई चला जाए और भर लाए। न ही आनंद कोई दे सकता है किसी को। लेकिन दुख को हम खोजते हैं, दुख को हम इकट्ठा करते हैं, दुख की हम गांठ बांध लेते हैं और दुखी होते रहते हैं।’’

अमृत कण

ओशो की अमृत अनुभूति के विराट गंगा-सागर में से कुछ अमृत बूंदे चुन कर इस छोटी सी पुस्तिका में समाहित की गई हैं। हैं तो ये अमृत कण लेकिन इसके एक-एक अणु में समाया है अहसास का असीम सागर: समुंद समाना बुंद में। ये वे अणु हैं, परमाणु हैं, जो चैतन्य के परम विस्फोट से प्रस्फुटित हुए हैं।
इसलिए आप अब यह पुस्तिका अपने हाथ में लें तो थोड़ा ठहर जाना, पृष्ठ पलट कर पढ़ने के पूर्व, थोड़ा आंख बंद कर लेना, स्थितप्रज्ञ हो जाना-और फिर आहिस्ता से, अपनी पूर्ण उपस्थिति के साथ इसके एक-एक वाक्य, एक-एक शब्द का अध्ययन करना, उस पर अवधान करना। आप पाएंगे कि दो शब्दों के मध्य, दो वाक्यों के दरमियां अमृत की एक अंतर्धारा प्रवाहमान है। इसकी अनुभूति से आपके अंतस में ये अमृत कण चुपके से, हौले से प्रविष्ट होने लगेंगे। निस्तब्धता की भाव-भूमि में इनका रोपण होगा। आपको अहसास होगा कि आपके भीतर कुछ रूपांतरित हो रहा है, एक नया जीवन-बोध प्रस्फुटित हो रहा है, प्राण कुछ विस्तीर्ण हो रहे हैं।
अमृत कण के अध्ययन के दौरान जब लगे कि मन वापस लौट आया है और फिर आप किसी जल्दबाजी में पड़ गए हैं, तो पुनः पुस्तक को बंद करके थोड़ी देर के लिए आंख बंद कर लेना और फिर से स्थितप्रज्ञ होकर, स्थिर चित्त-दशा में इन्हें पढ़ना। आप पाएंगे कि पुनः आपका अमृतधारा से संपर्क सध गया है, फिर आप शब्दों के मध्य में बह रही अंतर्धारा के चैतन्य-प्रवाह से जुड़ गए।
पुनः-पुनः इन सूत्रों का रसास्वादन एक आत्यंतिक रूपांतरण बन सकता है। ये अमृत अणु परम विस्फोट की प्रक्रिया बन सकते हैं। वह जो जन्मों-जन्मों की अमृत प्यास है उसे जाग्रत करने और संतृप्त करने के लिए ये बीज-मंत्र हैं: तृषा गई एक बूंद से!
आओ, इन अमृत बूदों को चखें।
आओ, इन परम अणुओं की अमृत प्रयोगशाला में प्रवेश करें।

कहै कबीर दीवाना

यह पुस्तक ओशो द्वारा कबीर-वाणी पर प्रश्नोत्तर सहित दिए गए बीस अमृत प्रवचनों का संकलन है। ओशो कहते हैं: ‘कबीर अपने को खुद कहते हैं: ‘कहै कबीर दिवाना।’’ एक-एक शब्द को सुनने की, समझने की कोशिश करो। क्योंकि कबीर जैसे दीवाने मुश्किल से कभी होते हैं। उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। और उनकी दीवानगी ऐसी है, कि तुम अपना अहोभाग्य समझना अगर उनकी सुराही की शराब से एक बूंद भी तुम्हारे कंठ में उतर जाए। अगर उनका पागलपन तुम्हें थोड़ा सा भी छू ले तो तुम स्वस्थ हो जाओगे। उनका पागलपन थोड़ा सा भी तुम्हें पकड़ ले, तुम भी कबीर जैसे नाच उठो और गा उठो, तो उससे बड़ा कोई धन्यभाग नहीं। वही परम सौभाग्यशाली है। सौभाग्यशालियों को ही उपलब्ध होता है।’’

साक्षी की साधना

ध्यान साधना शिविर, अमरावती एवं तुलसीश्याम में ध्यान-प्रयोगों एवं प्रश्नोत्तरों सहित ओशो द्वारा दिए गए तेरह अमृत प्रवचनों का अपूर्व संकलन।
‘‘साक्षी बनते ही चेतना दृश्य को छोड़ द्रष्टा पर स्थिर हो जाती है। इस स्थिति में अकंप प्रज्ञा की ज्योति उपलब्ध होती है। और यही ज्योति मुक्ति है।’’

-ओशो

योग: नये आयाम

‘‘योग एक विज्ञान है, कोई शास्त्र नहीं है। योग के अतिरिक्त जीवन के परम सत्य तक पहुंचने का कोई उपाय नहीं है। योग जीवन सत्य की दिशा में किए गए वैज्ञानिक प्रयोगों की सूत्रवत प्रणाली है।
योग विज्ञान है, विश्वास नहीं। योग की अनुभूति के लिए किसी तरह की श्रद्धा आवश्यक नहीं है। योग के प्रयोग के लिए किसी तरह के अंधेपन की कोई जरूरत नहीं है। नास्तिक भी योग के प्रयोग में उसी तरह प्रवेश पा सकता है जैसे आस्तिक।’’

-ओशो

योग: नए आयाम, यह पुस्तक ओशो द्वारा दिए गए छह अमृत प्रवचनों का अपूर्व संकलन है।

मैं धार्मिकता सिखाता हूं धर्म नहीं

हमारे युग के सर्वाधिक मौलिक क्रांतिद्रष्टा ओशो की आधारभूत देशना ‘धर्म नहीं, धार्मिकता’ पर दिए गए 22 प्रवचनांशों का एक अप्रतिम संकलन।

बिन बाती बिन तेल

सूफी, झेन व उपनिषद की कहानियों एवं बोध-कथाओं पर ओशो की वाणी जो कथाओं के मर्म में उतरती है और उनके एक-एक पहलू को मार्ग प्रशस्त करने वाला दीपक बना देती है। यह पुस्तक पुणे में ओशो द्वारा दिए गए सुबोधगम्य उन्नीस अमृत-प्रवचनों का अपूर्व संकलन है।

ध्यानयोग: प्रथम और अंतिम मुक्ति

प्रस्तुत पुस्तक ओशो द्वारा ध्यान पर दिए गए गहन प्रवचनों का संकलन है। इसमें ध्यान की अनेक विधियों का वर्णन है जो हमारी सहायता कर सकती हैं उन आयाम का अन्वेषण करने में जिसे उन्होंने कहा: ‘‘ध्यानयोग--प्रथम और अंतिम मुक्ति।’’ इस पुस्तक को ध्यान के लिए मार्ग-दर्शक की भांति उपयोग करने के लिए आपको इसे प्रथम से अंतिम पृष्ठ तक पढ़ना जरूरी है। कोई विधि आजमाने के लिए इस पुस्तक का उपयोग अंतरप्रेरणा से करें।

इस पुस्तक के माध्यम से आप आमंत्रित हैं आपने अंतस आकाश का अनुभव करने के लिए।

ध्यान विज्ञान
ध्यान में प्रवेश की 115 सहज विधियां

700 पुस्तकों में संकलित ओशो के हजारों प्रवचन में अगर आप जानना चाहें कि उनकी अंतर्धारा क्या है, मूलधारा क्या है, तो उसका एक ही सटीक उत्तर है: ध्यान। हम ओशो से कुछ भी पूछें, अथवा वे किसी भी विषय पर क्यों न बोलें, ओशो हमें पुनः-पुनः एक ही मूल बिंदु पर ले आते हैं: ध्यान।
ओशो की यह पुस्तक आपको आनंद के विस्मय-लोक में प्रवेश के लिए एक निमंत्रण है।



दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं

मा धर्म ज्योति ने एक लंबे अरसे तक ओशो की शारीरिक मौजूदगी को जीया है। और अपने इस सफर में वो पल-पल उन लमहों को सहेजती रहीं जो ओशो के छुए से जिंदा होते रहे। ये लमहे बाहर तो इंद्रधनुषी आंसू बरसाते रहे और खुद भीतर जाकर सीप के मोती बनते रहे। यह शरीर के पार जाने वाले प्रेम का ही तिलस्म है कि एक दिन अचानक इन मोतीयों में भी अंकुर फूट आए और गाथाओं का एक वृक्ष बन गए--सौ गाथाएं; दस हजार बुद्धों के लिए।
आइए कुछ देर इन गाथाओं की हवा में जी लें। कुछ देर इनकी खुशबू को अपने दिल में महसूस कर लें। आखिर, ये मोती हम सब ही की तो प्यास हैं।

अमृत की दिशा

इस पुस्तक में ओशो हमें एक दिशा देते हैं--साहस की दिशा। साहस-उधार के विश्वासों से मुक्त होने का। साहस-तथ्यों को आर-पार देखने का। साहस--आत्म-जागरण के मार्ग पर चलने का। साहस-आनंदित होने का।
साथ ही चर्चा है मनुष्य के कई प्रश्नों पर:
चित्त कैसे स्वत्रंत हो?
सत्य शास्त्रों में नहीं, तो कहां है?
पाप क्या है? क्या है उसका मूल?
अंतःसंघर्ष को कैसे मिटाएं?

अपने माहिं टटोल
मनुष्य के बंधन और उनसे मुक्ति के उपाय

‘मेरा होना सबसे बड़ा भ्रम है। मैं हूं, यह मनुष्य के जीवन का केंद्रीय भ्रम है, केंद्रीय असत्य है। और इसी असत्य के आस-पास वह जीता है।’

-ओशो

प्रस्तुत पुस्तक ध्यान साधना शिविर, उदयपुर में ओशो द्वारा दिए गए दस अमृत प्रवचनों का अप्रतिम संकलन है।

ध्यान-सूत्र
ध्यान है तो सब है, ध्यान नही तो कुछ भी नहीं

महाबलेश्वर के प्राकृतिक वातावरण में ओशो द्वारा संचालित ध्यान शिविर के दौरान हुए प्रवचनों व ध्यान प्रयोगों का संकलन है यह पुस्तक। शरीर, विचारों और भावों की एक-एक पर्त से ग्रंथियों को विलीन करने की कला समझाते हुए, ओशो हमें समग्र स्वास्थ्य और संतुलन की ओर लिए चलते हैं।

अनहद में बिसराम

‘‘जात हमारी ब्रह्म है, माता-पिता है राम।
गिरह हमारा सून्न में, अनहद में बिसराम।।

दरिया कहते हैं: एक ही बात याद रखो कि परमात्मा के सिवा न हमारी कोई माता है, न हमारा कोई पिता है। और ब्रह्म के सिवाय हमारी कोई जात नहीं। ऐसा बोध अगर हो, तो जीवन में क्रांति हो सकती है।’’

-ओशो