Osho World Online Hindi Magazine :: March 2012
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रहस्यदर्शियों पर ओशो

भूरिबाई

प्रश्न: ओशो,
चुप साधन, चुप साध्या, चुप मा चुप्प समाय।
चुप समझारी समझ है, समझे चुप हो जाय।।
भूरिबाई के इस कथन पर कुछ कहने की अनुकंपा करें।

भूरिबाई से मेरे निकट के संबंध रहे हैं। मेरे अनुभव में हजारों पुरुष और हजारों स्त्रियां आये, लेकिन भूरिबाई अनूठी स्त्री थी। अभी कुछ समय पहले ही भूरिबाई का महापरिनिर्वाण हुआ, वह परम मोक्ष को उपलब्ध हुई। उसकी गणना मीरा, राबिया, सहजो, दया--उन थोड़ी-सी इनी-गिनी स्त्रियों में करने योग्य है। मगर शायद उसका नाम भी कभी न लिया जायेगा, क्योंकि बेपढ़ी-लिखी थी; ग्रामीण थी; राजस्थान के देहाती वर्ग का हिस्सा थी। लेकिन अनूठी उसकी प्रतिभा थी। शास्त्र जाने नहीं और सत्य जान लिया!

मेरा पहला शिविर हुआ, उसमें भूरिबाई सम्मिलित हुई थी। फिर और शिविरों में भी सम्मिलित हुई। नहीं ध्यान के लिए, क्योंकि ध्यान उसे उपलब्ध था--बस, मेरे पास होने का उसे आनंद आता था। एक प्रश्न उसने पूछा नहीं, एक उत्तर मैंने उसे दिया नहीं। न पूछने को उसके पास कुछ था, न उत्तर देने की कोई जरूरत थी। मगर आती थी, तो अपने साथ एक हवा लाती थी।

पहले ही शिविर से उससे मेरा आंतरिक नाता हो गया। बात बन गयी! कही नहीं गयी, सुनी नहीं गयी--बात बन गयी! पहले प्रवचन में सम्मिलित हुई। उस शिविर की ही घटनाएं और बातों का संकलन ‘साधना-पथ’ नाम की किताब है, जिसमें भूरिबाई सम्मिलित हुई थी।

पहला शिविर था, पचास व्यक्ति ही सम्मिलित हुए थे। दूर राजस्थान के एक एकांत निर्जन में, मुछाला महावीर में। भूरिबाई के पास हाईकोर्ट के एक एडवोकेट, कालिदास भाटिया, उसकी सेवा में रहते थे। सब छोड़ दिया था--वकालत, अदालत। भूरिबाई के कपड़े धोते, उसके पैर दबाते। भूरिबाई वृद्ध थी, सत्तर साल की होगी। भूरिबाई आयी थी। कालिदास भाटिया आये थे, और दस-पंद्रह भूरिबाई के भक्त आये थे। कुछ थोड़े-से लोग उसे पहचानते थे। उसने मेरी बात सुनी। फिर जब ध्यान के लिए बैठने का मौका आया, तो वह अपने कमरे में चली गयी। कालिदास भाटिया हैरान हुआ कि ध्यान के लिए ही तो हम यहां आये हैं। तो वे गये भागे, भूरिबाई को कहा कि ‘बात तो इतने गौर से सुनी, अब जब करने का समय आया, तो आप उठ क्यों आयीं?’ तो भूरिबाई ने कहा, ‘तू जा, तू जा! मैं समझ गयी बात।’

कालिदास बहुत हैरान हुए कि अगर बात समझ गयी, तो ध्यान क्यों नहीं करती! मुझसे पूछा आ कर कि ‘मामला क्या है, माजरा क्या है! भूरिबाई कहती है, बात समझ गयी, फिर ध्यान क्यों नहीं करती? और मैंने उससे पूछा तो कहने लगी, तू जा, बापजी से ही पूछ ले!’

भूरिबाई सत्तर साल की थी, मुझसे ‘बापजी’ कहती थी...‘कि तू बापजी से ही पूछ ले। तो मैं आपके पास आया हूं’, कालिदास बोला। ‘वह कुछ बताती भी नहीं; मुस्कुराती है! और जब मैं आने लगा तो कहने लगी--तू कुछ समझा नहीं रे! मैं समझ गयी।’

तो मैंने कहा, ‘वह ठीक कहती है, क्योंकि ध्यान मैंने समझाया--अक्रिया है। और तूने जा कर उससे कहा कि भूरिबाई, ध्यान करने चलो! तो वह हंसेगी ही, क्योंकि ध्यान करना क्या! जब अक्रिया है, तो करना कैसा! और मैंने समझाया कि ध्यान है चुप हो जाना, सो उसने सोचा होगा भीड़-भाड़ में चुप होने की बजाय अपने कमरे में चुप होना ज्यादा आसान है। इसलिए ठीक समझ गयी वह। और सच यह है कि उसे ध्यान करने की जरूरत नहीं है। चुप का उसे पता है, हालांकि वह उसको ध्यान नहीं करती, क्योंकि ध्यान शास्त्रीय शब्द हो गया। वह सीधी-सादी गांव की स्त्री है।’

जब वह वहां से लौट कर गयी शिविर के बाद, तो उसने यह सूत्र अपनी झोपड़ी पर किसी से कहा था कि लिख दो।

तुम्हें कहां से इस सूत्र का पता चला!

चुप साधन, चुप साध्या, चुप मा चुप्प समाय।

चुप समझारी समझ है, समझे चुप हो जाय।।

चुप ही साधन है; चुप ही साध्य है। और चुप में चुप ही समा जाता है। ‘चुप समझारी समझ है’। अगर समझते हो, समझना चाहते हो तो बस एक ही बात समझने योग्य है--चुप। ‘समझे चुप हो जाय’। और समझे कि चुप हुए। कुछ और करना नहीं है। चुप समझारी समझ है’।

उसके शिष्यों ने मुझसे कहा कि ‘हमारी तो सुनती नहीं, आप बाई को कह दो, आपकी मानेगी, आपका कभी इनकार न करेगी। आप जो कहोगे, करेगी। आप इससे कहो कि अपने जीवन का अनुभव लिखवा दे। लिख तो सकती नहीं, क्योंकि बेपढ़ी-लिखी है। मगर जो भी इसने जाना हो, लिखवा दे। अब बूढ़ी हो गयी, वृद्ध हो गयी, अब जाने का समय आता है। लिखवा दे। पीछे आयेंगे लोग, तो उनके काम पड़ेगा।’

मैने कहा कि ‘बाई लिखवा क्यों नहीं देती?’ तो उसने कहा, ‘बापजी, आप कहते हैं, तो ठीक है। अगले शिविर में जब आऊंगी, तो आप ही उद्घाटन कर देना। लिखवा लाऊंगी।’

अगले शिविर में उसके शिष्य बड़ी उत्सुकता से, बड़ी प्रतीक्षा करते रहे। उसने एक पेटी में एक किताब बंद कर के रखवा दी, ताला डलवा दिया, चाबी ले आयी। पेटी को उसके शिष्य सिर पर उठा कर लाये और मुझसे कहा कि ‘आप खोल दें।’ मैंने खोल दिया। कितबिया निकाली। जरा-सी किताब! होंगे दस-पंद्रह पन्ने और छोटी-सी किताब, होगी तीन इंच लंबी, दो इंच चैड़ी। और काले ही पन्ने, सफेद भी नहीं। सब काले! लिखा कुछ भी नहीं।

मैंने कहा, ‘भूरिबाई, खूब लिखा तूने! और लोग लिखते हैं, तो थोड़ा-बहुत पन्ने को काला करते हैं, तूने ऐसा लिखा कि सफेद बचने ही नहीं दिया। लिखती गयी, लिखती गयी, लिखती गयी।’

उसने कहा कि ‘अब आप ही समझ सकते हो, ये तो समझते ही नहीं। इनको मैं कहती हूं कि देखो। और लोग लिखते हैं, थोड़ा-बहुत लिखते हैं, वे पढ़े-लिखे हैं, थोड़ा ही बहुत लिख सकते हैं। मैं तो गैर-पढ़ी-लिखी हूं। सो मैंने लिख मारी, पूरी ही बात लिख दी! छोड़ी ही नहीं जगह। और किसी और से क्या लिखवाना, सो मैं ही लिखती रही; गूदती रही, गूदती रही, गूदती रही--बिल्कुल किताब को काला कर दिया! अब आप उद्घाटन कर दो।’

मैंने उद्घाटन भी कर दिया। उसके शिष्य तो बड़े हैरान हुए। मैंने कहा कि ‘यही शास्त्र है। यह शास्त्रों का शास्त्र है!’

सूफियों के पास एक किताब है, वह कोरी किताब है। उसे वे ‘किताबों की किताब’ कहते हैं। मगर उसके पन्ने सफेद हैं। भूरिबाई की किताब उससे भी आगे गयी। इसके पन्ने काले हैं। सूफियों की वह किताब बड़ी प्रसिद्ध है। परंपरा से गुरु उसको शिष्य को देता रहा है और सूफी उस किताब को खोल कर पढ़ते भी हैं। तुम कहोगे, ‘क्या खाक पढ़ते होंगे?’ कोरे पन्ने भी पढ़े जा सकते हैं। कोरे पन्ने को देखते रहो, देखते रहो, देखते रहो, देखते रहो, तो धीरे-धीरे कोरे ही जाओगे।

बोधिधर्म बुद्ध के परम शिष्यों में से एक--समकालिक नहीं, हजार साल बाद हुआ, मगर परम शिष्यों में से एक--नौ वर्ष तक दिवाल की तरफ देखता हुआ बैठा रहा। दीवाल भी थक गयी होगी, मगर बोधिधर्म नहीं थका। देखता ही रहा, देखता ही रहा, देखता ही रहा। कोरी दीवाल! मन भी घबड़ा गया होगा। मन भी भाग खड़ा हुआ होगा कि तू बैठा रह, हम चले! जब मन चला गया, तभी बोधिधर्म दीवाल से हटा और बहुत हंसा। कहते हैं, सात दिन बोधिधर्म हंसता ही रहा। लोगों ने पूछा, ‘हुआ क्या?’ उसने कहा कि ‘मैं यह देखता था कि कब तक यह मन टिकता है।’

अब सफेद दीवाल हो, तो मन कब तक टिके! मन को करने को क्या बचा! न कुछ पढ़ने को है, न कुछ सोचने को है, न विचारने को है। कोरे दीवाल देखते रहे, देखते रहे। नौ साल! अद्भुत आदमी था बोधिधर्म! और ऐसे कोरी दीवाल को देखते-देखते परम बुद्धत्व को उपलब्ध हुआ। यह पढ़ा शास्त्र! यह है वेदों का वेद! यह उपनिषदों का सार!

उपनिषद कहते हैं: ‘अज्ञानी तो अंधकार में गिरता ही है, तथाकथित ज्ञानी महाअंधकार में भटक जाता है।’ यह पंडितों के संबंध में कहा हुआ है, महापंडितों के संबंध में। ये जो तोतों की तरह पंडित हैं--पोपटलाल--जो रटे जा रहे हैं, इनकी रटन कैसे बंद हो!

बोधिधर्म हंसा सात दिन तक। उसके संगी-साथियों ने पूछा कि क्यों हंसते हो? उसने कहा, ‘मैं इसलिए हंसता हूं कि मैं देखता था कि कौन जीतता है, मैं जीतता हूं कि मन जीतता है! मैंने भी कहा कि जब तक तुझे उधेड़बुन करना है करता रह, मैं तो देखता हूं दीवाल, तो दीवाल ही देखता रहूंगा।’ ऊब गया, थक गया मन, घबड़ा गया होगा। घबड़ा ही जायेगा। भाग खड़ा हुआ मन।

बोधिधर्म ने कहा, ‘कहां जाता है? अरे लौट आ!’ फिर नहीं लौटा।

ध्यान की यही तो प्रक्रिया है: बैठ रहे। आंख बंद कर ली। बोधिधर्म ने सफेद दीवाल के सामने बैठ कर आंख बंद की। सफेद दीवाल को देखना आंख बंद करने जैसा ही है। मगर भूरिबाई की किताब दोनों के पार जाती है--सूफियों की किताब के भी, बोधिधर्म की दीवाल के भी। जब तुम आंख बंद करोगे, तो अंधेरा ही दिखाई पड़ेगा, वह काला होगा।

आंख बंद की और चुप हुए तो पहले तो अंधेरा, अंधेरा ही अंधेरा! घबड़ाना मत। देखे ही चले जाना, देखे ही चले जाना। प्रतीक्षा करना। धैर्य रखना। ऊबना मत। तुम मत ऊबना, मन ऊब जाये। और मन जिस दिन ऊब गया, टूट गया। तुमसे नाता टूट गया। और तत्क्षण प्रकाश हो जाता है। सब अंधकार तिरोहित हो जाता है।

मन गया कि जो आवरण पड़ा था प्रकाश पर, वह हट गया। जैसे किसी ने चट्टान रख कर झरने को दबा दिया था; चट्टान हट गयी, झरना फूट पड़ा। जैसे किसी ने दीये को बर्तन से ढांक दिया था; बर्तन उठ गया, रोशनी जगमगा उठी। दीवाली हो गयी।

भूरिबाई कुछ कहती नहीं थी। कोई उससे पूछने जाता था--‘क्या करें?’ तो वह ओठों पर अंगुली रख कर इशारा कर देती थी--‘चुप हो रहो, बस और कुछ करना नहीं।’ यही उसने इस सूत्र में कह दिया है--

चुप साधन चुप साध्या, चुप मा चुप्प समाय।

चुप समझारी समझ है, समझे चुप हो जाय।।

अगाध उसका मेरे प्रति प्रेम था--ऐसा कि मुझे भी मुश्किल में डाल देता था। भोजन करने मैं बैठता, तो भोजन करना मुश्किल, क्योंकि वह मेरे बगल में बैठती। और मेरी थाली की चीजें सरकने लगतीं, उठाने लगती वह। जो चीज भी मैं जरा-सी तोड़ कर चख लेता, वही गयी, नदारद! घंटों लग जाते भोजन करने मैं, क्योंकि फिर लाओ। एक कौर तोड़ पाता रोटी से कि रोटी गयी, वह प्रसाद हो गयी! वह खुद लेती उसमें से प्रसाद और फिर उसके भक्त बैठे रहते कतार में, सो वह बंट जाती रोटी। मैंने जरा-सा टुकड़ा सब्जी का लिया कि वह सब्जी की प्लेट गयी! दो घंटे, तीन घंटे लग जाते।

एक बार आमों का मौसम था और मैंने शिविर लिया, भूरिबाई आ गयी। वह दो टोकरियां भर कर आम ले आयी। मैंने कहा, ‘इतने आम मैं क्या करूंगा? एक आम, दो आम बहुत होते हैं।’

उसने कहा, ‘आपको पता नहीं बापजी, प्रसाद बनेगा!’

मैं घबड़ाया कि यह प्रसाद जरा मुश्किल का होने वाला है। और उसके पच्चीस-तीस भक्त भी मौजूद थे, वे सब आ गये और प्रसाद बनना शुरू हो गया! वह एक आम को मेरे मुंह में लगाये, इधर मैं एक घूंट भी ले नहीं पाया आम से कि आम प्रसाद हो गया, वह गया! और इतनी जल्दी पड़ी प्रसाद की, क्योंकि वे पच्चीस लोगों तक पहुंचाने हैं आम, और ज्यादा देर न लग जाये, तो आम में से पिचकारी छूट जाये--मेरे मुंह पर, मेरे कपड़ों पर सब आम ही आम हो गया! मेरे कंठ में तो शायद एक आम भी पूरा नहीं गया होगा। वह दो टोकरियां प्रसाद हो गया! वह खुद चखे और फिर भक्तों में बंटता जाये, बंटता जाये, पहुंचता जाये आम। मैंने उससे कहा, ‘भूरिबाई, आम के मौसम में अब कभी शिविर नहीं लूंगा। यह तो बड़ा उपद्रव है!’

मगर उसको फिक्र नहीं, तरोबोर कर दिया उसने आम के रस से मुझे। उसका प्रेम अद्भुत था! अपने ढंग का था, अनूठा था। उसे लौटना नहीं पड़ेगा जगत में। वह सदा के लिए गयी। ‘चुप मा चुप्प समाय’! वह समा गयी। सरिता सागर में समा गयी। कुछ उसने किया नहीं, बस चुप रही। और उसके घर जो भी चला जाता, उनकी सेवा करती। किसी की भी सेवा करती। और चुपचाप, मौन।

अद्भुत महिला थी। यूं कुछ प्रसिद्ध महिलाएं हैं भारत में, जैसे आनंदमयी, मगर भूरिबाई का कोई मुकाबला नहीं। प्रसिद्धि एक बात है, अनुभव दूसरी बात है।

यह सूत्र प्यारा है। इसे खयाल रखना। इस सूत्र को तुम समझ लो, तो समझने को कुछ और शेष नहीं रह जाता है।
योग प्रीतम का गीत, तुम्हारे लिए उपयोगी होगा--

भीतर का राग जगाओ तो कुछ बात बने
ध्यान का चिराग जलाओ तो कुछ बात बने
जल जाये अहंकार दमक उठो कुंदन से
ऐसी इक आग जलाओ तो कुछ बात बने
बाहर की होली के रंग कहां टिकते हैं
शाश्वत के फाग रचाओ तो कुछ बात बने
बोते बबूल अगर बींधेंगे कांटे ही
खुशबू का बाग लगाओ तो कुछ बात बने
टूटें सब जंजीरें अंतर-पट खुल जायें
भीतर वह राग जगाओ तो कुछ बात बने
गैरों की यारी में खोते ही पतियारा
प्रीतम से लाग लगाओ तो कुछ बात बने
भीतर का राग जगाओ तो कुछ बात बने
ध्यान का चिराग जलाओ तो कुछ बात बने
जल जाये अहंकार दमक उठो कुंदन से
ऐसी इक आग जलाओ तो कुछ बात बने।

-ओशो
ज्यूं था त्यूं ठहराया
प्रवचन नं. 2 से संकलित
(पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. पर भी उपलब्ध है)