Osho World Online Hindi Magazine :: May 2012
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समाचार पत्रों में ओशो-वाणी
ओशो-दि मैन ऑफ मिलेनियम




‘‘मुझे जीवन से प्रेम है, इसलिए मैं उत्सव की शिक्षा देता हूं। हर बात का उत्सव मनाना चाहिए। मेरे लिए न कुछ लौकिक है, न कुछ पारलौकिक। सीढ़ी के निम्नतम सोपान से उच्चतम सोपान तक सब कुछ मेरे लिए पवित्र है। सीढ़ी एक ही है: शरीर से आत्मा तक, भौतिक से आध्यात्मिक तक, काम से राम तक, सब कुछ दिव्य है’’--ओशो के इन प्रवचनों को प्रकाशित किया पुणे से ‘आज का आनंद’ ने रविवार 04 मार्च को। 05 तारीख को ‘कैसे निर्मित होता है व्यक्तित्व?’ आया बीकानेर के समाचार पत्र कामयाब कलम में। इसी तारीख में ‘एवरीथिंग रिटर्न टू इट्स ओरिजिनल सोर्स’ शीर्षक से ओशो-उद्धरणों को प्रकाशित किया सकाल टाइम्स ने।

08 मार्च को ‘गृहस्थ और संन्यासी’ शीर्षक के साथ ओशो-वाणी प्रकाशित हुई हैदराबाद के स्वतंत्र वार्ता पत्र में। 10 तारीख को राजधानी से राष्ट्रीय सहारा ने ‘संसार से पलायन क्यों!’ शीर्षक के साथ ओशो-प्रवचनों को दिया। अपने प्रवचनाशों में ओशो बताते हैं: ‘‘संसार में कोई चीज मेरी है ही नहीं, पर मैंने प्रत्येक वस्तु का उपयोग किया है और अपनी अंतिम श्वास तक हर वस्तु का उपयोग करता रहूंगा।’’

जयपुर से दैनिक जलते दीप ने ‘अध्यात्म के लिए अहं त्यागें’ दिया 12 मार्च को। और दिल्ली के आज समाज पत्र ने ‘बोधिसत्व की करुणा अपार’ प्रकाशित किया 13 मार्च को। बुद्धत्व पर अपने प्रवचनों में ओशो कहते हैं: ‘‘दो तरह के बुद्ध होते हैं। पहली तरह के अर्हत कहे जाते हैं और दूसरी तरह के बोधिसत्व होते हैं। अर्हत वह हैं जिन्होंने अपने आपको पूर्व में करुणा की कला के लिए अनुशासित नहीं किया था। बोधिसत्व को भी बुद्धत्व का वैसा ही अनुभव होता है, लेकिन उन्होंने पहले से ही अपने आपको करुणा बांटने के लिए अनुशासित किया होता है। इसलिए जब उन्हें बुद्धत्व घटता है, उन्हें अखंड सत्य, अखंड प्रेम अनुभव होता है।’’ चंडीगढ़, 15 मार्च को हिंदी समाचार आज समाज ने गुरुनानक देव पर ओशो प्रवचनों को प्रकाशित किया।

ओशो संबोधि दिवस पर देश भर के अनेक हिंदी तथा अंग्रेजी समाचार ने ओशो के प्रवचनों को अपने पत्र-पत्रिकाओं में महत्वपूर्ण स्थान दिया। 17 तारीख को राष्ट्रीय सहारा में ‘संबोधि पार का आनंद’ आया। ‘ओशो--दि मैन ऑफ मिलेनियम’ छपा जम्मू के अंग्रेजी पत्र डेली एक्सेलिशर में। 21 मार्च को ‘परम सत्य का साक्षात्कार’ प्रकाशित हुआ आज समाज में। और संबोधि दिवस पर ही अंग्रेजी समाचार डेक्कन हेराल्ड ने ‘पुटिंग लाइफ इनटू वर्ड्स’ में स्वामी आनंद कुलभूषण को केलिग्राफी पेंटिंग करते हुए सचित्र दिखाया। साथ-ही जयपुर से ‘आनंदित ही बांट सकता है प्यार’ शीर्षक पर एक आधे पृष्ठ का सचित्र ओशो-प्रवचनांश प्रकाशित हुए।

इलाहाबाद के युनाइटेड भारत ने 22 मार्च को ‘चेतना स्वतंत्र है’ शीर्षक पर ओशो-प्रवचनांशों को महत्वपूर्ण स्थान दिया। 26 तारीख को ‘संबुद्ध होने की वास्तविकता’ आया जयपुर के दैनिक भोर पत्र में।
‘‘बुद्ध कहते हैं: तुम सागर को कहीं से भी चखो, तुम उसे खारा ही पाओगे। तुम उसे कुरान में चखो या बाइबिल में चखो अथवा तोराह या तालमुद में चखो, स्वाद सदा वही पाओगे। शास्त्र तुम्हारा मार्ग-दर्शन नहीं कर सकते। वास्तव में, वे मृत हैं तुम्हारे बिना। जब तुम सत्य को उपलब्ध हो जाते हो, तो अचानक शास्त्रों में जीवन आ जाता है। जीवित हो उठते हैं, तुम्हारे द्वारा उन्हें फिर से नया जन्म मिल जाता है।’’ सद्गुरु के इन अमृत-वचनों के साथ ‘ओशो तंत्र सर्वोच्च समझ’ पुस्तक को सचित्र प्रकाशित किया पंजाब केसरी ने 27 मार्च को।

गाजियाबाद की हिंदी मासिक राष्ट्रीय समाचार पत्र अनंत की पुकार ने अनेको शीर्षकों के साथ ओशो-प्रवचनांशों को प्रकाशित किया। प्रवचनों के साथ ‘ना-कुछ होने का बोध, विपस्सना ध्यान की तीन विधियां, शिक्षक का उत्तरदायित्व, सिद्ध पुरुष और संबोधि व्यक्ति में भेद’ जैसे महत्वपूर्ण शीर्षक हैं।

हिंदी मासिक पत्रिका जागरण सखी में ‘जीवन के रंग/जीवन दर्शन’ स्तंभ में प्रतीक्षा अपूर्व की कलाकृति को प्रकाशित किया अपने मार्च के अंक में। इसके उद्धरण यहां उल्लेखनीय हैं: ‘‘जीवन से रंगों को अलग नहीं किया जा सकता। इंद्रधनुष के सात रंग शरीर के सात चक्रों से जुड़े हैं। चक्रों व रंगों का संतुलन ही मन व आत्मा को प्रफुल्लित रखता है। रंगों के इसी दर्शन के बारे में बता रही हैं ध्यान व रंगों की दुनिया से जुड़ी ओशो दर्शन की अनुगामी प्रतीक्षा अपूर्व।’’
‘‘रोज हम नई वासना निर्मित करते हैं, रोज। किसी का कपड़ा दिखाई पड़ा, वासना निर्मित हुई। कोई मकान दिखाई पड़ा, वासना निर्मित हुई, किसी का चेहरा दिखाई पड़ा वासना निर्मित हुई। हिलते-डुलते भी नहीं जरा, जरा हिले-डुले कि वासना निर्मित हुई। उठे-बैठे कि वासना निर्मित हुई।’’ गुरुवाणी स्तंभ में ओशो के इन अमृत प्रवचनों को प्रकाशित किया मासिक पत्रिका साधना पथ ने। सद्गुरु के यह प्रवचनांश ‘मन को खाली कैसे करें’ शीर्षक के साथ आया अप्रैल के अंक में।
हिंदी पाक्षिक वंचित टाइम्स ने 1 से 15 मार्च के अंक में स्वामी चैतन्य कीर्ति का एक आधे पृष्ठ का लेख प्रकाशित किया। ‘जनसंख्या, भ्रष्टाचार और जीवन का सुख’ शीर्षक में स्वामीजी लिखते हैं: ‘‘दुनिया खूब गति से विकासमान है, लेकिन इसकी यह गति केवल गति ही नहीं, दुर्गति भी है। कुछ दिन पहले, हमारी दुनिया की आबादी 7 अरब हो गयी और उसमें भारतीयों की संख्या 121 करोड़ है। सारी दुनिया से अलग गति है भारत की। अब तो हमारे देश की ओर अन्य सभी देशों के लोगों की निगाहें टिकी हैं कि इतनी बड़ी जनसंख्या वाले देश को बहुत कुछ बेचा जा सकता है, इससे उनके अपने देश की अर्थ व्यवस्था में सुधार हो जाएगा। विश्व में भारत एक बहुत बड़े बाजार के रूप में उभरा है, भारत के बाजार विदेशों और जीवन-शैली से जगमगाने लगे हैं।’’

‘‘इस संदर्भ में ओशो कहते हैं: ‘‘दस हजार वर्ष में संस्कृति और धर्म के जो बीज बोए गए हैं, यह आदमी उसका फल है और यह कड़वा है और घृणा से भरा हुआ है। लेकिन उसी की दुहाई दिए चले जाते हैं हम और सोचते हैं कि उससे प्रेम हो जाएगा। मैं आपसे कहना चाहता हूं, उससे प्रेम नहीं हो सकता है। क्योंकि प्रेम के पैदा होने की जो बुनियादी संभावना है, धर्मों ने उसकी ही हत्या कर दी है और उसमें ही जहर घोल दिया है।’’
इसी संकलन के एक अन्य पृष्ठ पर ‘जीसस गाडरवारा भी आए थे’ शीर्षक के साथ पूरे पेज की ओशो-वाणी प्रकाशित हुई।