Osho World Online Hindi Magazine :: September 2012
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  बाल जगत
 
 

कागज का इतिहास

"बचपन के सारे क्षण ह्रदय के विकास में दिए जाने चाहिए, सारा श्रम हृदय के विकास के लिए होना चाहिए और हृदय के विकास के लिए कुछ और अवसर खोजने पड़ते हैं, वे अवसर नहीं है जो हम स्कूल में और विद्यालय में खोजते हैं। हृदय के विकास के लिए जरुरी है कि बच्चा खुले आकाश के नीचे हो बजाय बंद मकानों के क्योंकि बंद मकान हृदय को भी बंद और कुंठित करते हैं। खुले आकाश के नीचे हो, दरख्तों के पास हो, चांद-तारों की छाया में हो, नदियों और समुद्रों के किनारे हों खुली मिट्टी और पृथ्वी के संसर्ग में हो। जितने विराट के निकट होगा बच्चा, उतने ही प्रेम का उसके भीतर जन्म होगा और सौंदर्य का बोध और विकसित होगा।"

ओशो
शिक्षा ओशो की दृष्टि में

जब लेखन विधि का आविष्कार हुआ तो सबसे पहले लोग लिखने के लिए भोजपत्र, चर्मपत्र या पेड़ों के पत्तों का प्रयोग किया करते थे। करीब 3000 साल बाद कागज का वास्तविक विकास हो सका। कागज का सर्वप्रथम आविष्कार चीन में 100 ईसा पूर्व हुआ था। 105 ईसा में चीन के हान राजवंश के सम्राट हो-ती-की के शासन काल में चीन सरकार तसाई लून के अधिकारियों ने कागज बनाना शुरू किया था। तसाई लून के अधिकारी कागज को कुछ खास चीजों के मिश्रण से बनाते थे, जिसमें शहतूत की बारीक छाल और भांग लत्ता पानी में मिलाकर, और पानी से निकालकर, इसे धूप में अच्छी तरह से सुखाया जाता था। यह विचार शायद गहरे कपड़ों के प्रयोग से आया था, जोकि शहतूत की छाल से बने होते थे। जो चीन में आसानी से उपलब्ध थे। तसाई लून का यह कागज काफी प्रसिद्ध हुआ और पन्नों की दृष्टि से यह बहुत बड़ी सफलता थी। धीरे-धीरे इसका प्रयोग पूरे चीन में शुरू हो गया।


प्राचीन कागज़

चीन के बाद अन्य देशों में भी इसका इस्तेमाल होने लगा। लेकिन इसमें भी 1000 वर्ष लग गए। फिर यूरोपीय एवं एशियाई देशों में भी फैल गया। भारत में कागज का विकास 400 ईसा पूर्व हुआ। उसके कुछ ही समय के बाद 500 ईसा बाद अबू खिलाफत के लोगों ने भी कागज बनाना शुरू कर दिया। समरकंद में 751 ईसा में चीनी और अरबियों के बीच के बहुत बड़ी लड़ाई हुई। अरबियों ने चीन के कुछ लोगों को बंदी बना लिया, जिसमें से कुछ चीनियों को कागज बनाना आता था और उन्होंने अपनी आजादी के बदले उन्हें कागज बनाने की विधि बता दी। भारत से लेकर स्पेन तक पूरी दुनिया के लोगों ने कागज का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। लेकिन यूरोप के ईसाई अभी भी चर्मपत्र का ही उपयोग कर रहे थे।


कागज़ बनाने वाली मशीन 

सन् 1200 की शुरुआत में ईसाईयों ने स्पेन के इस्लामियों को पराजित कर उस पर कब्जा कर लिया और कागज बनाना जान लिया। 1250 ईसा पूर्व इटालियंस ने अच्छे कागज बनाना सीखा और फिर उसे पूरे यूरोप में बेच दिया। 1338 में फ्रेंच भिक्षुओं ने अपना खुद का कागज बनाना शुरू किया। 1411 के आविष्कार के लगभग एक या डेढ़ शताब्दी के बाद जर्मनी के लोगों ने अपना चीर कागज बनाना प्रारंभ कर दिया था। एक बार जब उन्होंने कागज बनाना सीख लिया तो वो चीनी मुद्रण में भी उत्सुक होने लगे और 1453 में गुटनबर्ग नामक व्यक्ति ने पहली मुद्रित बाइबिल का उत्पादन किया।

(चीर कागज आज भी दुनिया का सबसे महंगा कागज है जो की आधुनिक कागज से भी ज्यादा महंगा है जोकि लकड़ी और रसायन से बनता है)


राइस पेपर (पारदर्शक कागज़) में चित्रकारी

इस समय तक एज्टेक(माडर्न मेक्सिको) देश के लोगों ने भी स्वतंत्र रूप से कागज का आविष्कार शुरू कर दिया था। इनका कागज वनकुमारी के पौधे के फाइबर से बना होता था जिसका उपयोग लोग किताबें बनाने में किया करते थे।

इसी बीच चीन के लोग कागज का इस्तेमाल विभिन्न तरह से करने लगे।


रंगीन कागज़