Osho World Online Hindi Magazine :: September 2012
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  ध्यान विधि
 
 

बुद्धि से हृदय की ओर

जब हृदय सक्रिय हो जाता है, तो तुम्हारे पूरे व्यक्तित्व, पूरी संरचना, पूरे तौर-तरीके को बदल डालता है, क्योंकि हृदय का अपना अलग मार्ग है...

पहला सूत्रः सिरविहीन होने का प्रयास करो। स्वयं के सिरविहीन होने की कल्पना करो; सिरविहीन होकर ही चलो। सुनने में यह अजीब लगता है, परंतु यह बहुत ही महत्वपूर्ण साधनाओं में से एक है। इसका प्रयोग करो, तब तुम जानोगे। चलो, और यह अनुभव करो जैसे कि तुम्हारा कोई सिर नहीं है। प्रारंभ में तो यह 'जैसेकि' ही होगा। यह बहुत अटपटा लगेगा। जब तुम्हें यह महसूस होगा कि तुम्हारा सिर ही नहीं है, तो बड़ा अटपटा और अजीब लगेगा। लेकिन धीरे-धीरे तुम हृदय में स्थित हो जाओगे।

एक नियम है। शायद तुमने देखा हो, जो व्यक्ति अंधा है उसके कान अधिक तत्पर, अधिक संगीतमय होते हैं। अंधे व्यक्ति अधिक संगीतमय होते हैं; संगीत के लिए उनकी अनुभूति गहनतर होती है। क्यों? जो उर्जा सामान्यतः आंखों से बहती है, अब उनसे तो बह नहीं सकती, तो वह एक भिन्न मार्ग चुन लेती है-वह कानों से बहने लगती है।

अंधे लोगों में स्पर्श के प्रति ज्यादा गहरी संवेदनशील होती है। यदि कोई अंधा व्यक्ति तुम्हें छुए, तो तुम्हें अंतर पता चलेगा, क्योंकि सामान्यतः छूने का बहुत-सा कार्य हम आंखों से ही कर लेते हैं: हम एक-दूसरे को आंखों से छू रहे हैं। एक अंधा व्यक्ति आंखों से नहीं छू सकता, तो उर्जा उसके हाथों से होकर बहती है। अंधा व्यक्ति आंखों वाले किसी भी व्यक्ति से अधिक सवेंदनशील होता है। कभी-कभी हो सकता है कि ऐसा न भी हो, परंतु सामान्य रूप से ऐसा ही होता है। यदि एक केंद्र न हो तो उर्जा दूसरे केंद्र से बहने लगती है।

तो इस प्रयोग को-सिरविहीन होने के प्रयोग को--करके देखो जो मैं बता रहा हूं, और अचानक तुम एक अद्भुत बात अनुभव करोगेः ऐसा होगा जैसे पहली बार तुम हृदय पर आए। सिरविहीन होकर चलो। ध्यान के लिए बैठो, अपनी आंखें बंद करो और बस यही अनुभव करो कि सिर नहीं है। महसूस करो, ''मेरा सिर विलीन हो गया है।'' प्रारंभ में तो 'जैसे कि' ही होगा, परंतु धीरे-धीरे तुम्हें लगेगा कि सिर सच में ही विलीन हो गया है। और जब तुम्हें लगेगा कि सिर विलीन हो गया है, तो तुम्हारा केंद्र हृदय पर आ जाएगा-तत्क्षण! तुम संसार को हृदय से देखोगे, बुद्धि से नहीं।

जब पहली बार पश्चिम के लोग जापान पहुंचे तो वे विश्वास नहीं कर पाए कि जापानी लोग पारंपरिक रूप से सदियों से यह सोचते रहे हैं कि वे पेट से सोचते हैं। यदि तुम किसी जापानी बच्चे से पूछो--यदि वह पाश्चात्य ढंग से शिक्षित नहीं हुआ है-कि ''तुम्हारा सोच-विचार कहां होता है?'' तो वह अपने पेट की ओर इशारा करेगा।

सदियां और सदियां बीत गई हैं, और जापान सिर के बिना जीता रहा है। यह मात्र एक धारणा है। यदि मैं तुमसे पूछूं, ''तुम्हारा सोच-विचार कहां चल रहा है?'' तो तुम सिर की ओर इशारा करोगे, लेकिन जापानी व्यक्ति पेट की ओर इशारा करेगा, सिर की ओर नहीं-यह भी एक कारण है कि जापानी मन इतना स्थिर, शांत और निश्चल है।

अब वह भी भंग हो गया है क्योंकि पश्चिम हर चीज पर फैल गया है। अब पूरब कहीं है ही नहीं। पूरब तो अब कुछ ही इक्का दुक्का लोगों में बच रहा है जो द्वीपों की तरह कहीं-कही मिल जाते हैं। भौगोलिक रूप से पूरब समाप्त हो गया है। अब तो पूरा विश्व ही पाश्चात्य है।

सिरविहीन होने का प्रयास करो। अपने स्नानगृह में दर्पण के सामने खड़े होकर ध्यान करो। अपनी आंखों में गहरे झांको और महसूस करो कि तुम हृदय से देख रहे हो। धीरे-धीरे हृदय-केंद्र सक्रिय हो जाएगा। और जब हृदय सक्रिय हो जाता है, तो तुम्हारे पूरे व्यक्तित्व, पूरी संरचना, पूरे तौर-तरीके को बदल डालता है, क्योंकि हृदय का अपना अलग मार्ग है।

तो पहली बातः सिरविहीन होने का प्रयास करो। दूसरे, अधिक प्रेमपूर्ण होओ, क्योंकि प्रेम बुद्धि से नहीं हो सकता। अधिक प्रेमपूर्ण हो जाओ! यही कारण है, जब कोई प्रेम में होता है, उसकी बुद्धि छूट जाती है। लोग कहते हैं कि वह पागल हो गया है। यदि तुम प्रेम में पड़ो और पागल न हो जाओ, तो तुम वास्तव में प्रेम में नहीं हो। बुद्धि तो खोनी ही होगी। यदि बुद्धि अप्रभावित रहे, और यथावत कार्य करती रहे, तो प्रेम संभव नहीं है, क्योंकि प्रेम के लिए तो हृदय के सक्रिय होने की जरूरत है-बुद्धि की नहीं। वह हृदय का कार्य है।

-ओशो
पुस्तकः ध्यानयोग प्रथम और अंतिम मुक्ति