Osho World Online Hindi Magazine :: September 2012
www.oshoworld.com
 
  एक सवाल?
 
 

कृपया बताएं, क्या कोई ऐसा भी रास्ता है जिससे मनुष्य शांति पूर्ण बनकर रहें?

जो प्रश्न तुमने मुझसे पूछा है, वह मुझे लियो टालस्टॉय का स्मरण करा रहा है, जो अभी तक के ख्यातिप्राप्त महानतम उपन्यासकारों में से एक हैं। बड़ी अजीब बात है, उनका सबसे विख्यात उपन्यास अन्ना केरिनिना तुम्हारे ही नाम पर है।

लियो टालस्टॉय मृत्यु शैय्या पर पड़े थे और उनकी एक वृद्ध चाची थीं, जो बहुत कट्टर धार्मिक थीं। लियो टालस्टॉय एक प्रमाणिक धार्मिक व्यक्ति थे, लेकिन उनकी धार्मिकता बहुत विद्रोहपूर्ण थी। वे कभी न तो चर्च गए थे और न कभी उन्होंने पादरियों की फिक्र की थी। और उनकी चाची इसीलिए हमेशा बहुत चिंतित रहती थीं। उन्होंने सोचा कि यह तो एक नास्तिक व्यक्ति है और उसे मरते देखकर जब डॉक्टर ने कहा अब यह केवल कुछ मिनटों या अधिक-से-अधिक एक घंटे के मेहमान हैं-तो लियो टालस्टॉय की चाची उनके निकट आकर उनके कान में फुसफुसाते हुए बोली-‘अब इसके बाद तुम मेरी बात कभी न सुन सकोगे, लेकिन इस क्षण तुम परमात्मा के साथ शांतिपूर्ण हो जाओ।

लियो टालस्टॉय ने अपनी आंखें खोलीं और कहा-‘लेकिन मेरा तो उसके साथ कभी आज तक संघर्ष हुआ ही नहीं, इसलिए परमात्मा के साथ शांतिपूर्ण होकर रहने का विचार मेरे लिए बड़ा अजीब है। मैंने उसके साथ आज तक कभी झगड़ा किया ही नहीं और असलियत तो यह है कि हम लोग कभी एक दूसरे से मिले ही नहीं।

तुम पूछ रही हो-‘कृपया बताएं, क्या कोई ऐसा भी रास्ता है, जिससे मनुष्य शांतिपूर्ण होकर रहें। तुम एक स्त्री के रूप में यह प्रश्न पूछ रही हो। पहली बात तो यह है कि तुम स्वयं के साथ ही यदि तुम शांतिपूर्ण हो, समझदार हो तो मनुष्य के साथ शांतिपूर्ण होकर रहने में कोई भी कठिनाई कभी है ही नहीं। वास्तव में पुरुष हमेशा से एक ही प्रार्थना करता रहा है-स्त्री के साथ शांतिपूर्ण होकर कैसा रहा जाए? पूरे दिन काम करने के बाद ज बवह थका-थकाया घर लौटता है, यह आशा करते हुए कि वह कुछ क्षण शांतिपूर्ण होकर गुजारेगा, लेकिन ऐसे क्षण उसके भाग्य में है ही नहीं। स्त्री उर्जा से भरी हुई है, घर के अंदर रहती हुई वह पूरे दिन काफी उर्जा इकट्ठी कर चुकी है और अब उसके अंदर उर्जा उबल रही है। वह प्रतीक्षा कर रही है उस व्यक्ति को घर आने तो दो और जैसे ही पुरुष घर में प्रवेश करता है, तुरंत ही कुछ-न-कुछ समस्या खड़ी हो जाती है।

प्रत्येक पुरुष, स्त्री द्वारा सताए जाने का अुनभव करता है और प्रत्येक स्त्री पुरुष द्वारा पीड़ा पहुंचाए जाने का अनुभव करती है। यह बड़ी अजीब बात है कि स्त्री और पुरुष को साथ-साथ रहते हुए लाखों वर्ष गुजर गए हैं, लेकिन अभी तक दोनों ही आपस में एक विशिष्ट समझ नहीं बना सके हैं। आधारभूत रूप से कोई न कोई चीज जरूर है दोनों के बीच।

बहुत प्रारंभ से ही कहानी ज्यों-की-त्यों वैसी की वैसी ही है-कहीं भी कुछ भी बदला है।

जब आदमी ईडेन के उद्यान में विचरण कर रहा था, उसने एक वृक्ष के ऊपर दो पक्षियों को बैठे देखा। वे एक दूसरे को कोमलता से लिपटाए हुए कूक रहे थे।

आदम ने पुकारते हुए ईश्वर से पूछा-वृक्ष पर बैठे ये दोनों पक्षी क्या कर रहे हैं?

ईश्वर ने उत्तर दिया-‘वे एक दूसरे से प्यार कर रहे हैं।’

कुछ समय बाद आदम घूमता हुआ जब खेतों की ओर पहुंचा तो वहां उसने एक सांड और गाय का साथ-साथ देखा।

आदम ने परमात्मा को पुकारते हुए फिर पूछा-‘मेरे मालिक! सांड और गाय के बीच आखिर यह क्या हो रहा है?

परमात्मा ने उत्तर दिया-‘आदम! वे दोनों आपस में प्रेम कर रहे हैं।

आदम ने पूछा-‘मेरे पास तो कोई भी नहीं है, फिर मैं किसके साथ कैसे प्रेम करूं?

इसलिए परमात्मा ने कहा-‘हम इस व्यवस्था को बदल देंगे। जब कल तुम सोकर उठोगे तो सभी चीजें भिन्न होंगी।

अतः आदम जैतून के पेड़ के नीचे लेटकर गहरी नींद में सो गया। जब वह जागा तो वहां उसके निकट ईव बैठी थी।

आदम ने उछलकर उसका हाथ पकड़ लिया और उससे कहा-मेरे साथ आओ। हम लोगों को झाड़ियों की ओर चलना चाहिए।’

इसलिए वे लोग झाड़ियों में चले गए, लेकिन कुछ ही क्षणों बाद आदम को लगा जैसे उससे कुछ गलती हो गयी और हताशा से ऊपर देखते हुए उसने परमात्मा से प्रार्थना की-‘तूने यह कैसा सिरदर्द दे दिया?’

शुरू से ही यह कहानी इतनी अधिक पुरानी हो चुकी है। मैं देखता हूं...उसका पहला कारण यह है कि स्त्री और पुरुष दोनों एक साथ शांति से रह ही नहीं सकते, जब तक कि वे स्वतंत्रता से न रहें। विवाह दोनों पर ही एक भारी बोझ है, एक जेल में रहने जैसी यातना है। पुरुष और स्त्री शांतिपूर्वक केवल मित्र की ही भांति रह सकते हैं पति-पत्नी के रूप में नहीं। प्रत्येक संबंध एक बंध है, लेकिन इसे संभव बनाने के लिए स्त्री को आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना होगा, पुरुष के बराबर शिक्षित होना होगा। राजनीतिक, सामाजिक और हर तरह से उसे विकसित होने के लिए समान अवसर मिलने की आवश्यकता है।

मेरे लिए यही स्त्री की मुक्ति और स्वतंत्रता है और साथ ही पुरुष की भी। दोनों ने ही एक दूसरे को गुलाम बनाकर रखा हुआ है इसीलिए वे निरंतर लड़ रहे हैं। जिसने तुम्हें गुलाम बनाकर रखा है, तुम उससे प्रेम नहीं कर सकते। तुम उसे सजा देने के लिए उससे बदला जरूर लोगे।

स्त्री के पास बदला लेने के लिए अपने अलग तरीके हैं...सिरदर्द उनमें से कारगर विधि है जब भी पुरुष उससे प्रेम करना चाहता है तो या तो बहुत थकी हुई होती है वह अथवा उसका मूड नहीं होता-लेकिन सामान्य रूप् से अधिकतर उसके सिर में दर्द होता है। सिरदर्द एक ऐसी चीज है, जिसे सिद्ध करने की तुम्हें कोई जरूरत नहीं। यहां तक कि एक चिकित्सक को भी तुम्हारी बात पर विश्वास करना पड़ता है, वह कोई भी निर्णय नहीं दे सकता कि वास्तव में तुम्हें सिरदर्द हो रहा है अथवा नहीं। लेकिन यह एक स्वाभाविक परिणाम है। स्त्री यह अनुभव करती है कि उसका एक वस्तु की भांति, एक सेक्स पूर्ति के खिलौने के रूप में प्रयोग किया जा रहा है और उसे एक मनुष्य जैसा सम्मान नहीं दिया जा रहा है।

चीन में तो सदियों से यह विश्वास किया जाता है कि स्त्री के पास कोई आत्मा होती ही नहीं। इसलिए चीन के कानून के अनुसार यदि पति अपनी पत्नी को जान से मार दे तो यह कोई अपराध नहीं है, क्योंकि उसके पास कोई आत्मा ही नहीं, वह मात्र एक फर्नीचर या एक वस्तु मात्र है और यदि कुर्सी का मालिक अपनी कुर्सी को तोड़ सकता है तो अपनी पत्नी को भी नष्ट कर सकता हैं। वहां सदियों से स्त्री को बाजार में ठीक दूसरी वस्तुओं की भांति बेचा जाता था।

पुरुष जाति का पूरा इतिहास ही इतना अधिक कुरुप है और पुरुष ने स्त्री के साथ जो कुछ भी किया है, वह बहुत भद्दा और अश्लील है और स्वाभाविक रूप से स्त्री के पास अपने पति से झगड़ने के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग है ही नही, वह विभिन्न तरीकों से उसे यातना पहुंचाती है, उसका खाना जला देती है और उसे चाय तब देती है, जब वह ठंडी हो जाती है।

बच्चों को कम्यून का एक भाग बनकर रहना चाहिए और पूरी जिम्मेदारी कम्यून की ही होगी। पुरुषों और स्त्रियों को जब तक वे साथ रहना चाहें, एक दूसरे के मित्र बनकर रहना चाहिए। जिस दिन वे महसूस करें कि चीजें तल्ख बनती जा रही हैं तो बिना किसी शिकायत-शिकवे के उन लोगों को अलग हो जाना चाहिए, लेकिन उनमें एक दूसरे के प्रति महान कृतज्ञता और अहोभाव होना चाहिए, उन सुंदर क्षणों और उस समय के लिए, जो उन्होंने साथ-साथ व्यतीत किया।

यह न केवल सम्भव है, बल्कि यही होने जा रहा है, क्योंकि पुरुष और स्त्री अब और अधिक बरदाश्त नहीं कर सकते। यही सदी पुराने सड़े हुए ढांचे का अंत देखेगी और एक नये मनुष्य तथा नई मनुष्यता का शुभारम्भ होगा।

-ओशो
पुस्तकः एक नई मनुष्यता का जन्म
प्रवचन नं. 13 से संकलित