Osho World Online Hindi Magazine :: September 2012
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  ओशो दर्शन
 
 

भीतर का प्रकाश प्रार्थना से जलेगा...

दीए से, प्रकाश से तुम्हारी वास्तविक दशा का बोध होगा कि तुम कौन हो। तुम परमात्मा हो! तत्वमसि! तुम परमात्मा से इंच भर नहीं कम नहीं, रत्तीभर कम नहीं, जरा भी छोटे नहीं...

‘दीया करै सनेह करि, दीए ज्योत दिखाइ’

अगर भीतर का दीया जलाना है तो तेल खोजना पड़ेगा। भीतर का दीया, भीतर का प्रकाश प्रार्थना के तेल से जलता है। और फिर दीया जल जाए तो भीतर सब दिखाई पड़ने लगता है। जैसा है, वैसा ही दिखाई पड़ने लगता है। फिर राम-नाम सत्य है, जीते-जी राम-नाम सत्य है।

दूसरा अर्थः दीया करै सनेह करि...। अगर देना हो तो प्रेम से देना। प्रेम से दिया गया हो, तो ही दान में रोशनी होती है। अगर किसी और कारण से दिया तो दान व्यर्थ हो गया। तुमने अगर इसलिए दिया कि स्वर्ग मिले तो तुम चूक गए। तुमने अगर इसलिए दिया कि प्रतिष्ठा मिले, तुम चूक गये। तुमने मंदिर बनवाया और पत्थर लगवा दिया नाम का, तुम चूक गए। देना हो तो देने के आनंद से देना। जिसको दिया हो, उसके प्रति प्रेम से देना। सिर्फ प्रेम के कारण ही देना, और कोई कारण न हो, पाने की कोई आकांक्षा न हो, तो तुम्हारे जीवन में बड़ी रोशनी होगी, बड़ा प्रकाश होगा। एक कंजूस आदमी तालाब में डूब रहा था, किनारे खड़े एक आदमी ने अपना हाथ बढ़ाकर कहा, भाई! मैं तुम्हें खींचता हूं, मुझे अपना हाथ दो।

लेकिन यह देखकर आश्चर्यचकित रह गया कि उस आदमी ने अपना हाथ नहीं बढ़ाया। तब पास ही खड़े मुल्ला नसरूद्दीन ने उसे समझाया, भैया! इन्होंने अपनी तमाम जिंदगी में दूसरों से लिया है। किसी को कभी कुछ दिया नहीं। आप इनसे कहिए मैं, तुम्हें खींचता हूं मेरा हाथ लो। तब ये आपका हाथ पकड़ेगे।

और ऐसा ही हुआ! जैसे ही कहा कि मैं हाथ देता हूं, लो मेरा हाथ, तत्क्षण उस आदमी ने हाथ पकड़ लिया।

जीवन के ढंग और शैलियां होती है! एक भाषा सीखने के हम धीरे-धीरे अभ्यस्त हो जाते हैं। लोभी देता भी है तो कुछ और सौदा कर लेने के लिए। स्वर्ग में सही। एक पैसा देता है सोचता है कितने मिलेगा।

एक आदमी मरा, स्वर्ग पहुंचा। खाते-बही खोले गए, देख-दाख की। उस आदमी से पूछाः भाई, तुम्हारे नाम का कुछ पता नहीं चलता। तुमने कभी किसी को कुछ दिया? क्योंकि जो देते हैं, उनका ही यहां नाम लिखा होता है।

उसने कहाः हां, मैंने दिया। एक बुढ़िया को मैंने तीन पैसे दिये थे। बहुत खोजबीन करने से मिला। दिये थे जरूर। वह देवदूत भी थोड़ा परेशान हुआ कि तीन पैसे दिये इस आदमी ने, अब इसको कहां स्वर्ग में जगह दें? तीन पैसे में स्वर्ग बड़ा सस्ता हो जाएगा। उसने अपने सहयोगियी से पूछा, असिस्टेंट से, कि भाई क्या करें? देवदूत ने खीसे से तीने पैसे निकालकर उस आदमी को दिये। उस आदमी ने कहाः ब्याज? आदमी तो आदमी है! न मिले स्वर्ग, मगर ब्याज...।

दीए तो सब देखिए, दीए करौ सनेह।
दीए दसा प्रकासिए, दीया करि किन लेह।।

दीए से सब दिखाई पड़ता है, दर्शन होता है। इसलिए सबसे महत्वपूर्ण बात है, मेरे भीतर का दीया कैसे जले? इसलिए अगर कोई भी चीज खोज करनी हो और अपने प्रेम को किसी एक केंद्र पर आधारित करना हो, एक जगह अपने प्रेम, अपने ध्यान को एकाग्र करना हो, तो वह एक ही बात हैः मेरे भीतर प्रकाश कैसे प्रज्वलित हो?

पुकारोः हे ज्योतिर्मय, मेरे भीतर उतरो!

उपनिषद के ऋषि कहते हैं ले चलो हमें अंधकार से प्रकाश तरफ! तमसो मा ज्योतिर्गमय!

वही सार-प्रार्थना है। क्योंकि दीए से ही सब दिखाई पड़ेगा। इसलिए दीए से ही प्रेम करो!

दूसरा अर्थः जो देता है उसी को दिखाई पड़ता है। जो बांटता है उसी को दिखाई पड़ता है। कृपण तो अंधा हो जाता है। दानी की आंख होती है।

तुमने कभी देखा, जब तुम किसी को बिना किसी हेतु के कुछ देते हो, कैसी प्रफुल्लता होती है! कैसा हल्कापन होता है! कैसा चित्त निर्भार हो जाता है! पंख लग जाते हैं कि लगे आकाश में उड़ जाओ! और जब तुम किसी से कुछ छीन लेते हो, कैसे बोझिल हो जाते हो! भारी हो जाते हो! और जब तुम किसी को नहीं देता, तो कैसी पीड़ा हो! भारी हो जाते हो! और जब तुम किसी को नहीं दे पाते, तो कैसी पीड़ा मन में काटती है!

देने से बड़ा मजा तुमने कोई और जाना है? देने से बड़ा सुख तुमने कोई और जाना है? इसलिए कृपण सुख को जान ही नहीं पाता, सिर्फ दाता ही जानते हैं।

दीए ते सब देखिए, दीए करौ सनेह।

इसलिए देने की कला सीखो। और ध्यान रखना, सुंदरदास यह नहीं कह रहे हैं। कि देने से तुम्हें स्वर्ग मिलेगा, इसलिए। सुंदरदास कह रहे हैं, देने में स्वर्ग है। देना स्वर्ग है। मिलने-विलने की बात छोड़ो। भविष्य नहीं है कुछ। वर्तमान के क्षण में ही तुमने जब भी किसी को प्रेम से कुछ दिया है, तभी तुमने पाया हैः स्वर्ग के द्वार खुले!

दीए दसा प्रकासिए, दीया करि किन लेह

दीए से, प्रकाश से तुम्हारी वास्तविक दशा का बोध होगा कि तुम कौन हो। तुम परमात्मा हो! तत्वमसि! तुम परमात्मा से इंच भर नहीं कम नहीं, रत्तीभर कम नहीं, जरा भी छोटे नहीं!

उपनिषद कहते हैः उसे पूर्ण से ही पूर्ण प्रकट हुआ। उस पूर्ण में ही पूर्ण लीन होता है। और जब हम उस पूर्ण से पूर्ण को निकाल लें, तब भी पीछे पूर्ण ही शेष रहता है।

ऐसा मत सोचना कि तुम्हारे भीतर परमात्मा अंश-अंश में प्रकट हुआ है। तुम प्रत्येक पूरे के पूरे परमात्मा हो। परमात्मा पूरा का पूरा उतरा है। लेकिन यह पहचान कहां हो? भीतर तो अंधेरा छाया है।

दीया जलाओ! और यह पहचान कैसे हो? भीतर तो हम बड़े कृपण हो गए हैं। हम देना ही भूल गए हैं। और हम देना भूल गए हैं, तो परमात्मा हमें नहीं दे पाता।

-ओशो
पुस्तकः ज्योति से ज्योति जले
प्रवचन नं. 9 से संकलित
पूरा प्रवचन एम.पी. थ्री. एवं पुस्तक में उपलब्ध है

ध्यान का दीया

बुद्ध कहते हैं, जीवन का बस इतना ही उपयोग हो सकता है कि जीते जी तुम दीया जला लो। ध्यान का दीया जला लो, बस इतना ही जीवन का उपयोग है...

'अंधकार में डूबे हो और दीपक की खोज नहीं करते!'

किसकी प्रतीक्षा कर रहे हो, मौत के अतिरिक्त कोई भी नहीं आएगा। किन सपनों में खोए हो! इसे हम समझें। जीवन को हमने देखा नहीं, हमने बड़े सपनों की बारात सजायी है। हम किस दुल्हन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। विवाह रचाने की बड़ी योजना बना रखी है। हम खूब-खूब कल्पना किये बैठे हैं-ऐसा हो, ऐसा हो। इसकी वजह से हम देख नहीं पाते कि कैसा है! तुम्हारा रोमांस, तुम्हारी कल्पनाओं का जाल सत्य को प्रगट नहीं होने देता।

आंख खाली करो, जरा सतेज होकर देखो, जरा सपनों को किनारे हटाकर देखो। वही देखो, जो है। तो तुम्हें पैदा होते बच्चे में मरता हुआ आदमी दिखायी पड़ेगा। तो तुम्हें सुदंरतम देह के भीतर बुढ़ापा कदम बढ़ाता हुआ मालूम होगा। जो गहरे देखेगा, वह जीवन में मौत को देख लेगा।

यही बुद्ध कहते हैं कि जरा गहरे देखो, चमड़ी के धोखे में मत आ जाओ। जरा और गहरे उतरो, जरा भीतर का दर्शन करो।

‘जब सब निरंतर जल रहा है तब हंसी कैसी?’

अब खोजो, गवेषणा करो दीए की! अंधेरा बढ़ता चला जाता है। अंधेरा रोज बढ़ता चला जाता है। किस भरोसे बैठे हो? तुम्हारे अतिरिक्त कोई भी दीए को न जला सकेगा। फिर अंधेरी रात घेर लेगी और फिर बहुत तड़फोगे और पछताओगे क्यों दिन का उपयोग न कर लिया? क्योंकि दिन के उजाले में चाहते तो दीया जल जाता। बुद्ध कहते हैं, जीवन का बस इतना ही उपयोग हो सकता है कि जीते जी तुम दीया जला लो। ध्यान का दीया जला लो, बस इतना ही जीवन का उपयोग है।

तुमने पद, धन, यश, कीर्ति, प्रेम इन सबकी चेष्टाएं कीं, बस एक ध्यान के दीए को जलाने की चेष्टा नहीं की, वही काम आएगा। मौत केवल उसी दीए को नहीं बुझा पाती। बुद्ध कहते हैं, ध्यान भर अमृत सूत्र है।

लेकिन मौत की तो किसी से बात ही करो तो लोग नाराज हो जाते हैं। बुद्ध से भी लोग बहुत नाराज हुए, क्योंकि बुद्ध मौत की ही बात करते हैं। अब कोई शादी को जा रहा हो और तुम उससे मौत की बात करो! कोई दिल्ली की तरफ जा रहा हो, और तुम मौत की बात करो! वह कहेगा, ठहरो, अभी ये बातें न करो। पैर डगमगाए देते हो।

बुद्ध ने जहां भी मौत की बात की, लोग नाराज हुए। मौत की बात शिष्टाचार नहीं मानी जाती। कहीं भी मौत की बात छेड़ो, लोग तुम्हें शांत कर देंगे कि चुप भी रहो, यह भी कोई बात है। मौत से हम बचते हैं-शब्द से बचते हैं। मौत को हम दूर रखते हैं। इसलिए मरघट, कब्रिस्तान गांव के बाहर बनाते हैं। जहां जाना न पड़े, बस। जब जाना पड़ेगा तब जाएंगे। ऐसे न जाना पड़े। तो मरघट को बिल्कुल दूर बना देते हैं, जहां कोई कारोबार नहीं, जहां अकारण जाने की कोई जरूरत नहीं। या तो कभी कोई मित्र मर जाए, प्रियजन मर जाए, तो पहुंचा आते हैं। लेकिन तुमने वहां भी देखा?मैं बहुत बार...मुझे बचपन से शौक था। कोई मरा, मैं गया। गांव में कोई मरे, परिचित हो, अपरिचित हो, संबंधी हो, असंबंधी हो, इससे कुछ लेना-देना नहीं था। मेरे घर में लोग जानने लगे थे कि अगर मैं घर में देर तक नहीं आया, तो वे समझते कि कोई मर गया होगा। गया! पर वहां मौत को झुठलाते हैं। वहां भी संसार की ही बात चलती है। वहां भी गांव के ही गप-सड़ाके! किसकी पत्नी भाग गयी है, कौन जुआ खेलते पकड़ा गया, कौन ने चोरी की, कहां हत्या हो गयी, वही सब बातें चलती हैं। मैं सोचता था, कम से कम मरघट पर तो मौत को लोग याद करते होंगे। नहीं वहां भी छोटे-छोटे झुंड बना लेते हैं। और सब बातें करते हैं, मौत को छोड़ देते हैं। मौत कुछ स्मरण मात्र से कंपा जाती है।

बुद्ध ने जब मौत और दुख की बातें शुरू की, तो लोग नाराज ही हुए। लोग घबड़ाए कि यह आदमी पैर के नीचे की जमीन खींचे लेता है। और इसने खींची, बहुत लोगों के पैर के नीचे की जमीन खींच ली। जवान आदमियों को बुढ़ापे का दर्शन दे दिया। अभी जिंदगी की रौ में थे, उनके पैर से जमीन खींच ली और मौत के गढ्डे में ढकेल दिया।

मगर जो इसके साथ चलने को राजी हो गए, जिन्होंने दुख की हिम्मत की कि करेंगे साक्षात्कार, जिन्होंने पीड़ा से मुंह न मोड़ा-सन्मुख होने की चेष्टा की, उन्होंने खूब पाया, उन्होंने खूब ज्योति जलायी। दीए ही नहीं, मशालें जला लीं। और कुछ ऐसी रोशनी जलायी जो फिर कभी नहीं बुझती। उन्होंने वास्तविक जीवन को पा लिया।

अब यह बड़ा उलटा दिखता है, मौत के माध्यम से वास्तविक जीवन पा लिया। कैसे यह घटता है? ऐसे ही घटता है कि जैसे ही मौत साफ होने लगती है, तुम्हारे सपने टूटने लगते हैं। मौत को अगर तुम देखते रहो, जानते रहो, सोचते रहो, विचारते रहो, ध्यान में गुनगुनाते रहो-बुझते रहो, बुद्ध कहते हैं-तो तुम सपने न बना सकोगे। अचानक उमंग उठी सपने की कि लाख इकट्ठा करें, और तभी खयाल आ गया मौत का, ढीले पड़ जाओगे। क्या फायदा?

‘कैसी हंसी? कैसी आनंद?

चले थे बारात लेकर दुल्हन को लेने, रास्ते में मौत का खयाल आ गया। डोला क्या उठा, अर्थी उठ गयी! अगर तुम स्मरण रखो मौत को, तो तुम पाओगे, जगह-जगह से सपने टूटने लगे। और सपने कुछ ऐसे हैं, सपनों का स्वभाव कुछ ऐसा है, कि टूटने लगें एक बार तो तुम उन्हें फिर न सम्हाल सकोगे। बड़े नाजुक हैं!

अगर फूलों से बने ये स्वप्न होते
और मुरझाकर धरा पर बिखर जाते
कवि-सहज भोलेपन पर मुस्कुराता,
किंतु चित्त को शांत रखता
हर सुमन में बीज है....

-ओशो
पुस्तकः अपने मालिक आप
प्रवचन नं. 52 से संकलित
पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. एवं पुस्तक में उपलब्ध हैं

ज्ञान और मनुष्य

ज्ञान खंड मनुष्य की उपलब्धि है। अगर मनुष्य न हो तो धर्म होगा, ज्ञान नहीं होगा। जगत धर्म से चलता रहेगा। लेकिन ज्ञान नहीं होगा। इसका यह अर्थ हुआ कि अस्तित्व ने मनुष्य के भीतर से ज्ञान को खोजने की कोशिश की है। इसलिए मनुष्य बड़े शिखर पर है...

नानक पहले खंड को धर्म-खंड कहते हैं। दूसरे खंड को ज्ञान-खंड कहते है। धर्म तो है। जिस दिन तुम उसे पहचान लेते हो, उस दिन ज्ञान। धर्म तो मौजूद है, लेकिन तुम आंख बंद किये हो। सूरज तो निकला है, लेकिन तुम द्वार बंद किये बैठे हो। दीया तो जल रहा है, लेकिन तुमने पीठ कर ली है दीए की तरफ। वर्षा तो हो रही है, लेकिन तुम भीगने से वंचित हो। तुम किसी अंधेरी गुहा में छिपे बैठे हो। धर्म तो चल रहा है, लेकिन तुम दूर हट गये हो।

वापस लौट आने का नाम ज्ञान है। और हर मनुष्य को वापस लौटना पड़ेगा। क्योंकि मनुष्य की यह क्षमता है कि वह दूर जा सकता है। पशुओं में कोई धर्म नहीं है। पौधों में, पक्षियों में कोई धर्म नहीं है। क्योंकि वे दूर जा ही नहीं सकते। वे कुछ भी अप्राकृतिक करने में असमर्थ हैं। वे जो भी करते हैं वही प्राकृतिक है। उनमें इतना भी बोध नहीं है कि वे भटक सकें। भटकने के लिए भी थोड़ी समझ चाहिए। गलत जाने के लिए भी थोड़ी हिम्मत चाहिए। मार्ग से उतरने के लिए भी थोड़ा होश चाहिए। उतना होश तुम में है। पर मार्ग पर आने के लिए वापस फिर, और भी ज्यादा होश चाहिए।

तो पशु हैं, वे भटक नहीं सकते, इसलिए ठीक जगह हैं। वह कोई बहुत गौरव की स्थिति नहीं है। वह मजबूरी है। फिर सामान्य मनुष्य है; उसमें थोड़ा बोध है, वह भटक सकता है, इसलिए भटक गया है। फिर बुद्धपुरुष हैं। नानक और कबीर हैं। उनके पास परम होश है। वे वापस लौट आए हैं।

पशुओं को जो सहज उपलब्ध है वह तुम्हें साधना से उपलब्ध करना पड़ेगा। बुद्ध वहीं लौट आते हैं जहां पौधे सदा से हैं। वहीं परम आनंद जो साधारण पौधे को उपलब्ध है, बुद्ध को भी उपलब्ध होता है। लेकिन एक बुनियादी फर्क होता है। वह फर्क यह है कि बुद्ध को वह आनंद परम बोधपूर्वक होता है। वे होश से भरे हुए उस आनंद को भोगते हैं। पौधे पर वह आनंद बरस रहा है। वह भटक भी नहीं सकता, लेकिन उसके पास बोध भी नहीं है।

तो प्रकृति अचेतन है। और बुद्धपुरुष सचेतन रूप से प्राकृतिक हैं। और दोनों के बीच में हम हैं। प्रकृति अचेतन है। वहां सुख सहज है। वहां सुख हो ही रहा है। लेकिन वहां कोई जानने वाला नहीं। उस सुख की प्रतीत और साक्षात् करने वाला कोई भी नहीं है। जैसे तुम बेहोश पड़े हो और तुम्हारे चारों तरफ रत्नों की वर्षा हो रही है। पत्थर बरस रहे हैं या रत्न, कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि तुम बेहोश पड़े हो। फिर तुम आंख खोलते हो। फिर तुम होश से भरते हो। और तब तुम पहचान पाते हो कि कैसी अपरंपार वर्षा तुम्हारे चारों तरफ हो रही थी।

बुद्ध वही पाते हैं जो प्रकृति में सहज ही उपलब्ध है, पत्थरों को मिला हुआ है। वहीं लौट आते हैं। लेकिन लौट आना बड़ा नया है। जगह तो वहीं है जहां बुद्ध हैं। होगा ही, क्योंकि परमात्मा कण-कण में छिपा है। लेकिन उस बोधिवृक्ष में और बुद्ध में क्या फर्क है? फर्क महान है। जगह तो एक है और अंतर अनंत है। अंतर यह है कि बुद्ध सजग होकर, होशपूर्वक उस आनंद का, उस अपरंपार महिमा का अनुभव कर रहे हैं। वह महिमा वृक्ष पर भी बरस रही है, लेकिन उसे कुछ पता नहीं। वह महिमा तुम पर भी बरस रही है, लेकिन तुम पीठ किये खड़े हो। वृक्ष का मुंह है उसकी तरफ, लेकिन वृक्ष उसे जान नहीं सकता। तुम जान सकते हो, लेकिन तुम पीठ किये खड़े हो। जिस दिन तुम सम्मुख हो जाओगे, जिस दिन तुम्हारी आंखें उस महिमा की तरफ उठेंगी और तुम पहचानोगे, उसे नानक ज्ञान कहते हैं।

ज्ञान खंड मनुष्य की उपलब्धि है। अगर मनुष्य न हो तो धर्म होगा, ज्ञान नहीं होगा। जगत धर्म से चलता रहेगा। लेकिन ज्ञान नहीं होगा। इसका यह अर्थ हुआ कि अस्तित्व ने मनुष्य के भीतर से ज्ञान को खोजने की कोशिश की है। इसलिए मनुष्य बड़े शिखर पर है। तुम्हें पता ही नहीं कि तुम्हें कितनी महिमा उपलब्ध होने की संभावना है। तुम्हारे द्वारा परमात्मा सजग होना चाहता है। तुम्हारे माध्यम से जागना चाहता है।

-ओशो
पुस्तकः एक ओंकार सतनाम
प्रवचन नं. 18 से संकलित
पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. एवं पुस्तक में उपलब्ध है

जीवन का परम् नियम है अनुशासन

जीवन का जो परम नियम है, जो उसका गहनतम अनुशासन है, डिसिप्लन है, उसे पहचान लेने की कला का नाम धर्म है

नानक ने अस्तित्व और उसकी खोज को चार खंडों में बांटा है। उन चार खंडों को थोड़ा समझ लें। उनका विभाजन बहुत वैज्ञानिक है। पहले खंड को वे धर्म-खंड कहते हैं, दूसरे का ज्ञान, तीसरे का लज्जा और चैथे को कृपा।

धर्म से अर्थ है, दि ला, नियमः जिससे अस्तित्व चलता है। जिसको वेद ने ऋत कहा है। ऋत के कारण ही तो हम बदलाहट को मौसम की ऋतु कहते हैं। उन दिनों जब वेद लिखे गये तो ऋतुएं बिल्कुल निश्चित थीं। रत्ती-पल फर्क न पड़ता था। हर वर्ष वसंत उसी दिन आता था जिस दिन सदा आता रहा था। हर वर्ष वर्षा उसी दिन शुरू होती थी जिस दनि सदा होती रही थी। आदमी ने प्रकृति को अस्तव्यस्त कर दिया है। इसलिए ऋतुएं भी ऋतुएं नहीं हैं। क्योंकि ऋतु शब्द ही हमने इसलिए दिया था, कि अपरिवर्तित नियम के अनुसार जो चलती थीं। एक अनुशासन था। आदमी की तथाकथित समझदारी के कारण सब अस्तव्यस्त हो गया है। ऋतुओं ने भी अपनी पटरी छोड़ दी।

अब पश्चिम में इस पर बहुत चिंता पैदा हुई है। एक नया आदोंलन चलता है। वे कहते हैं कि प्रकृति को मत छुओ। हमने बहुत नुकसान कर दिया है। और प्रकृति को उस पर छोड़ दो। उसमें किसी तरह का मानवीय हस्तक्षेप खतरनाक है। उससे न केवल प्रकृति, बल्कि अब मनुष्य का भी अंत करीब है।

वेद ने जब मौसम के परिवर्तन को ऋतु कहा, तो ऋतु शब्द के कारण कहा। ऋतु का अर्थ होता है, अपरिवर्तित नियम, अनचेंज़िंग ला; जिसको लाओत्से ने ताओ कहा है। उस नियम को जानने की जो विधि है, वह धर्म है। जीवन का जो परम नियम है, जो उसका गहनतम अनुशासन है, डिसिप्लन है, उसे पहचान लेने की कला का नाम धर्म है। बुद्ध ने तो धम्म या धर्म शब्द का अर्थ नियम की ही तरह उपयोग किया है। तो जब बौद्ध-भिक्षु कहते हैं, धम्मं शरणं गच्छामि, तब वे ये कह रहे हैं कि अब हम नियम की शरण जाते हैं। अब हम अपने को छोड़ते हैं। और हम उस परम नियम की शरण गहते हैं, जिससे हम पैदा हुए और जिसमें हम लीन हो जाएंगे। अब हम उसी के सहारे चलेंगे। सत्य को जान लेना, उस नियम को जान लेना ही है।

जीवन का जो मूल आधार है, उसको पहचान लेने को नानक कहते हैं, धर्म-खंड।

हम जीते हैः लेकिन हम विचार से जीते हैं। हम सोच-सोच कर कदम रखते हैं। और जितना सोच-सोच कर हम कदम रखते हैं, उतने ही हमारे कदम गलत पड़ते हैं। जो-जो हम बिना सोचे करते हैं, वहीं-वही ठीक कदम पर ले जाता है।

तुम खाना खाते हो। फिर उसे पचाने के लिए तो तुम नहीं सोचते। फिर तो नियम उसे पचाता है। किसी दिन कोशिश कर देखो। भोजन कर लो, फिर सोचो कि अब कैसे शरीर पचाएगा? फिर चौबीस घंटे पेट का ख्याल रखो कि पच रहा है? अपच हो जाएगी उसी दिन। क्योंकि जैसे ही विचार अचेतन नियम में बाधा डालता है, वैसे ही उपद्रव हो जाता है। तुम रोज सोते हो सांझ, एक दिन सोते वक्त सोच कर सोओ कि किस तरह सोता हूं,? किस तरह नींद आती है? विचार करो। उस रात नींद खो जाएगी। इसलिए ज्यादा विचार करने वाले लोगों को अगर अनिद्रा का रोग हो जाता है तो कुछ आश्चर्य नहीं है।

जीवन तो चल रहा है। वृक्ष फूल को खिलाते वक्त सोचता थोड़े ही है, कि कब खिलाऊं? कि समय पक गया या नहीं? मौसम आ गया है या नहीं? वृक्ष जानता है अपनी जड़ों से, सोच कर नहीं। यह उसमें अंतर्भावित है। नदियां सागर की तरफ बहती हैं। उन्हें कुछ दिशा का बोध है? उनके पास कोई नक्शा है कि सागर कहां है? लेकिन एक अचेतन नियम उन्हें सागर की तरफ ले जाता है।

यह इतना विराट जगत चल रहा है बिना विचार के। और इस विराट जगत में कहीं भी कोई गलती नहीं हो रही है। कभी कोई भूल-चूक नहीं हो रही, सब बिल्कुल ठीक है। सिर्फ आदमी गलत हो गया है। क्योंकि आदमी नियम से नहीं चल रहा है, विचार से चल रहा है। आदमी सोचता है, करूं या न करूं? ठीक है या गलत? उचित होगा कि अनुचित? परिणाम क्या होंगे? फल मिलेगा या नहीं मिलेगा? लाभ होगा या हानि? लोग क्या कहेंगे? हजार विचार करता है। और इस हजार विचार के धुएं में ही जीवन के नियम की सीधी रेखा उलझ जाती है और खो जाती है। निर्विचार से जो चलने लगा, वही सिद्ध है। निर्विचार से जो जीने लगा, वही आ गया शरण धर्म की।

तो धर्म कोई बुद्धिमानी नहीं है और न तुम्हारी बुद्धि का कोई निर्णय है। धर्म तो बुद्धि से थक गए आदमी की-जो बुद्धि से परेशान हो गया है, जिसने अपनी तरफ से सभी हाथ -पैर मार लिए और कुछ परिणाम न हुआ, जो सब तरफ से थक गया और असहाय हो गया-उस आदमी की खोज है धर्म। वह छोड़े देता है बुद्धि को। वह कहता है, अब तू जैसा चलाए। उसको ही नानक हुक्म कहते हैं। वे कहते हैं, अब उसके हुक्म चलूंगा।

इससे तुम यह न समझना कि वहां बैठा हुआ कोई महापुरुष, कोई परमात्मा हुक्म दे रहा है। वहां कोई बैठा हुआ नहीं है। हुक्म चल रहा है बिना हुक्मी के। नियम चल रहा है। नियम ही परमात्मा है। हमें भाषा ऐसी उपयोग करनी पड़ती है जिसे आदमी समझ ले। तो हमें तो प्रतीक बनाने पड़ते हैं। कई बार नासमझ आदमी प्रतीकों को जकड़ कर बैठ जाता है। वह सोचता है कि परमात्मा का कोई मुंह है, या हाथ-पैर हैं। वह किसी सिंहासन पर बैठ कर हुक्म चला रहा हैं हम हुक्म को मानें या न मानें! न मानें तो धार्मिक। नहीं मानेंगे तो परमात्मा नाराज होगा, क्रुद्ध होगा, दंड देगा। मानेंगे तो पुरस्कृत करेगा।

ये सब व्यर्थ की बातें हैं। यह तुम प्रतीक को जरूरत से ज्यादा खींच लिए। कोई व्यक्ति बैठा हुआ नहीं है। उस नियम की शरण जब तुम चले जाते हो तो तुमसे गलत होना बंद हो जाता है। क्योंकि वह नियम गलत करना जानता ही नहीं। और जब तुमसे ठीक होने लगता है तो सुख का संगीत बजने लगता है। ठीक का अर्थ ही यही है कि जब सब ठीक होगा, तब तुम्हारे पास दुख की छाया होगी। जितना गलता होता जाएगा, उतना चिंता गहन होगी। दुख, पीड़ा होगी। तुम दुख को दंड मत समझना। कोई दंड नहीं दे रहा है। तुम दुख को तो सिर्फ गलत होने का सूचन समझना।

-ओशो
पुस्तकः एक ओंकार सतनाम
प्रवचन नं. 18 से संकलित
पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. एवं पुस्तक में उपलब्ध है

संघर्ष या समर्पण

और अगर तुम पूरी तरह संघर्ष छोड़ दो तो तुम्हारी वहीं ऊंचाई है, जो परमात्मा की। ऊंचाई का एक ही अर्थ है-निर्भार हो जाना। और अहंकार पत्थर की तरह लटका है तुम्हारे गले में। जितना तुम लड़ोगे उतना ही अहंकार बढ़ेगा

जीवन जीने के दो ढंग हैं। एक ढंग है संघर्ष का, एक ढंग है समर्पण का। संघर्ष का अर्थ है, मेरी मर्जी समग्र की मर्जी से अलग। समर्पण का अर्थ है, मैं समग्र का एक अंग हूं। मेरी मर्जी के अलग होने का कोई सवाल नहीं। मैं अगर अलग हूं, संघर्ष स्वाभाविक है। मैं अगर इस विराट के साथ एक हूं, समर्पण स्वाभाविक है। संघर्ष लाएगा तनाव, अशांति, चिंता। समर्पणः शून्यता, शांति, आनंद और अंततः परमज्ञान। संघर्ष से बढ़ेगा अहंकार, समर्पण से मिटेगा। संसारी वही है जो संघर्ष कर रहा है। धार्मिक वही है जिसने संघर्ष छोड़ा और समर्पण किया। मंदिर, गुरुद्वारे, मस्जिद जाने से धर्म का कोई संबंध नहीं। अगर तुम्हारी वृत्ति संघर्ष की है, अगर तुम लड़ रहे हो परमात्मा से, अगर तुम अपनी इच्छा पूरी कराना चाहते हो-चाहे प्रार्थना से ही सही, पूजा से ही सही-अगर तुम्हारी अपनी कोई इच्छा है, तो तुम अधार्मिक हा।

जब तुम्हारी अपनी कोई चाह नहीं, जब उसकी चाह ही तुम्हारी चाह है। जहां वह ले जाए वही तुम्हारी मंजिल है, तुम्हारी अलग कोई मंजिल नहीं। जैसा वह चलाए वही तुम्हारी गति है, तुम्हारी अपनी कोई आकांक्षा नहीं। तुम निर्णय लेते ही नहीं। तुम तैरते भी नहीं, तुम तिरते हो...।

आकाश में कभी देखें! चील बहुत ऊंचाई पर उठ जाती है। फिर पंख भी नहीं हिलाती। फिर पंखों को फैला देती है और हवा में तिरती है। वैसी ही तिरने की दशा जब तुम्हारी चेतना में आ जाती है, तब समर्पण। तब तुम पंख भी नहीं हिलाते। तब तुम उसकी हवाओं पर तिर जाते हो। तुम तब निर्भार हो जाते हो। क्योंकि भार संघर्ष से पैदा होता है। भार प्रतिरोध से पैदा होता है। जितना तुम लड़ते हो उतना तुम भारी हो जाते हो, जितने भारी होते हो उतने नीचे गिर जाते हो। जितना तुम लड़ते नहीं उतने हल्के हो जाते हो, जितने हल्के होते हो, जितने हल्के होते हो उतने ऊंचे उठ जाते हो।

और अगर तुम पूरी तरह संघर्ष छोड़ दो तो तुम्हारी वहीं ऊंचाई है, जो परमात्मा की। ऊंचाई का एक ही अर्थ है-निर्भार हो जाना। और अहंकार पत्थर की तरह लटका है तुम्हारे गले में। जितना तुम लड़ोगे उतना ही अहंकार बढ़ेगा।

ऐसा हुआ कि नानक एक गांव के बाहर आ कर ठहरे। वह गांव सूफ़ियों का था। उनका बड़ा केंद्र था। वहां बड़े सूफी थे, गुरु थे। पूरी बस्ती ही सूफियों की थी। खबर मिली सूफियों के गुरु को, तो उसने सुबह की सुबह नानक के लिए एक कप में भर कर दूध भेजा। दूध लबालब था। एक बूंद भी और न समा सकती थी। नानक कुएं के बाहर ठहरे थे एक कुएं के तट पर। उन्होंने पास की झाड़ी से एक फूल तोड़ कर उस दूध की प्याली में डाल दिया। फूल तिर गया। फूल का वजन क्या! उसने जगह न मांगी। वह सतह पर तिर गया। और प्याली वापस भेजी दी। नानक का शिष्य मरदाना बहुत हैरान हुआ कि मामला क्या है? उसने पूछा कि मैं कुछ समझा नहीं। क्या रहस्य? यह हुआ क्या?

नानक ने कहा कि सूफियों के गुरु ने खबर भेजी थी कि गांव में बहुत ज्ञानी हैं, अब और जगह नहीं। मैंने खबर वापस भेज दी है कि मेरा कोई भार नहीं है। मैं जगह मांगूगा ही नहीं, फूल की तरह तिर जाऊंगा।

जो निर्भार है वही ज्ञानी है। जिसमें वजन है, अभी अज्ञानी है। और जब तुममें वजन होता है। तब तुमसे दूसरे को चोट पहुंचनी असंभव हो जाती है। अंहिसा अपने आप फलती है। प्रेम अपने आप लगता है। कोई प्रेम को लगा नहीं सकता। और न कोई करूणा को आरोपित कर सकता है। अगर तुम निर्भार हो जाओ, तो ये सब घटनाएं अपने से घटती हैं। जैसे आदमी के पीछे छाया चलती है, ऐसे भारी आदमी के पीछे घृणा, हिंसा, वैमनस्य, क्रोध, हत्या चलती है। हलके मनुष्य के पीछे प्रेम, करुणा, दया, प्रार्थना अपने आप चलती है। इसलिए मौलिक सवाल भीतर से अहंकार को गिरा देने का है।

कैसे तुम गिराओगे अहंकार को? एक ही उपाय है। वेदों में उस उपाय को ऋत कहा है। लाओत्से ने उस उपाय को तोओ कहा है। बुद्ध ने धम्म, महावीर ने धर्म, नानक का शब्द है हुकुम, उसकी आज्ञा। उसकी आज्ञा से जो चलने लगा, जो अपनी तरफ से हिलता-डुलता भी नहीं है, जिसका अपना कोई भाव नहीं, कोई चाह नहीं, जो अपने आप को आरोपित नहीं करना चाहता, वह उसके हुक्म में आ गया। यही धार्मिक आदमी है।

और जो उसके हुक्म में आ गया, वह सब पा गया। कुछ पाने को बचता नहीं। क्योंकि उसके हुक्म को मानना, उसके हृदय तक पहुंच जाने का द्वार है। अपने को ही मानना, उससे दूर हटते जाना है। अपने को मानना है कि तुमने परमात्मा की तरफ पीठ कर ली। उसकी आज्ञा को माना कि तुम्हारा मुख परमात्मा की तरफ हो गया। तुम सूरज की तरफ पीठ कर के जीवन भर भागते रहो तो भी अंधेरे में रहोगे। और तुम सूरज की तरफ मुंह इसी क्षण कर लो तो जन्मों-जन्मों का अंधेरा कट जाएगा।

परमात्मा के सन्मुख होने का एक ही उपाय है और वह यह है कि तुम अपनी मर्जी छोड़ दो। तुम तैरो मत, बहो। तुम तिरो; वह काफी है। तुम अकारण ही बोझ ले रहे हो।

और तुम्हारी सफलताएं-असफलताएं तुम्हारे अहंकार के ही रोग हैं। और तुम्हारी हालत वैसी है, जैसा मैंने सुना है कि एक रथ गुजर रहा था। और एक मक्खी उसके पहिए की कील पर बैठी थी। बड़ी धूल उठती थी। रथ बड़ा था। बारह घोड़े जुते थे। बड़ी भयंकर आवाज, बड़ी धूल उठती थी। उस मक्खी ने आस-पास देखा और कहा कि आज मैं बड़ी धूल उड़ा रही हूं। और जब इतनी धूल उड़ा रही हूं तो इतनी ही बड़ी हूं।

तुम सफल भी होते हो उसके कारण। जो भी तुम पाते हो उसके ही कारण। तुम रथ पर बैठी एक मक्खी से ज्यादा नहीं हो। भूल कर यह मत सोचना कि इतनी धूल मैं उड़ा रहा हूं। धूल है तो उसके रथ की है। यात्रा है तो उसके रथ की। लेकिन तुम अपने को बीच में मत लेना।

तुमने सुनी होगी बात उस छिपकली की, कि मित्रों ने उसे निमंत्रित किया था और कहा कि आओ आज थोड़ा जंगल में घूम आएं। उस छिपकली ने कहा कि जाना मुश्किल है। क्योंकि इस छप्पर को कौन सम्हालेगा? छप्पर गिर जाएगा तो जिम्मेवारी मेरे ऊपर होगी। छिपकली सोचती है कि छप्पर को महल के वही सम्हाले हुए है। छिपकली को लगता भी होगा।

-ओशो
पुस्तकः एक ओंकार सतनाम
प्रवचन नं. 2 से संकलित
पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. एवं पुस्तक में उपलब्ध है

नानक के गीत

ये गीत शराबी के गीत हैं। इसलिए नानक कहे चले जाते हैं। या तो एक छोटे बच्चे की तरह, या एक शराबी की तरह। वे गुनगान करते हैं। उसमें बहुत हिसाब नहीं है। और न ही इन वचनों को, साजा-संवारा गया है। ये अनगढ़ पत्थरों की तरह हैं...

नानक उस परमात्मा की स्तुति में ऐसे बोलते हैं, जैसे एक मदहोश आदमी बोले। वे किसी पंडित के वचन नहीं है; वरन उसके वचन हैं, जो प्रभु की शराब में पूरी तरह डूब गया है। इसलिए वे दोहराते चले जाते हैं। मस्ती में बोले गए वचन हैं। जैसे शराबी बोल रहा हो रास्ते के किनारे खड़े होकर--बोले चला जाता है। एक ही बात को बहुत बार कहे चला जाता है। ऐसी ही किसी गहरी शराब में डूब कर वे बोल रहे हैं।

बाबर नानक के समय भारत आया। उसके सिपाहियों ने नानक को भी संदिग्ध समझ कर कैद कर लिया। लेकिन धीरे-धीरे बाबर तक खबर पहुंचने लगी कि यह कैदी कुछ अनूठा है। और इस कैदी के आस-पास एक हवा है, जो साधारण मनुष्यों की नहीं। और एक मस्ती है कि यह कैदी कारागृह में भी गाता रहता है। और यह खबर बाबर को लगी कि यह कुछ ऐसा आदमी है कि इसे कैद किया नहीं जा सकता। इसकी स्वतंत्रता भीतरी है।

तो कहते हैं, उसने संदेश भेजा नानक को कि तुम मुझसे मिलने आओ। नानक ने कहा कि मिलने तो तुम्हें ही आना पड़ेगा। क्योंकि नानक वहां है, जहां से अब मिलने जाने का कोई सवाल नहीं।

बाबर खुद मिलने कारागृह में आया। नानक से बहुत प्रभावित हुआ। नानक को साथ ले गया अपने महल में। और उसने बहुमूल्य से बहुमूल्य शराब नानक को पीने के लिए निमंत्रित किया। नानक हंसे; और उन्होंने एक गीत गाया। जिस गीत का अर्थ है कि मैं परमात्मा की शराब पी चुका। अब इस शराब से मुझे नशा न चढ़ेगा। आखिरी नशा चढ़ गया है। अच्छा हो बाबर कि तुम ही मेरी शराब पीयो, बजाय अपनी शराब पिलाने के।

ये गीत शराबी के गीत हैं। इसलिए नानक कहे चले जाते हैं। या तो एक छोटे बच्चे की तरह, या एक शराबी की तरह। वे गुनगान करते हैं। उसमें बहुत हिसाब नहीं है। और न ही इन वचनों को, साजा-संवारा गया है। ये अनगढ़ पत्थरों की तरह हैं।

एक कवि लिखता है, तो सुधारता है। हेर-फेर करता है। जमाता है। व्याकरण की चिंता करता है। लय की, पद की, छंद की फिक्र करता है। मात्राओं का हिसाब रखता है। बहुत बदलाहट करता है। रवींद्रनाथ की हैसियत का महाकवि भी! अगर रवींद्रनाथ की डायरियां देखें, तो कटी-पिटी है। एक-एक लाइन को काट-काट कर फिर से लिखा है, बदला है, फिर जमाया है।

ये वचन न तो न बदले गए हैं और न जमाए हैं। ये तो वैसी ही हैं, जैसे नानक ने कहे थे। ये तो बोल गए हैं। इनमें कुछ हिसाब नहीं है; न भाषा का, न मात्रा का, न पद का, न छंद का। अगर इनमें कोई छंद है, तो भीतरी आत्मा का है। और अगर इनमें कोई व्याकरण है, तो वह मनुष्य की नहीं, परमात्मा की है। और इनमें अगर कोई लय मालूम पड़ती है, तो वह लय भीतर के नशे की है। वह काव्य की नही है। इसलिए तो नानक कहे जाते हैं। जब भी उनसे कोई पूछता, तो वे गाकर ही जवाब देते थे। उनसे कोई सवाल पूछता और वे कहते, सुनिये। और मर्दाना अपना साज छेड़ देता और वे गीत गाना शुरु कर देते।

इस बात को याद रखना। अगर इस बात को याद न रखा तो ऐसा लगेगा, क्या नानक पुनरुक्ति किये चले जाते हैं? कि उसके गुण अपार, कि उसका मूल्य अपार। फिर वे कहे ही चले जाते हैं।

ना! ये मस्ती में गुनगुनाए गए शब्द हैं। ये किसी दूसरे से कहे गये नहीं हैं। ये अपनी ही मस्ती में, अपने ही भीतर गुनगुनाए गए हैं। दूसरे ने सुन लिया है, यह दूसरी बात है। यह खयाल में रहेगा तो बहुत अर्थ प्रकट होने शुरू होंगे।

-ओशो
पुस्तकः भारत एक सनातन यात्रा से संकलित