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  ओशो जीवन रहस्य
 
 

ध्यान और मंदिर

ध्यान के क्षण में, गहरी शांति और मौन के क्षण में, अगर आप गुलाब के फूल को सामने रख लें और इतने एकात्म हो जाएं कि उस गुलाब से पूछ सकें कि बोल, तू किस काम में आ सकता है? तो गुलाब नहीं बोलेगा, लेकिन आपके प्राण ही, आपकी अंतरप्रज्ञा ही कहेगी, इस काम में...

कुश का बहुत उपयोग ध्यान के लिए किया गया है, कई कारणों से। एक तो, जिन दिनों ध्यान की प्रक्रिया विकसित हो रही थी इस पृथ्वी पर, जिन क्षणों में ध्यान का उद्घाटन हो रहा था, आविष्कार हो रहा था, उन क्षणों से बहुत संबंध कुश का है।

हमारे पास शब्द है उस समय का, कुशल। वह कुश से ही बना हुआ शब्द है। आपने कभी सोचा न होगा कि हम एक आदमी को कहते हैं कि बहुत कुशल ड्राइवर है; कहते हैं, बहुत कुशल अध्यापक है; लेकिन कुशल का मतलब आपको पता है।

कुशल का कुल मतलब इतना ही है, ठीक कुश को ढूंढ़ लेने वाला। सभी घास कुश नहीं है। तो जिन दिनों ध्यान इस पृथ्वी पर बड़ा व्यापक था, विशेषकर इस देश में, और जिस दिन ध्यान के प्राथमिक चरण हमने उदघाटित किये थे, उस दिन कुशल उस आदमी को कहते थे, जो हजारों तरह की घास में से उस घास को खोज लाए, जो ध्यान में सहयोगी होती है, उस कुश को खोज लाए।

एक विशेष तरह की घास अपने साथ एक विशेष तरह का वातावरण, एक विशेष तरह की ताजगी ले आती है।

हमें अनुभव होता है कई बार कि कुछ चीजों की मौजूदगी कैटेलिटिक का काम करती है-कुछ चीजों की मौजूदगी। आपने अपने चारों तरफ फूल रख लिए हैं, आपने अपने चारों तरफ एक सुगंध छिड़क रखी है, आपने अपने चारों तरफ धूप जला रखी है, तो आप एक विशेष मौजूदगी के भीतर घिर गए हैं। इस मौजूदगी में कुछ बातें सोचनी मुश्किल, कुछ बातें सोचनी आसान हो जाएंगी। जब चारों तरफ आपके सुगंध हो, तो दुर्गंध के ख्याल आने मुश्किल हो जाएंगे।

कुछ विशेष प्रकार की घास, कुछ विशेष प्रकार की धूप, जो कि ध्यान के ही माध्यम से खोजी गई थी, सहयोगी हो सकती है। उसकी अपनी पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया है।

लुकमान के जीवन में उल्लेख है कि लुकमान पौधों के पास जाता, उनके पास आंख बंद करके, ध्यान करके बैठ जाता और उन पौधों से पूछता कि तुम किस काम में आ सकते हो, मुझे बता दो! तुम किस काम में आ सकते हो? तुम्हारे पत्ते किस काम में आएंगे, किस बीमारी के काम आएंगे? तुम्हारी जड़ किस काम में आएगी? तुम्हारी छाल किस काम में आएगी?

कहानी अजीब सी-मालूम पड़ती है, लेकिन लुकमान ने लाखों पौधों के पत्ते जड़ों और उन सबका विवरण दिया है कि वे किस काम में आएंगे।

असंभव मालूम पड़ता कि पौधें बता दें। लेकिन जब लुकमान की किताब हाथ में लगी वैज्ञानिकों के तो कठिनाई यह हुई कि...। दूसरी बात और भी असंभव है कि लुकमान के पास कोई प्रयोगशाला रही हो, जिसमे लाखों पौधों कि करोड़ों प्रकार की चीजों का वह पता लगा पाए। वह और भी असंभव है। क्योंकि लेबोरेटरी मेथड्स तो अब विकसित हुए हैं; और केमिकल एनालिसिस अब विकसित हुई है, लुकमान के वक्त में तो थी ही नहीं। लेकिन आपकी केमिकल एनालिसिस, रासायनिक प्रक्रिया से और रासायनिक विश्लेषण से आप जो पता लगा पाते हैं, वह गरीब लुकमान बहुत पहले अपनी किताबों में लिख गया है, सुश्रुत अपनी किताबों में लिख गया है, धनवंतरि ने उसकी बात कर दी है। और इनके पास कोई प्रयोगशाला नहीं थी, कोई प्रयोगशाला की विधियां नहीं थी। इनके पास जानने का जरूर कोई और विधि, कोई और मेथड था, कोई और उपाय था।

वह ध्यान का उपाय है। ध्यान के गहरे क्षण में आप किसी भी वस्तु के साथ तादात्म्य स्थापित कर सकते हैं।

मनोवैज्ञानिक उसे एक खास नाम देते हैं, पार्टिसिपेशन मिस्टीक। एक बहुत रहस्यमय ढंग से आप किसी के साथ एकात्म हो सकते हैं।

ध्यान के क्षण में, गहरी शांति और मौन के क्षण में, अगर आप गुलाब के फूल को सामने रख लें और इतने एकात्म हो जाएं कि उस गुलाब से पूछ सकें कि बोल, तू किस काम में आ सकता है? तो गुलाब नहीं बोलेगा, लेकिन आपके प्राण ही, आपकी अंतरप्रज्ञा ही कहेगी, इस काम में।

तो कुशल उस व्यक्ति को कहते थे, जो अनंत तरह की घासों के बीच से उस कुश घास को खोज लाता था, जो ध्यान में सहयोगी होने का वातावरण निर्मित करती है।

इसलिए कृष्ण ने कहा सबसे पहले, कुश।

वस्त्र! विशेष वस्त्र। सभी वस्त्र सहयोगी नहीं होते। जिन वस्त्रों में आपने भोजन किया है, उन्हीं वस्त्रों में ध्यान करना कठिन होगा। जिन वस्त्रों में आपने सम्भोग किया है, उन्हीं वस्त्रों में ध्यान करना तो महा कठिन होगा। जिस बिस्तर पर लेटकर आपने कामवासना के विचार किये हैं, उसी बिस्तर पर बैठकर ध्यान करना बहुत मुश्किल होगा। क्योंकि प्रत्येक वृत्ति और प्रत्येक वासना अपने चारों तरफ की चीजों को इनफेक्ट कर जाती है।

ऐसे लोग आज भी पृथ्वी पर हैं और ऐसी प्रक्रियाएं भी हैं की मेरा रुमाल उन्हें दे दिया जाए, तो वे मेरे बाबत सब कुछ बता देंगे, हालांकि वे कुछ भी नहीं जानते कि मैं कौन हूं और यह रुमाल किसका है। क्योंकि यह रूमाल मेरे साथ रहकर मेरी सब तरह की संवेदनाओ को, मेरी सब तरह की तरंगों को, मेरे सब तरह के प्रभाव को आत्मसात कर जाता है, पी जाता है।

सूती कपड़े बहुत तीव्रता से पीते हैं, रेशमी कपड़े बहुत मुश्किल से पीते हैं। रेशमी कपड़े बहुत रेसिस्टेंट हैं। इसलिए ध्यान के लिए रेशमी कपड़ों का बहुत दिन उपयोग किया जाता रहा है। वे बिलकुल रेसिस्टेंट न के बराबर हैं। कम से कम दूसरी चीजों के प्रभावों को पीते हैं, इंप्रेसिव नहीं हैं; उन पर इंप्रेशन नहीं पड़ता। कम पड़ता है, फिसल जाता है, बिखर जाता है, टूट जाता है।

सूती कपड़ा एकदम पी जाता है। तो सूती कपड़े की खूबी भी है, खतरा भी है। अगर ध्यान के वक्त सूती कपड़े का उपयोग करें, तो वह ध्यान को पी जाएगा। लेकिन फिर उसकी सुरक्षा करनी पड़ेगी, उसको बचाना पड़ेगा। क्योंकि वह दूसरे प्रभावों को भी इसी तरह पी जाएगा। और चौबीस घंटे में तो ध्यान का मुश्किल से कभी एक क्षण आएगा, बाकी तो क्षण बहुत होंगे; वह सब पी जाएगा।

इसलिए रेशमी कपड़े का उपयोग किया जाता रहा। वह प्रभावों को नहीं पीता है। और आपके चारों तरफ एक निष्प्रभाव की धारा बना देता है। स्वच्छतम हों, कोरे हों, रेशमी हों।

और फिर जिन्होंने पाया कि कपड़े का किसी भी तरह उपयोग करो, कुछ न कुछ कठिनाई होती है, तो महावीर ने दिगंबर होकर प्रयोग किया। उसके कारण थे। ऐसे ही नग्न नहीं हो गए। ऐसा कोई दिमाग खराब नहीं था। कारण थे। कैसे ही कपड़े का उपयोग करो, कुछ न कुछ प्रभाव संक्रमित हो जाते हैं। आप अगर अपने ध्यान के कपड़े भी अलग रख दें, तो आप ही रखेंगे, आप ही उठाएंगे; कहीं तो रखेंगे। और अब हमारे घरों में ऐसी कोई जगह नहीं है, जिसे हम समस्त प्रभावों के बाहर रख सकें।

अगर आप अपने घर में एक छोटा-सा कोना समस्त प्रभावों के बाहर रख सकते हैं, तो वह मंदिर हो गया। मंदिर का उतना ही मतलब है। गांव में अगर एक घर आप ऐसा रख सकते हैं, जो समस्त प्रभावों के बाहर है, तो वह मंदिर है। मंदिर का उतना ही अर्थ है। लेकिन कुछ भी अब बाहर रखना बहुत मुश्किल है। एक कोना....।

इसलिए वे कह रहे हैं, शुद्ध स्थान।

शुद्ध स्थान से मतलब है, अप्रभावित स्थान। जो जीवन की निम्नतर वासनाएं हैं, उनसे बिल्कुल अप्रभावित स्थान। और इस तरह के अप्रभावित स्थान का परिणाम गहरा है। और वह घर बहुत गरीब है, चाहे वक कितना ही अमीर का घर हो, जिस घर में ऐसी थोड़ी-सी जगह नहीं, जिसे शुद्ध कहा जा सके। किस जगह को शुद्ध कहें?

जिस जगह बैठकर आपने कभी कोई दुष्विचार नहीं सोचा; जिस जगह बैठकर आपने कोई दुष्कर्म नहीं किया; जिस जगह बैठकर आपने सिवाय परमात्मा के स्मरण के कुछ और भी नहीं किया; जिस जगह बैठकर आपने ध्यान, प्रार्थना, पूजा के और कुछ भी नहीं किया; जिस जगह प्रवेश करने के पहले आप अपनी सारी क्षुद्रताओं को बाहर गए-ऐसा एक छोटा-सा कोना!

और निश्चित ही ऐसा कोना निर्मित हो जाता है। और अगर इस कोने पर सैकड़ों लोगों ने आपकी इस दुनिया के बीच एक अलग दुनिया बस जाती है। वह एक अलग कोना हो जाता है। जिसके भीतर प्रवेश करते से ही परिणाम शुरू हो जाएंगे। जिसके भीतर कोई अजनबी आदमी भी आएगा, तो परिणाम शुरू हो जाएंगे।

-ओशो
पुस्तकः भारत एक सनातन यात्रा