Osho World Online Hindi Magazine :: September 2012
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  ओशो-साहित्य परिचय
 
 

शून्य की नाव

पुस्तक में ध्यान-प्रयोगो पर आधारित ओशो प्रवचन है। जो सद्गुरु ओशो के ध्यान प्रक्रियाओं को समझने में सहायक बनाती है।

‘जीवन का समस्त क्रम प्रेम की गंगोत्री से निकलता है। जो लोग महत्वाकांक्षा की यात्रा करते हैं, पदों की यात्रा करते हैं, यश की कामना करते है, क्या आपको पता है, वे सारे लोग यश के माध्यम से जो प्रेम से नहीं मिला है, उसे पा लेने की कोशिश करते हैं। जो लोग धन की तिजोड़ियां भरते चले जाते हैं, अंबार लगाते जाते हैं, क्या आपको पता है, जो प्रेम से नहीं मिला, वह पैसे के संग्रह से पूरा करना चाहते हैं। जो लोग बड़े युद्ध करते हैं और बड़े राज्य जीतते हैं, क्या आपको पता है, जिसे वे प्रेम में नहीं जीत सके, उसे भूमि जीत कर पूरा करना चाहते हैं।’’

पुस्तक में दिये गये प्रवचनों को सद्गुरु ओशो ने नारगोल के ध्यान साधना शिविर में प्रकट किया था। उन सब अमृत प्रवचनों का यह अपूर्व संकलन है। पुस्तक के मुख्य बिन्दुः मौन द्वार की यात्रा, क्या है मनुष्य की वस्तुस्थिति? जीवन की कला, और क्या हैं प्रेम के असफल होने के कारण साथ ही धैर्य और प्रतीक्षा जैसे विषयों पर ओशो ने अपनी दिव्य दृष्टि डाली है। जीवन के इन समस्त अनछुएं पहलुओ की खुशबू को समेटने वाली इस पुस्तक की सार्थकता हर साधक के लिए सार्थक सिद्ध होती है।

पुस्तक का प्रकाशन रिबल पब्लिकेशन ने किया है। जिसका मूल्य 200 रुपये है। यह किताब कुल 140 पृष्ठ सहित आकर्षक कवर पेज में उपलब्ध है।

जीवन एक तिलिस्म

प्रस्तुत डी.वी.डी. में सांच सांच सौ सांच पुस्तक के प्रवचन नं. तीन का अपूर्व संकलन है। जिसमें तीन प्रश्नों का सद्गुरु ओशो ने समाधान निकाला है। जो अपने आप में अनोखे हैं।

अपने प्रवचन में ओशो कहते हैं-‘‘हार के लिए अस्तित्व जिम्मेंदार नहीं है, तुम्हारी आकांक्षा ही गलत है। जीवन को थोड़ा काव्य की तरह देखो, थोड़ा प्रेम की तरह देखो। तब और आनंद है अर्थ की कोई चिंता नहीं उत्सव है। पागल करे अर्थ की खोजबीन, बुद्धिमान नाचेंगे, वीणा बजाएंगे, बांसुरी पर सुर छेड़ेंगे और पैरों में घुंघरु बजेंगे। उनका जीवन अर्थ की चिंता नहीं करता है। यह क्षण काफी है। अर्थ का जो हमारे मन पर बहुत अधिक प्रभाव है। वो इसलिए कि हम हिसाब-किताब बहुत रखते हैं। हर क्यों का उत्तर चाहते हैं। जहां हम निरुत्तर होते हैं वहीं हताशा हाथ लगती है। और मैं तुमसे कह दूं जिन प्रश्नों के उत्तर हैं उनकी कोई कीमत नहीं है। प्रश्न वहीं कीमती हैं जिनका कोई उत्तर नहीं है। न हो सकते हैं क्योंकि वही तो जीवन के तिलिस्म के करीब है। जीवन के जादू को छूते हैं, जीवन एक जादू हैं। एक तिलिस्म है। इसको जीयो जानने की चेष्टा क्यों?

ओशो प्रवचनांश की इस डी.वी.डी. का निर्माण ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन ने किया है। जिसकी समयाविधि 60 मिनट है एवं मूल्य 300 रुपये मात्र है।

आनंद और उत्सव

प्रस्तुत ओशो प्रवचन की ए.सी.डी. में उत्सव और आनंद की मधुर बेला का समधुर मिश्रण है जिसके एक-एक बोल हृदय में मिश्री की मिठास उत्पन्न करते हैं।

ओशो कहते है-‘‘आनंद का स्वभाव शब्दातीत है। इशारे किये जा सकते है; जैसे कोई चांद की तरफ अंगुली उठाए। अंगुली चांद नहीं है। अंगुली से चांद का क्या लेना-देना! और ऐसे नासमझ बहुत हैं, जिन्होंने मील के पत्थरों को मंजिल समझ कर पूजा करनी शुरू कर दी है; जो सत्यों को तो भूल गए और शब्दों को छाती से लगा कर बैठ गए हैं; जिन्होंनें बुद्धों का तो विस्मरण कर दिया, लेकिन उनके वचनों का वजन इतना है हिमालय जैसा कि लोगों का चलना भी मुश्किल हो गया है; बोझ के नीचे दबे हैं। ज्ञान के बोझ के नीचे मर रहे हैं, सड़ रहे हैं।’’

उत्सव और आनंद का अमृत सेमेटे हुए इस ए.सी.डी. का निर्माण नुपुर पब्लिकेशन ने किया है। जिसका मूल्य 165 रुपये मात्र है एवं प्रवचनों की अविधि 55 मिनट है।

आदमी अकेला है

‘‘धर्म का जन्म ही एकांत में है, एकाकीपन में है। जहां तक भीड़ है, जहां तक भीड़ में लगाव है, जहां तक भीड़ के बिना रहना क्षणभर को कठिन है-वहां तक धर्म नहीं, संसार है।’’

अजहूं चेत गंवार पुस्तक के प्रवचन नं. आठ से संकलित ए.सी.डी. में ध्यान और एकाकीपन की बारीकियों से सदगुरु ओशो ने साधको को अवगत कराया है।

ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन की तरफ इस ए.सी.डी. का निर्माण किया गया है। जिसका 150 मूल्य एवं प्रवचन की समयावधि 58 मिनट है।

ध्यान में डूबो

उक्त डी.वी.डी. में ध्यान और संबोधि का अनूठा मिश्रण समाया हुआ है। जो मनुष्य के कदम-कदम पर उपयोगी है। ओशो संदेश पब्लिकेशन हाउस ने उक्त ओशो प्रवचन की डी.वी.डी को ओशो सन्यासियों एव प्रेमियों के लिए प्रस्तुत किया है।

डी.वी.डी. के एक प्रवचन में सदगुरु ओशो संबोधि के बारें में बोलते हुए कहते हैं-‘‘संबोधि का अर्थ होता है, तुम्हारे भीतर की आंख। और कुछ ज्यादा कठिनाई की बात नहीं है; थोड़ी सी धूल पड़ी है--सपनों की धूल। धूल भी सच नहीं। विचारों की धूल। कल्पनाओं की धूल। कामनाओं की धूल। धूल भी कुछ वास्तविक नहीं, धुआं-धुआं है। मगर उस धुएं ने तुम्हारी भीतर की आंख को छिपा लिया है। जैसे बादल आ जाएं और सूरज छिप जाए। बादल छंट जाएं और सूरज प्रकट हो जाए। बस इतना ही अर्थ है संबोधि का बादल छंट जाएं और सूरज प्रकट हो जाए।’’

हिंदी ओशो प्रवचन की इस डी.वी.डी. का मूल्य 125 रुपये है।

ओशो सन्यासियों एवं प्रेमियों के लिए बिक्री हेतु यह ओशो साहित्य नई दिल्ली स्थित ओशो वर्ल्ड गैलेरिया, ओशोधाम, और ओशो राजयोग ध्यान केन्द्र के अतिरिक्त हमारी ऑनलाइन वेबसाइट www.oshoworld.com पर भी उपलब्ध है।