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धर्म और विज्ञान का अंतः संबंध

आज समाज, नई दिल्ली, 9 अक्टूबर, 2012

धर्म परिभाष्य नहीं है। जो बाह्य है उसकी परिभाषा हो सकती है। जो आंतरिक है उसकी परिभाषा नहीं हो सकती है। वस्तुतः जहां से परिभाषा शुरू होती है वहीं से विज्ञान शुरू हो जाता है, क्योंकि वहीं से बाह्य शुरू जाता है। विज्ञान है शब्द में, धर्म है शून्य में। क्योंकि परिधि है अभिव्यक्ति और केंद्र है अज्ञात और अदृश्य और अप्रगट। वृक्ष और बीज की भांति ही वे हैं। विज्ञान वृक्ष है, धर्म बीज है। विज्ञान को जाना जा सकता है धर्म को जाना नहीं जा सकता है, लेकिन धर्म में हुआ जा सकता है और धर्म में जिया जा सकता है। विज्ञान ज्ञान है, धर्म जीवन है। इसलिए विज्ञान की शिक्षा हो सकती है, धर्म की कोई शिक्षा नहीं हो सकती है।

विज्ञान है ज्ञात और ज्ञेय की खोज। धर्म अज्ञात है और अज्ञेय में निम्मजन। विज्ञान है पाना, धर्म है मिटना। इसलिए विज्ञान बहुत हैं, लेकिन धर्म एक ही है। इसलिए ही विज्ञान विकासशील, किंतु धर्म शाश्वत है।

जीवन की परिधि की ओर जाने से तो केंद्र से दूर निकल जाते हैं। लेकिन एक बड़ा आश्चर्य है कि जो केंद्र की ओर जाता है वह परिधि से दूर नहीं निकलता है, उल्टे परिधि और निकट आती जाती है। और ठीक केंद्र पर पहुंचने पर तो परिधि विलीन हो जाती है, क्योंकि केंद्र भी विलीन हो जाता है। परिधि पर परिधि भी है और केंद्र भी है। केंद्र पर न केंद्र है, न परिधि है। आंतरिक तो अंततः उसका द्वार बन जाता है जो कि न आंतरिक है, न बाह्य है।

इसलिए मैं कहता हूं कि विज्ञान का तो धर्म से विरोध हो भी सकता है, लेकिन धर्म का विज्ञान से विरोध असंभव है। बाह्य का आंतरिक विरोध हो सकता है, लेकिन आंतरिक के लिए तो बाह्य है ही नहीं। पुत्र का मां से विरोध हो सकता है, लेकिन मां के लिए तो पुत्र का होना उसका स्वयं का होना ही है।

धर्म विज्ञान के विरोध में नहीं हो सकता है, और जो हो वह धर्म नहीं है। धर्म संसार के विरोध में भी नहीं है। संसार धर्म के विरोध में हो सकता है, लेकिन धर्म संसार के विरोध में नहीं हो सकता है। धर्म सर्व अविरोध है और इसलिए तो धर्म मुक्ति है। जहां विरोध है, वहां बंधन है। और जहां विरोध है, वहां अशांति है, वहां अग्नि है। वह बूढ़ी स्त्री सही तो चिल्लाती थी-‘मेरा घर जल रहा है, मेरे जीवन में आग लगी है'।

और लोग पहुंचे थे विज्ञान की बाल्टियां लेकर, बाह्य का जल लेकर, तो वह हंसने लगी थी। वह आज भी हंस रही है, क्योंकि जीवन में आग आज भी लगी है, रात्रि आज भी अमावस की है। गांव आज भी सोते से जाग पड़ा है, पड़ोसी आज भी दौड़े चले आये हैं, लेकिन फिर वे ही बातें पूछ रहे हैं। वे पूछते हैं, आग कहां है? दिखायी तो नहीं देती, बताओ, हम उसे बुझा दें, हम पानी की बाल्टियां ले आये हैं। हर रात्रि यही हो रहा है, वही बात हर रात दुहरती है।

लेकिन आग है भीतर और पानी है बाहर का। अब आग बुझे कैसे? आग और बढ़ती ही जाती है और हर आदमी उसमें झुलसता ही जा रहा है। यह भी हो सकता है कि आग के चरम उत्ताप में आदमी परिवर्तित हो जाये और उसकी नींद टूट जाये। और इस आग से वह और भी निखरा हुआ स्वर्ण होकर बाहर निकले। यह स्मरण रहे कि विज्ञान आग को नहीं बुझा सका है, उल्टे विज्ञान की सभी खोजें आग को और प्रज्वलित करने में ही सहयोगी हो गयी हैं।

अज्ञान के हाथों में शक्ति आत्मघाती हो उठे तो इसमें आश्चर्य ही क्या है? मुझे तो पिछले दो महायुद्ध में मनुष्यता द्वारा सार्वलौकिक आत्मघात की पूर्ण तैयारियां ही मालूम पड़ते हैं। दो महायुद्धों में शायद दस करोड़ लोगों की हत्या हुई है और तैयारी आगे भी जारी है। तीसरा महायुद्ध होगा अंतिम।

इसलिए नहीं कि फिर मनुष्य युद्ध नहीं करेगा, वरन इसलिए कि फिर मनुष्य युद्ध करने को बचेगा ही नहीं।

स्वयं को नष्ट करने की मनुष्यता की आतुरता अकारण भी नहीं है। शायद बाह्य की एकांगी खोज से जो विफलता हाथ आई है, उसके विवाद में ही आत्मघात का यह विराट आयोजन चल रहा है। मनुष्य के हाथ सारी दौड़-धूप के बाद भी खाली के खाली हैं। जीवन ही रिक्त, अर्थहीन और खाली है। सिंकदर ने मरते समय ही जाना कि उसके हाथ खाली हैं, इसलिए मरने की जिम्मेदारी उसने स्वयं अपने ऊपर नहीं ली। शायद अब मनुष्य ने जीते जी जो यह जान लिया है, इसलिए वह स्वयं ही अपने को मारने का तैयार है। वह मृत्यु के लिए परमात्मा को भी कष्ट नहीं देना चाहता है। जब हाथ खाली हैं, और आत्मा ही खाली है तो जीने का प्रयोजन ही क्या है...अर्थ ही क्या है...अभिप्राय ही क्या है ?

जीवन है अर्थहीन, क्योंकि जीवन से मनुष्य परिचित ही नहीं है। और जिसे उसने जीवन जाना है वह निश्चित ही अर्थहीन है, क्योंकि वह जीवन ही नहीं है। जीवन आंतरिक को खोकर बाह्य की ही दौड़ हो तो निश्चित ही अर्थहीन जाता है। क्योंकि तब बच जाती है वस्तुएं और वस्तुएं। आत्मा को बेचकर जो इन वस्तुओं को इकट्ठा कर लेता है, वह अपने हाथों ही मृत्यु जुटा लेता है।

और बाह्य के विरोध और शत्रुता में जो आंतरिक की ओर चलता है, वह भी पंगु हो जाता है। क्योंकि उसका जीवन भी अंतर्द्वंद में शांति और संगीत को खो देता है। और आत्मा तो केवल उन्हें ही मिलती है जो संगीत में और सौंदर्य में जीते हैं। बाह्य की शत्रुता एक भांति कुरूपता पैदा करती है। और बाह्य का विरोध एक भांति की जड़ता ले आता है। अंतर्द्वंद अहंकार को तो पुष्ट करता है लेकिन इससे आत्मा उपलब्ध नहीं होती है।

जो तुम अपने लिए चाहते हो, वही सबके लिए चाहो

नवभारत टाइम्स, नई दिल्ली, 8 अक्टूबर, 2012

महावीर ने कहा है, जो तुम अपने लिए चाहते हो, वही दूसरों के लिए भी चाहो। और जो तुम अपने लिए नहीं चाहते, वह दूसरों के लिए भी मत चाहो। यही जिन शासन है।

साधारणतः तुम जो अपने लिए चाहते हो, वह दूसरों के लिए नहीं चाहते, क्योंकि फिर तो अपने लिए चाहने का कोई अर्थ ही न रहा। तुम एक महल बनाना चाहते हो, तो पाओगे कि असल में तुम चाहते हो कि दूसरा कोई ऐसा महल न बना ले। अगर सभी के पास वैसे ही महल हों, तो फिर तुम्हें मजा ही नहीं आएगा। फिर तो उस उपलब्धि का अर्थ ही क्या रहा! तुम एक सुन्दर स्त्री या पुरुष चाहते हो, तो तुम भीतर यह भी चाहते हो कि ऐसा सुंदर साथी किसी और को न मिले अन्यथा कांटा चुभेगा। वह बस तुम्हें मिले, और वैसी सुंदर स्त्री किसी दूसरे के पास न हो। सुन्दर स्त्री में भी तुम अपने अहंकार को ही भरना चाहते हो। अपने महल में भी अहंकार को ही भरना चाहते हो, वह तुम दूसरे के लिए कभी नहीं चाहते हो। तुम दूसरे के लिए उससे विपरीत चाहते हो। अपने लिए सुख, दूसरे के लिए दुख। क्योंकि जीवन प्रतिस्पर्धा है, प्रतियोगिता है, महत्वाकांक्षा है, पागलपन है, छीन-झपट है, गलाघोंट संघर्ष है।

लेकिन सुख हमारा दूसरे के दुख में है। सारी प्रसन्नता किसी की उदासी पर खड़ी है। सारा धन दूसरे की निर्धनता में है। लाख तुम दूसरे के दुख में सहानुभूति प्रगट करो, जब भी दूसरा दुखी होता है, कहीं गहरे में तुम सुखी होते हो। और तुम्हारी सहानुभूति में भी तुम्हारे सुख की भनक होती है।

तुमने कभी पकड़ा अपने को सहानुभूति प्रगट करते हुए? किसी का दिवाला निकल गया, तुम सहानुभूति प्रकट करने जाते हो। कहते हो, बड़ा बुरा हुआ! लेकिन कभी अपना चेहरा आईने में देखा, जब तुम कहते हो, बड़ा बुरा हुआ-तो कैसी रसधार बहती है! जब किसी को लाटरी मिल गई हो, तब तुम कहने गए कि बहुत अच्छा हुआ।

जब कोई सुखी होता है, तब तुम अपना सुख प्रगट करने नहीं जाते, तब तो ईर्ष्या पकड़ लेती है। तब तुम कहते हो-धोखेबाज है, बेईमान है। तब परमात्मा से कहते हो, यह क्या हो रहा है तेरे जगत में? पापी और व्यभिचारी जीत रहे हैं और पुण्यात्मा हार रहे हैं। पुण्यात्मा यानी तुम! पापी यानी वे सब जो जीत रहे हैं! जब भी कोई जीत जाता है तब तुम अपने को सांत्वना देते हो कि जरूर किसी गलत ढंग से जीत गया होगा, कोई बेईमानी की होगी, रिश्वत दी होगी, कोई रिश्तेदारी खोज ली होगी।

तुमने कभी देखे ये दोहरे मापदंड?

महावीर इस पहले सूत्र में ही तुम्हें मौत का पहला पाठ देते हैं। चाह की जड़ ही काट दी। कहा, जो तुम अपने लिए नहीं चाहते, वह दूसरों के लिए भी मत चाहो। लोगों ने अपने लिए तो स्वर्ग की कल्पनाएं की है और दूसरों के लिए नर्क का इतंजाम किया है। नहीं, अगर तुम अपने लिए नर्क नहीं चाहते तो दूसरे के लिए भी मत चाहो।

यह महावीर का आधार सूत्र है। यह बड़ा सीधा और सरल दिखता है ऊपर से, लेकिन इसका जाल बहुत गहरा है। और सूत्र बड़ी गहराई में तुम्हारे अचेतन को रूपांतरित करने वाला है। अगर तुम एक भी सूत्र का पालन कर लो तो तुम्हें पूरा धर्म उपलब्ध हो जाएगा। अपने लिए वही चाहो जो तुम दूसरो के लिए भी चाहते हो। और जो तुम अपने लिए नहीं चाहते वह दूसरे के लिए भी मत चाहो। इसके बाद अचानक तुम पाओगे कि तुम्हारे जीवन की आपाधापी खो गई। अचानक तुम पाओगे कि प्रतिस्पर्धा मिट गई। महत्वाकांक्षा को जगह न रही। यही जिन शासन है।

जीवन और मृत्यु

राष्ट्रीय सहारा, नई दिल्ली, 6 अक्टूबर, 2012

चीन में लाओत्से के समय में ऐसी प्रचलित धारणा थी कि आदमी के शरीर में नौ छेद होते हैं। उन्हीं नौ छेदों से जीवन प्रवेश करता है और उन्ही से बाहर निकलता है। दो आंखें, दो नाक के छेद, मुंह, दो कान, जननेंद्रिय, गुदा। इसके साथ चार अंग हैं-दो हाथ और दो पैर। सब मिला कर तेरह। यही तेरह अंग जीवन के साथी हैं और मृत्यु के भी साथी हैं। यही तेरह जीवन में लाते हैं और यही जीवन से बाहर ले जाते हैं। तेरह का मतलब यह पूरा शरीर। इन्हीं से तुम भोजन करते हो; इन्ही से जीवन पाते हो; इन्हीं से उठते-बैठते और चलते हो। यही तुम्हारे स्वास्थ्य का आधार हैं और यही मृत्यु का भी आधार होंगे। क्योंकि जीवन और मृत्यु एक ही चीज के दो नाम है। इन्ही से जीवन तुम्हारे नाम आएगा, इन्हीं से बाहर जाएगा। इन्हीं से श्शरीर के भीतर खड़े हो। इन्हीं के साथ शरीर टूटेगा, इनके द्वारा ही टूटेगा।

हैरानी की बात है। यही तुम्हें संभालते हैं और यही मिटाएगें। भोजन तुम्हें जीवन देता है, शक्ति देता है और भोजन की शक्ति से अपने भीतर की मृत्यु को बड़ा किये चले जाते हो। भोजन तुम्हें बुढ़ापे तक पहुंचा देगा, मृत्यु तक पहुंचा देगा। आंख, नाक, कान से जीवन की श्वास भीतर आती है। उन्हीं से बाहर जाती है। नौ द्वार और चार अंग। लाओत्से कहता है-तेरह ही जीवन के साथी, तेरह ही मौत के साथी। ये तेरह ही ले जाते हैं। अगर तुम सजग हो जाओ तो तुम चौदहवें हो। इन तेरह के पार हो। इस तेरह की संख्या के कारण चीन और फिर धीरे-धीरे सारी दुनिया में, तेरह का आंकड़ा अपशकुन हो गया। इस सुपरस्टीशन की पैदाइश चीन में हुई। अमेरिका में होटलों में तेरह नंबर का कमरा नहीं होता; तेरह नंबर की मंजिल भी नहीं होती। क्योंकि कोई तेरह नंबर पर ठहरने को राजी नहीं है। तेरह शब्द से ही घबराहट होती है। बारह नंबर के कमरे के बाद चौदह नंबर आता है। असल में होता तो वह तेरहवां ही है, लेकिन जो ठहरता है, उसे चौदह याद रहता है। तेरह की चिंता नहीं पकड़ती।

चीन में बड़े अर्थपूर्ण कारण से यह विश्वास फैला। तेरह अपशकुन है। तुम चौदहवें हो और तुम्हें चौदहवें का कोई पता भी नहीं। तुम न जीवन हो, न मौत। तुम दोनों के पार हो। अगर इन तेरह के प्रति सजग हो जाओगे, पृथक हूं, मैं अन्य हूं। शरीर और, मैं और। और यह जो भीतर भिन्नता, शरीर से अलग चैतन्य का अविर्भाव होगा, इसकी न कोई मृत्यु है, न कोई जीवन है। यह न कभी पैदा हुआ, न कभी मरेगा।

प्रेम का उत्कर्ष

दैनिक जागरण, अमृतसर, 3 अक्टूबर, 2012

दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं-आस्तिक और नास्तिक। आस्तिक मैं उनको कहता हूं जिनकी जीवनचर्या प्रमाण देती है कि वे आस्तिक हैं। जिनकी जीवनचर्या ही उनकी श्रद्धा का सूचक है। इसलिए मेरा जोर जानने पर है, मानने पर नहीं। तुम भगवान पर इतना कम भरोसा करते हो, इसलिए मान लेते हो। क्योंकि तुम जानते हो कि अगर जानने गए तो शायद मिले न मिले, मान ही लो। तुम्हें बहुत भरोसा भी नहीं है।

मैं तुमसे कहता हूं कि जानो, क्योंकि डर की कोई बात नहीं है। परमात्मा है। वह तुम्हारे जानने से मिट नहीं जाएगा और तुम्हारे मानने से अगर नहीं होगा, तो हो नहीं जाएगा। जो नहीं है, वह नहीं होगा, तुम कितना भी मानो। और जो है, रहेगा। न मानो, तब भी रहेगा। मानो तब भी रहेगा। तुम्हारे जानने-मानने से कोई अंतर नहीं पड़ता अस्तित्व में। परमात्मा है।

इसलिए मैं तुम्हे कमजोर नहीं बनाता और तुम्हें भयभीत नहीं करता। मैं तुमसे यह नहीं कहता कि अगर तुमने विश्वास खोया तो तुम भटक जाओगे। नहीं, मैं तुमसे कहता हूं, विश्वास के कारण तुम भटके हो।

एक घटना मैंने सुनी है। अमेरिका में तत्कालीन राष्ट्रपति कैनेडी के भाई की हत्या हो गई। सिरहान नाम के आदमी ने हत्या की थी। पूरे अमेरिका में यही पूछा जा रहा था की हत्या क्यों की गई? कोई कारण नहीं दिखाई पड़ रहा था। सिरहान का पिता इजराइल में रहता था। पत्रकार वहां भी पहुंच गए। उन्होंने सिरहान के पिता से पूछा, तुम तो अपने बेटे को भली-भांति जानते होगे, यह हत्या क्यों की गई?

सिरहान के पिता ने कहा-मुझे कुछ पता नहीं है। मैं तो खुद विभ्रम में पड़ गया हूं। मैंने तो अपने हर बच्चे को ईश्वर से डरना सिखाया था, मेरा छोटा बेटा ऐसा कैसे कर बैठा?

अगर तुम मुझसे पूछो तो ईश्वर का डर सिखाना ही असल में उपद्रव की जड़ है। भय और ईश्वर, इसी में मनुष्य जाति के सारे पाप छिपे हैं।

भय किसी का भी हो, मनुष्य को विकृत करता है। वह विकसित होने नहीं देता। आकाश में बैठे किसी परमात्मा का भय तुम्हें संकुचित करता है, गुलाम बनाता है। तुम्हें अपना मालिक बनने नहीं देता। जिससे तुम भय करते हो, उससे कभी प्रेम कर ही न पाओगे। भय से तो कभी प्रेम नहीं होता। जब तुम भय सिखाते हो, तो तुमने अनजाने में घृणा सिखा दी। प्रेम सिखाओ, भय मत सिखाओ।

तुम सभी को भय सिखाया गया है। भय के कारण तुम्हारा भगवान है। भय के कारण तुम कांप रहे हो। तुम्हारी प्रार्थनाओं में आनंद-उत्सव नहीं है, सिर्फ भय का कंपन है। तुम डरते हो नर्क से, प्रलोभित हो स्वर्ग से।

मनुष्य की छाती से भय का पत्थर हटना चाहिए। प्रेम के फूल खिलने चाहिए। प्रेम का ही आत्यंतिक अनुभव परमात्मा है। इसलिए मैं तुमसे यह भी नहीं कहता कि परमात्मा से प्रेम करो। मैं तो बस यह कहता हूं कि प्रेम करो और एक दिन तुम पाओगे कि प्रेम करते-करते परमात्मा तुम्हरे द्वार पर आ गया है। अपने बच्चे को, पत्नी को, परिवार को, परिजनों को, प्रियजनों को, मनुष्यों को, पशुओं को, पक्षियों को, पौधों को, पहाड़ों को, जहां तक तुमसे बन पड़े प्रेम फैलाओ। जैसे-जैसे तुम्हारा प्रेम फैलने लगेगा, वैसे-वैसे तुम पाओगे कि परमात्मा की झलक आनी शुरू हो गई। जिस दिन तुम्हारा प्रेम विराट हो जाता है और तुम प्रेममय हो जाते हो, उसी दिन तुम पाते हो कि परमात्मा उतर आया है। इसीलिए मैं कहता हूं कि भक्ति प्रेम की ही आत्यंतिक उत्कर्ष की दशा है। परमात्मा को भूलो और प्रेम को जीवन में उमगाओ। जैसे-जैसे तुम्हारा प्रेम बढ़ता जाएगा, तुम्हारे और परमात्मा के बीच का फासला कम होता चला जाएगा।

देश में पहली बार ओशो सेंटर को अनूठी कार्यशाला इंदौर में

अवधप्रांत, लखनऊ, 2 अक्टूबर,2012

मध्य प्रदेश के इंदौर में ओशो इंटरनेशनल मेडिटेशन रिसोर्ट के माध्यम से पांच से सात अक्तूबर तक 'उड़ियो पंख पसार' विषय पर एक कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। ओशो रिसोर्ट पुणे की निर्देशक अमृत साधना के निर्देशन में होने वाली इस कार्यशाला में नादब्रम्ह ध्यान..योग और प्राणायाम के माध्यम से गृहस्थ जीवन के रोजमर्रा के तनाव दूर करने के तरीके बताये जाएंगे। कार्यशाला की आयोजक अग्रवाल समाज के महिला प्रकोष्ठ की अध्यक्ष श्रीमती प्रतिभा मित्तल ने बताया कि भौतिक आपाधापी और अनेक अन्य कारणों के चलते अधिकांश परिवारों में तनाव बढ़ रहा है। ओशो द्वारा अपने जीवन काल में पश्चिमी देशों में बिखरते परिवारों को जोड़ने के लिए प्रशिक्षित शिष्यों के माध्यम से इस तरह के आयोजन किये गए थे।

उन्होंने बताया कि इस कार्यशाला में किसी प्रकार के तंत्र मंत्र या सम्मोहन विधा का प्रयोग नहीं किया जाएगा।

इस तीन दिवसीय कार्यशाला में अग्रवाल समाज के 60 दंपति हिस्सा लेंगे। पहले दो दिन महिलाएं और अंतिम दिन दंपत्ति एक साथ ध्यान करेंगे।

अमृत साधना पहले दिन मस्तिष्क में आ रहे अनचाहे विचारों को रोकने के लिए क्रिया कराएंगी। इससे मानसिक तनाव दूर होकर गृहस्थी के दायित्वों कि तरफ फोकस बढ़ता है। ध्यान के साथ दंपत्तियों के काउंसलिंग का भी विशेष सत्र होगा।