Osho World Online Hindi Magazine :: September 2012
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युवा और राजनीति

सब राजनीतिज्ञ उत्सुक हैं युवकों में, लेकिन युवको को राजनीतिज्ञो में उत्सुकता बिलकुल छोड़ देनी चाहिए। हां, राजनीति में उत्सुकता लेनी चाहिए, लेकिन इस हिसाब से कि हम समझ पायें...

मैं विद्यार्थियों से कहना चाहूंगा, उनके सामने सबसे बड़ा सवाल है, देश की प्रतिभा में रोज नए चांद लगाना। देश की प्रतिभा कैसे निखरे, इसके लिए देश उनको पच्चीस वर्ष तक भोजन की, कपड़े की सारी व्यवस्था कर रहा है। उनसे देश और कोई अपेक्षा नहीं करता। उनसे सिर्फ अपेक्षा करता है कि देश की प्रतिभा को ऊंचाइयों पर ले जायें। गौरी शंकर तक पहुंचा दें, शिखरों को छुआ दें। दुनिया में कोई प्रतिभा उनसे आगे न हो। पूरा देश उनके लिए मेहनत करके इस आशा से पच्चीस वर्ष सुरक्षित कर रहा है, और वे-वे अगर राजनीतिक नेताओं के पीछे नारेबाजी में लगे हैं और झंडे लेकर जयजयकार कर रहे हैं तो वे देश के साथ बहुत नुकसान कर रहे हैं, और अपने साथ भी नुकसान की बात कर रहे हैं।

मैं विद्यार्थियों के राजनीति में भाग लेने के एकदम विरोधी हूं। इसलिए विरोधी हूं कि विद्यार्थी का मतलब ही खत्म हो जाता है। हां, विद्यार्थी राजनीति समझे, और ठीक से समझे ताकि कल जब वह पच्चीस साल का होकर यूनिवर्सिटी के बाहर आये और जिंदगी में उतरे, तो उसे कोई दो कौड़ी के आदमी राजनीति में धोखेबाजी न कर सकें। कोई भी मुल्क के ऊपर हावी न हो सकें। लेकिन, जो हुकूमत में नहीं है वे राजनीतिज्ञ उसको कहते रहेंगे कि राजनीति में आओ। उसे लगाते रहेंगे। आखिर उनकी इतनी आतुरता विद्यार्थी के प्रति क्यों? उसका कारण है कि विद्यार्थी शक्ति का स्रोत है। विद्यार्थी जिसके साथ खड़ा हो जाये वह गलत हो कि सही, उसके पास शक्ति उपलब्ध हो जाती है। इसलिए जवान का शोषण हमेशा किया जाता रहा है। चाहे कोई भी मूवमेंट हो, आंदोलन हो, जवान को पकड़ने की कोशिश की जाती है। हिटलर ने नाजी पार्टी बनायी, उसने दूसरों की फिक्र न की। वह छोटे-छोटे बच्चों और जवानो के पास गया। उसने उनको पकड़ने की कोशिश की क्योंकि कल वे जवान होंगे, कल उनके हाथ में ताकत आएगी और फिर उनके द्वारा सब कुछ करवाया जा सकता है।

सब राजनीतिज्ञ उत्सुक हैं युवकों में, लेकिन युवको को राजनीतिज्ञो में उत्सुकता बिलकुल छोड़ देनी चाहिए। हां, राजनीति में उत्सुकता लेनी चाहिए, लेकिन इस हिसाब से कि हम समझ पायें। भाग लेने का कोई सवाल नहीं है। भाग लेने का वक्त आएगा। इतनी जल्दी भी क्या है? भाग लेने का वक्त जल्दी आ जायेगा। उसके पहले बुद्धि परिपक्व हो, हम ठीक से समझ पायें देश का हित क्या है, अहित क्या है, जगत की व्यवस्था क्या है? अभी हम नहीं समझ पा रहे हैं। अगर हिन्दुस्तान का विद्यार्थी राजनीति को ठीक से समझे तो बहुत हैरान होगा। हिन्दुस्तान में राजनीति के नाम से क्या हो रहा है, बहुत अजीब बात है।

हिंदुस्तान का कांसटीट्युशंस अगर हम उठाकर देखें तो जिसको पहले भानुमती का पिटारा कहते थे, वही है। सारी दुनिया के सारे कांसटीट्युशंस में से चुनकर जो भी ठीक मालूम पड़ा है इकठ्ठा कर लिया है। जैसे कि बिल्ली कि आंख अच्छी लगी तो आंख ले ली, कुत्ते की टांग अच्छी लगी तो टांग ले ली, सब इकट्ठा कर लिया, कौवे के पंख अच्छे लगे तो पंख ले लिए। अब एक जानवर बना है जिसमे कोई जान ही नहीं है। और वह कोई जानवर भी नहीं है। भगवान भी नहीं पहचान सकता है कि यह कौन है? राजनीतिक बोध हमारा बहुत कम है, अत्यंत कम है।

वह राजनीतिक बोध हिन्दुस्तान को कौन देगा? हिन्दुस्तान में आने वाले पीढ़ी अगर राजनीति को ठीक से समझती है तो बोध पैदा होगा। कैसा दुर्भाग्य है कि एक राजनीतिक पार्टी खड़ी होती है तो चुनाव चिन्ह पर भी जीत जाती है। चिन्ह बहुत महत्वपूर्ण है। गाँवों में जाकर समझाया जा सकता है कि अगर बैल न रहेंगे तो तुम खेती कैसे करोगे? और बेचारा किसान सोचता है कि बात तो ठीक है, अगर बैल न रहे तो खेती कैसे करेंगे? बैल जोड़ी को वोट देनी चाहिए।

जहां राजनीतिक चेतना इतनी कम है वहां हिन्दुस्तान के युवकों में राजनीतिक चेतना में निष्णात होने की जरुरत है। राजनीति में भाग जितना जल्दी आप लेंगे, उतने अपरिपक्व होंगे। रुकें, अध्ययन करें, जाने समझें, चारों तरफ की जिंदगी को देखें। दुनिया का इतिहास देखें, दुनिया की आज की व्यवस्था देखें और सोचें कि इस देश के लिए हमें क्या करना है। कल वक्त आएगा, उसके लिए तैयार हो जाएं। लेकिन अगर आज आप कूद जाते हैं तो सिर्फ आपका शोषण होगा, और कुछ भी नहीं हो सकता है। विद्यार्थी राजनीति में भाग लेंगे, देश का दुर्भाग्य ही हो सकता है सौभाग्य नहीं।

लेकिन राजनीतिज्ञ चाहते हैं। वे चाहते हैं कि भाग लो, कुछ चाहते हैं कि मत लो; लेकिन वे दोनों की राजनीतिक चालें हैं। जो आज कहता है मत लो, अगर कल अपदस्थ हो जायेगा तो वह कहेगा, लो। और जो आज कहता है राजनीति में भाग लो, कल हुकूमत में पहुंच जायेगा, वह कहेगा, बस अब ठीक है, काम पूरा हो गया, अब तुम पढ़ने जाओ। अब तुम्हारी कोई जरुरत नहीं है। नहीं, इन दोनों राजनीतिज्ञों से सावधान हो जाने की जरुरत है। हिंदुस्तान को राजनीतिज्ञों से सावधान होना ही पड़ेगा, अन्यथा हिंदुस्तान का राजनीतिज्ञ हिंदुस्तान को रोज नर्क में ले जायेगा। वह यात्रा करवा रहा है बीस साल में उसने बड़ी कुशलता से यह कार्य किया है। आगे भी वह अपनी कुशलता बढ़ाये चला जा रहा है। देश को नर्क में ले जाने के लिए उसकी कुशलता बढती चली जा रही है।

-ओशो
पुस्तकः भारत के जलते प्रश्न
प्रवचन न. 5 से संकलित