Osho World Online Hindi Magazine :: September 2012
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आनंद और उत्सव

"उत्सव क्या है? जब आनंद उपलब्ध होता और उसे कहने का कोई उपाय नहीं मिलता, तो उस असहाय अवस्था में उत्सव पैदा होता है। उत्सव, आनंद को भाषा में व्यक्त नहीं किया जा सकता, इसलिए पैदा होता है। नाच कर कोई कहता है! जो नहीं कहा जा सकता वाणी से, बांसुरी बजा कर कहता है। कृष्ण ने बांसुरी बजाई। नहीं कह सकता, नहीं बतला सकता, तो अपनी अलमस्ती से, अपने होने से उसके प्रमाण देता है वही उत्सव है।" -ओशो

 

धार्मिकता, सभ्यता और संस्कृति ही भारत की अनूठी पहचान है। इस अनुपम छठा के कारण ही भारतीय सभ्यता दुनिया के अन्य देशों की सभ्यता से सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। इसी धरती पर कृष्ण, राम और नानक, ने जन्म लेकर भारत की धरा को पावन किया है। जो मनुष्य को मर्यादा, कर्तव्य और सत्य के मार्ग पर चलने के लिए हमेशा प्रेरित करते रहे है। व्रत, त्यौहार और उत्सव ये हमारी संस्कृति की अद्वितीय पहचान है ये वो पल हैं जो हमारे जीवन में खुशियों और उल्लास का संगीत भर देते है। आधुनिक मानव विकास की दौड़ में चकाचौंध एवं अत्यधिक कामकाजी होने के कारण खुशी और आनंद के पलों से वंचित होता जा रहा है। जिन्हें ये उत्सव आनंदित होने का बेहतर मौका प्रदान करते है।

भारतीय सनातन धर्म में सदैव त्यौहारों और उत्सवों का विशेष महत्व रहा है। पर्वो के इसी क्रम में एक विशेष दीपों का त्यौहार आता है जिसे हम दीपावली कहते है। देश भर में यह दिन बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। हर जगह खुशियों ही खुशियों के दीपक जलाये जाते है। कहीं पर भी अंधेरे का नामोनिशान नहीं होता है। चारों तरफ प्रकाश ही प्रकाश होता है। आनंद, खुशी और प्रकाश का ऐसा संगम हमे दीपावली के दिन में ही देखने को मिलता है। लेकिन वास्तव में हमें इस पर्व का वास्तविक लाभ और असीम आनंद तभी मिल सकता है जब हम इस दिन तमाम व्यसनों, जुआ और शराब जैसी बुराईयों से दूर रहकर उत्सव के आनंद में आनंदित होकर झूम उठे।

 

सद्गुरु ओशो कहते हैं-ज्योति जलाओ। भीतर दीये की ज्योति को उकसाओ। बुझ नहीं गई है। क्योंकि तुम्हें बोध हो रहा है कि जीवन व्यर्थ गया।। किसे यह बोध हो रहा है? उस बोध का नाम ही ज्योति है। यह कौन तिलमिला गया है? यह कौन नींद से जाग उठा है? यह कौन-जिसका स्वप्न टूट गया है? इसी को पकड़ो। इसी को सम्हालो। इसी धीमी सी उठती आवाज को अपना सारा जीवन दो। इसी धीमी सी जगमगाती लौ को अपनी पूरी उर्जा दो। और तुम्हारे भीतर प्रज्वलित अग्नि, जो तुम्हारे अहंकार को गलाएगी, जो तुम्हारे अंधकार को काटेगी, और जो तुम्हारे लिए परम प्रकाश का पथ बन जाएगी।

मैं इस दीये के जलाने की प्रक्रिया को ध्यान कहता हूं।

एक अंधेरी रात में किसी सुनसान सड़क पर दो आदमी मिले। पहले ने कहाः मैं एक दुकान की खोज में हूं जिसे लोग दीये की दुकान कहते हैं।’

दूसरे ने कहा,‘मैं यहां पास ही रहता हूं और तुम्हें उसका रास्ता बता सकता हूं।’

‘मैं खुद खोज लूंगा। मुझे रास्ता बता दिया गया है और उसे मैंने लिख भी लिया है।’ पहला आदमी बोला।

‘फिर तुम इस संबंध में बात ही क्यों करते हो?’ दूसरे ने पूछा।

‘सिर्फ बात करने के लिए।’

‘लेकिन अच्छा रहेगा, किसी स्थानीय व्यक्ति से जानकारी ले लो।’

‘जो मुझे बताया गया है उसे पर मुझे भरोसा है; वही मुझे यहां तक लाया भी है। मैं किसी और आदमी या चीज का भरोसा नहीं कर सकता।’ पहला आदमी बोला।

‘यद्यपि तुमने पहले मार्गदर्शक का भरोसा किया, तो भी यह नहीं सीखा कि कैसे और किस पर भरोसा किया जाये।‘ दूसरे ने कहा।

‘ऐसा ही है।’

दीये की दुकान किसलिए खोज रहे हो?’

‘बड़े सूत्र से मुझे बताया गया कि वहां वे वह उपाय बताते हैं, जिससे कोई अंधेरे में भी पढ़ सके।’

‘ठीक है। लेकिन उसकी एक पूर्व शर्त है, और सूचना भी। दीये से पढ़ने की पूर्वशर्त यह है कि तुम्हें पहले पढ़ना आता हो। और सूचना यह कि दीये की दुकान तो वहीं है, लेकिन दीये वहां से अन्यत्र हटा दिये गये हैं।’

‘दीया क्या है यह मैं नहीं जानता। लेकिन इतना तो साफ है कि दीये की दुकान वह है जहां वैसी तरकीब का पता मिलता हो।’

‘लेकिन दीये की की दुकान के दो भिन्न अर्थ भी हो सकते हैं। एक वह जगह जहां हो मिलते हो, और दूसरा वह जगह जहां दिये कभी मिलते थे।’

तुम यहां बात सिद्ध नहीं कर सकते।’

‘अनेक लोग तुम्हें बेवकूफ समझेंगे।’

अनेक लोग तुम्हें ही बेवकूफ समझेंगे, या शायद तुम्हारा इरादा कुछ और है। तुम मुझे वहां भेजना चाहते हो जहां तुम्हारे दोस्त दीये बेचते हों, या तुम चाहते हो कि मुझे दीया ही नहीं उपलब्ध हो।’

‘मैं उससे भी बुरा हूं। तुम्हें दीये की दुकानों का वचन देने और वहां तुम्हारी समस्याओं के हल पाने का भरोसा कराने के बजाय मैं पहले यह जानना चाहूंगा कि तुम पढ़ भी सकते हो कि तुम वैसी दुकान के करीब हो? या कि तुम्हारे लिए और ढंग से दीया प्राप्त किया जाये।’

दोनों आदमियों ने एक क्षण के लिए एक दूसरे को उदास आंखों से देखा और फिर वे अपनी-अपनी राह चले गये।

ओशो
पुस्तकः दीया तले अंधेरा
एवं मृत्योर्मा अमृतं गमय से संकलित