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प्रगतिशील कौन?

प्रगतिशील होने के लिए अनिवार्य है कि अतीत के ज्ञान को न पकड़ें। भविष्य के लिए ओपनिंग तभी हो सकती है जब हम अतीत के प्रति जोर से पकड़ नहीं लिए गए हैं। जिसने अतीत को जोर से पकड़ लिया वह भविष्य के प्रति बंद हो जाता है। वह प्रगतिशील नहीं रह जाता है

कौन है प्रगतिशील, अगर यह पकड़ में आ सके, अगर यह मुट्ठी में बंद हो जाये तो समझना कि प्रगतिशील मर चुका है। आर्थोडाक्स ही सिर्फ पकड़ में आता है। वह डिफाइनेबल है, उसकी व्याख्या हो सकती है। प्रगतिशील का अर्थ यह है कि जिसका कोई संबंध अतीत से नहीं है, भविष्य से है। भविष्य अभी पैदा नहीं हुआ। जो पैदा हो गया है उसके संबंध में निश्चित हुआ जा सकता है कि वह क्या है और जिसका संबंध भविष्य से है उसके संबंध में बहुत निश्चित नहीं हुआ जा सकता है कि वह क्या है। क्योंकि उसका संबंध अनबार्न से है, वह जो नहीं पैदा हुआ है उससे। हम एक बूढ़े के संबंध में निश्चित कह सकते हैं कि वह क्या है। हम एक बच्चे के संबंध में निश्चित नहीं कह सकते कि वह क्या है क्योंकि बच्चा अभी होने को है और जिस दिन हो चुका होगा उस दिन बच्चा नहीं होगा। उस दिन वह बूढ़ा हो गया होगा।

तो प्रगतिशील को ठीक से पकड़ने कि सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि वह हवा की तरह है। और इसी से एक दूसरी बड़ी महत्वपूर्ण बात ख्याल में आ सकती है, वह यह कि दुनिया में जितनी आर्थोडाक्सी हैं वे सब कब प्रगतिशील थीं। बुद्ध अपने जमाने में प्रगतिशील थे लेकिन जिस दिन पकड़ में आ गए हैं उस दिन आर्थोडाक्स हो गए हैं। महावीर अपने जमाने में प्रगतिशील थे लेकिन जैन प्रगतिशील नहीं थे। वे महावीर को पकड़ लिए हैं, महावीर बंद हो गए हैं, मुट्ठी बंद हो गई है। जीसस क्राइस्ट अपने जमाने में प्रगतिशील थे। ईसाईं, प्रगतिशील नहीं हैं। क्राइस्ट मुट्ठी में, पकड़ में आ गए हैं। जिस क्षण भी प्रगतिशील पर मुट्ठी बंध जाती है, उसी क्षण रूढ़ि पैदा हो जाती है, उसी क्षण परंपरा पैदा हो जाती है।

इसलिए पहली कठिनाई आपको साफ कर दूं प्रगतिशील शब्द इनडिफाइनेबल है, उसकी व्याख्या नहीं हो सकती। हां उसकी व्याख्या ऐसे ही हो सकती है जैसे हम स्वास्थ्य की व्याख्या करते हैं। हम कहते हैं, जो बीमार नहीं है वह स्वस्थ है। लेकिन यह स्वास्थ्य की परिभाषा नहीं हुई, यह बीमारी की चर्चा हुई। जब भी हमें स्वस्थ आदमी की व्याख्या करनी होती है कि कौन स्वस्थ है तो कहना पड़ता है, जो बीमार नहीं है। इसका मतलब यह हुआ कि स्वास्थ्य कि कोई परिभाषा नहीं हो सकती। सिर्फ बीमारी की परिभाषा होती है। और जब बीमारी नहीं होती है तो जो शेष बच जाता है, दि रिमेन, वह स्वास्थ्य होता है।

रूढ़ि की परिभाषा हो सकती है, आर्थोडाक्सी की परिभाषा हो सकती है। और जिस आदमी के भीतर रूढ़ि नहीं होती वह प्रगतिशील होता है। प्रगतिशील की सीधी परिभाषा नहीं होती है। वह तो रूढ़िग्रस्त नहीं है, वह जो आर्थोडाक्स नहीं है-निगेटिव, नकारात्मक परिभाषा ही हो सकती है। और यह बड़े मजे की बात है कि जिंदा चीजों कि परिभाषा सदा नकारात्मक होती है। सिर्फ मरी हुई चीजों कि परिभाषा पोज़िटिव होती है। जो चीज़ मरी होती है, वी कैन डिफाइन ईट पोजिटिवली एंड दैट व्हिच इज लिविंग कैन ओनली बी डिफाइन्ड निगेटिवली। असल में जिंदगी मुट्ठी में पकड़ नहीं आती, सिर्फ मौत पकड़ में आती है। जो मरी हुई है उसकी हम परिभाषा कर सकते हैं। हम कह सकते हैं, मशीन क्या है। हम कह सकते हैं कि कुर्सी क्या है। हम नहीं कह पाते कि आदमी क्या है। हम कह सकते हैं कि बीमारी क्या है। हम नहीं कह पाते कि स्वास्थ्य क्या है। जो भी चीज जीवित है, जो भी लिविंग है वह मुट्ठी के बाहर हो जाती है, वह हवा कि तरह हो जाती है।

प्रेम कि परिभाषा नहीं हो सकती, विवाह कि परिभाषा हो सकती है। क्योंकि मैरिज एक मरी हुई चीज है। प्रेम एक जिंदा चीज है। इसलिए विवाह के संबंध में अदालतों में मुकदमे लड़े जा सकते हैं और डेफिनेशन हो सकती है। लेकिन प्रेम के संबंध में कोई डेफिनेशन नहीं हो सकती। अब तक प्रेम पर बहुत कविताएं लिखी गई हैं लेकिन डेफिनेशन अब तक नहीं लिखी गई। उसकी कोई परिभाषा न हो सकी है कि प्रेम क्या है। विवाह की परिभाषा सुनिश्चित है। विवाह क्या है, इसे तय किया जा सकता है, वह मरी हुई चीज है। सब मरी हुई चीजें तय हो जाती हैं। जिन्दा चीजें तय नहीं होतीं। यह जिंदा होने के लक्षण है। तो पहली बात मैं कहना चाहूंगा कि प्रगतिशील चित्त जिंदा चित्त है, लिविंग माइंड है। इसलिए परिभाषा नकारात्मक होगी, निगेटिव होगी-वह जो रूढ़िग्रस्त नहीं है। तो ठीक से समझें कि रूढ़िग्रस्त कौन है तो शायद प्रगतिशील कौन है, उसकी तरफ इशारा हो सके।

साधारणतः हमारा मन अतीत से निर्मित होता है-पास्ट ओरिएंटेड होता है। हम जो भी जानते हैं। वह अतीत से आता है। यह बड़े मजे कि बात है कि हम जो भी जानते हैं वह अतीत से आता है और जो भी जीवन है वह भविष्य से आता है। इसीलिए जीवन और जानने में तालमेल कहीं भी नहीं होता। जो बहुत ज्यादा जानने को जोर पकड़ लेते हैं, जो ज्ञान को बहुत ज्यादा जोर से पकड़ लेते हैं उनके जिंदगी से संबंध टूट जाते हैं। और जिन्हें जिंदगी से संबंध जोड़ना है उन्हें ज्ञान से संबंध तोड़ने पड़ते हैं। ज्ञान बहुत रूपों में उपलब्ध होता है-शास्त्रों में उपलब्ध होता है, परंपराओं में उपलब्ध होता है, गुरु में उपलब्ध होता है, फिलासफी में, आइडिओलाजी में उपलब्ध होता है। जहां से भी ज्ञान कोई पकड़ लेगा जोर से वह प्रगतिशील नहीं रह जायेगा। प्रगतिशील होने के लिए अनिवार्य है कि अतीत के ज्ञान को न पकड़ें। भविष्य के लिए ओपनिंग तभी हो सकती है जब हम अतीत के प्रति जोर से पकड़ नहीं लिए गए हैं। जिसने अतीत को जोर से पकड़ लिया वह भविष्य के प्रति बंद हो जाता है। वह प्रगतिशील नहीं रह जाता है।

अगर कोई आदमी कहता है कि मैं जैन हूं तो वह प्रगतिशील नहीं हो सकता। क्योंकि जैन होना अतीत से बंधा हुआ है। भविष्य से उसका क्या नाता है! वह पच्चीस सौ वर्ष पहले महावीर हुए, उनसे बंधा हुआ है। अगर कोई कहता है कि मैं ईसाई हूं तो वह दो हजार साल पहले जो जीसस क्राइस्ट उनसे बंधा हुआ है। अगर कोई कहता है, मैं हिंदू हूं तो प्रगतिशील नहीं हो सकता। क्योंकि हिंदू होने की सारी व्यवस्था अतीत से आती है, भविष्य से हिंदू होने का क्या नाता है! अगर कोई कहता है, भारतीय हूं, पाकिस्तानी हूं, चीनी हूं, तो वह प्रगतिशील नहीं हो सकता। क्योंकि ये सारी की सारी बातें अतीत से जुड़ी हैं। इनका भविष्य से कोई नाता नहीं है।

-ओशो
पुस्तकः भारत के जलते प्रश्न
प्रवचन नं 17 से संकलित