Osho World Online Hindi Magazine :: September 2012
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  ध्यान विधि
 
 

आंतरिक अंधकार को बाहर लाओ...

"शिव ने कहा: जब वर्षा ऋतु की चंद्रविहीन रात न उपलब्ध हो तो आंखें बंद करो और अपने समक्ष अंधकार को खोज लो, फिर आंखे खोलते हुए अंधकार को देखो। इस प्रकार दोष सदा के लिये विलीन हो जाते हैं"

यह कुछ ज्यादा कठिन है। पिछली विधि में तुम वास्तविक अंधकार भीतर लिये चलते हो। इस विधि में तुम झूठे अंधकार को बाहर लाते हो-लाते चले जाते हो। अपनी आंखे बंद करो, अंधेरे को महसूस करो; आंखे खोलो, और खुली आंखो से अंधकार को बाहर फेंकते हो-उसे फेंकते रहो। इसमें तीन से छह सप्ताह तक लगेंगे, और तब एक दिन अचानक तुम आंतरिक अंधकार को बाहर ला पाओगे। जिस दिन तुम आंतरिक अंधकार को बाहर ला पाओ, तुमने भीतर के वास्तविक को ही लेकर चला जा सकता है; झूठे को लेकर नहीं चला जा सकता।

और यह बड़ा जादुई अनुभव है। यदि तुम आंतरिक अंधकार को बाहर ला सको, तो एक प्रकाशित कमरे में भी तुम उसे बाहर ला सकते हो, और अंधकार का एक टुकड़ा तुम्हारे समक्ष फैल जायेगा। यह बहुत ही अटपटा अनुभव है, क्योंकि कमरा प्रकाशित है। यदि तुम आंतरिक अंधकार तक पहुंच गये हो तो सूर्य के प्रकाश में भी उसे बाहर ला सकते हो। फिर अंधकार का एक टुकड़ा तुम्हारी आंखो के सामने छा जाता है। तुम उसे फैलाते चले जा सकते हो।

s एक बार तुम जान कि यह हो सकता है, तो सूर्य के पूरे प्रकाश में भी अंधेरी रात जैसा अंधकार फैला सकते हो। सूर्य निकला हुआ है, लेकिन तुम अंधकार फैला सकते हो। अंधकार सदा मौजूद है; जब सूर्य मौजूद हो तब भी अंधकार तो रहता ही है। तुम उसे देख नहीं सकते; वह सूर्य के प्रकाश ढंका रहता है। एक बार तुम जान जाओ कि उसे कैसे उघाड़ना है, तो तुम उसे उघाड़ सकते हो।

यही विधि है। पहले उसे भीतर अनुभव करो; उस गहन रुप से अनुभव करो ताकि उसे बाहर भी प्रत्यक्ष कर सको। तब अचानक आंखे खोलो और उसे बाहर अनुभव करो। इसमें समय लगेगा।

और यदि तुम आंतरिक अंधकार को बाहर ला पाओ तो दोष सदा के लिये विलीन हो जाते हैं, क्योंकि यदि आंतरिक अंधकार की अनुभूति हो जायें तो तुम इतने शीतल, इतने शांत, इतने अनुत्तेजित हो जाओगे कि दोष तुम्हारे साथ रह ही नहीं सकते।

इसे स्तरण रखोः दोष तभी रह सकते हैं जब तुममें उत्तेजित होने की संभावना हो, यदि तुममें उत्तेजित होने की प्रवृत्ति हो। वे अपने आप से ही नहीं रहते; वे तुम्हारे उत्तेजित होने की क्षमता के कारण होते हैं। कोई तुम्हारा अपमान कर देता है, और उस अपमान को आत्मसात कर लेने के लिये तुम्हारे भीतर कोई अंधकार न हो, तो तुम जलने लगते हो, क्रोधित हो जाते हो, प्रज्वलित हो जाते हो, और तब सब कुछ संभव है। तुम हिंसक हो सकते हो, वह काम तक कर सकते जो कोई पागल ही करे। कुछ भी संभव है-अब तुम पागल हो गये। कोई तुम्हारी प्रशंसा कर देता है: तब फिर तुम दूसरी अति पर पहुंचकर पागल हो जाते हो।

तुम्हारे चारों ओर परिस्थितियां हैं, और तुम उन्हें आत्मसात करने में सक्षम नहीं हो। किसी बुद्ध का अपमान करोः वह उसे आत्मसात कर सकता है, चुपचाप उसे निगल सकता है, पचा सकता है। उस अपमान को कौन पचाता है?-अंधकार का, मौन का विषाक्त चीज उसमें फेंक दो; वह आत्मसात हो जाती है। उससे कोई प्रतिक्रिया नहीं उठती। इसे करके देखो। जब कोई तुम्हारा अपमान करे, तो इतना स्मरण रखो कि तुम अंधकार से भरे हुये हो, और अचानक तुम्हें लगेगा कि कोई प्रतिक्रिया नहीं हो रही। तुम एक सड़क से गुजरते हो; किसी सुंदर हृदय या पुरुष को देखा-तुम उत्तेजित हो जाते हो। अनुभव करो कि तुम अंधकार से भरे हुये हो; अचानक उत्तेजना विलीन हो जाती है। यह बिलकुल प्रयोगात्मक है, इस पर विश्वास करने की कोई जरुरत नहीं है।

जब भी तुम्हें लगे कि तुम उत्तेजना से या इच्छा से या कामवासना से भर गये हो तो बस आंतरिक अंधकार का स्मरण करो। एक क्षण के लिये अपनी आंखे बंद करो और अंधकार को अनुभव करो और तुम देखोगे उत्तेजना विलीन हो गई, कामना नहीं रही। आंतरिक अंधकार ने उसे आत्मसात कर लिया। तुम एक अनंत शून्य हो गय जिसमें कुछ भी गिर जाये तो वापस नहीं लौटेगा। अब तुम एक अंतहीन खाई की भांति हो गये।

-ओशो
पुस्तकः ध्यान योगः प्रथम और अंतिम मुक्ति