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  ओशो जीवन रहस्य
 
 

टीके का गहरा प्रयोग!

पहली बार जब टीका लगाया जाये तो उसका पूरा अनुष्ठान है। और पहली दफे जब गुरु तिलक दे तब उसका पूरा अनुष्ठान है...

'टीके का प्रयोग एक बहुत ही गहरा प्रयोग है। लेकिन ठीक जगह पर हो, ठीक वस्तु का हो, ठीक नियोजित ढंग से लगाया गया हो। अन्यथा बेमानी है। सजावट हो कि श्रृंगार हो, तो उसका कोई मूल्य नहीं है, उसका कोई अर्थ नहीं है। तब वह सिर्फ एक औपचारिक घटना है। इसलिए उसका कोई अर्थ नहीं है तब वह सिर्फ एक औपचारिक घटना है। इसलिए पहली बार जब टीका लगाया जाये तो उसका पूरा अनुष्ठान है। और पहली दफे जब गुरु तिलक दे तब उसका पूरा अनुष्ठान है। उस पूरे अनुष्ठान से लगाया जाये तो ही परिणामकारी, होगा अन्यथा परिणामकारी नहीं होगा।

आज सारी चीजें हमें व्यर्थ मालूम पड़ने लगी हैं, उसका कारण है। आज तो व्यर्थ हैं। आज व्यर्थ हैं, क्योंकि उनके पीछे का कोई भी वैज्ञानिक रूप नहीं है। सिर्फ उपरी खोल रह गई है, जिसको हम घसीट रहे हैं, जिसको हम खीच रहे हैं बेमन से, जिसके पीछे मन का भी कोई लगाव नहीं रह गया है, आत्मा का कोई भाव नहीं रह गया है, और उसके पीछे कि पूरी वैज्ञानिकता का कोई सूत्र भी मौजूद नहीं है। यह जो आज्ञाचक्र है, इस संबंध में दो तीन बातें और समझ लेनी चाहिए, क्योंकि यह काम पड़ सकता है, इसका उपयोग किया जा सकता है।

इस चक्र कि जो रेखा है, आज्ञाचक्र की, इस रेखा से ही जुड़ा हुआ हमारे मस्तिष्क का वह भाग है, इससे ही हमारा मस्तिष्क शुरू होता है। लेकिन अभी भी हमारे मस्तिष्क का आधा हिस्सा बेकार पड़ा हुआ है साधारणतः। हमारा जो प्रतिभाशाली से प्रतिभाशाली व्यक्ति होता है, जिसको हम जीनियस कहें, उसका भी केवल आधा ही मस्तिष्क काम करता है, आधा तो काम नहीं करता। और वैज्ञानिक बहुत परेशान हैं, फिजियोलाजिस्ट बहुत परेशान हैं कि यह आधी खोपड़ी का जो हिस्सा है, यह किसी भी काम नहीं आता है। अगर आपके आधे हिस्से को काट कर निकाल दिया जाये तो आपको पता भी नहीं चलेगा। आपको पता ही नहीं चलेगा कि कोई चीज कम हो गई। क्योंकि उसका तो कभी कोई उपयोग ही नहीं हुआ है, वह न होने के बराबर है।

लेकिन वैज्ञानिक जानते हैं कि प्रकृति कोई भी चीज व्यर्थ निर्मित नहीं करती। भूल होती हो, एकाध आदमी के साथ हो सकती है। यह निरंतर हर आदमी के साथ आधा मस्तिष्क खाली पड़ा हुआ है। बिलकुल निष्क्रिय पड़ा हुआ है, उसमे कभी कोई चहल-पहल भी नहीं हुई है।

योग का कहना है कि वह जो आधा मस्तिष्क है वह आज्ञाचक्र के चलने के बाद शुरू होता है। आधा जो मस्तिष्क है वह आज्ञाचक्रों के नीचे के चक्रों से जुड़ा हुआ है और आधा जो मस्तिष्क है वह आज्ञाचक्रा के ऊपर के चक्रों से जुड़ा हुआ है। नीचे के चक्र शुरू होते हैं तो आधा मस्तिष्क काम करता रहता है, और जब आज्ञा के ऊपर काम शुरू होता है तब शेष आधा मस्तिष्क काम शुरू करता है।

इस संबंध में, हमे ख्याल भी नहीं आता जब तक कोई चीज सक्रिय न हो जाये, हम सोच भी नहीं सकते। सोचने का भी कोई उपाय नहीं है। जब कोई चीज सक्रिय होती है तभी हमे पता चलता है।

स्वीडन में एक आदमी गिर पड़ा ट्रेन से। और गिरने के बाद जब वह अस्पताल में भर्ती किया गया तो उसे दस मील के भीतर कि आस पास कि रेडियो कि आवाजें पकड़ने लगीं, उसके कान में। पहले तो वह समझा कि उसका दिमाग कुछ खराब हो रहा है। पहले तो साफ भी नहीं था, गुनगुनाहट मालूम होती थी। लेकिन दो-तीन दिन में ही चीजें साफ होने लगी। तब उसने घबड़ा कर डॉक्टर को कहा कि यह मामला क्या है? मुझे तो ऐसा सुनाई पड़ता है जैसे कि कोई रेडियो मेरे कान के पास लगाये हुए है। यहां तो कोई लगाये हुए नहीं है। डॉक्टर ने पूछाः तुम्हें क्या सुनाई पड़ रहा है? तो उसने जो गीत की कड़ी बताई वह डॉक्टर अभी अपने रेडियो से सुन कर आ रहा है। उसने कहाः यह मुझे अभी थोड़ी देर पहले सुनाई पड़ी। और फिर तो स्टेशन बंद हो गया टाइम बता कर, कि इतना टाइम है। तब तो रेडियो लाकर, लगा कर, जांच-पड़ताल कि गई। और पाया गया कि उस आदमी का कान ठीक रेडियो कि तरह रिसेप्टिव का काम कर रहा है, उतना ही ग्राहक हो गया है।

आपरेशन करना पड़ा। नहीं तो आदमी पागल हो जाये। क्योंकि ऑन-ऑफ का तो कोई उपाय नहीं था, वह चौबीस घंटे चल रहा था। जब तक स्टेशन चलेगा तब तक वह आदमी चल रहा था। लेकिन एक बात जाहिर हो गई कि यह भी कान कि संभावना हो सकती है। और यह तय भी हो गया उसी दिन कि इस सदी के पूरे होते होते हम कान का ही उपयोग करेंगे रेडियो के लिए। इतने-इतने बड़े यंत्रो को बनाने कि और धोने कि कोई जरुरत नहीं रह जाएगी। लेकिन तब एक छोटी सी व्यवस्था, जो कान पर लगाई जा सके और जिससे ऑन ऑफ किया जा सके, पर्याप्त होगा सिर्फ ऑन-ऑफ किया जा सके, उतनी व्यवस्था! पर उस आदमी कि आकस्मिक घटना से यह एक ख्याल पकड़ा, बिलकुल आकस्मिक!

इस जगत में जो जो नई घटनाएं घटती हैं या नए दृष्टिकोण खुलते हैं, वे हमेशा एक्सीडेंटल और आकस्मिक होते हैं। क्योंकि हम पिछले ज्ञान से तो उनका कोई अनुमान नहीं लगा सकते। अब हम कभी सोच ही नहीं सकते कि कान भी कभी रेडियो का काम कर सकता है। लेकिन क्यों नहीं कर सकता? कान सुनने का काम करता है, रेडियो सुनने का काम करता है। कान रिसेप्टिविटी है पूरी, रेडियो है। सच तो यह है कि रेडियो कान के आधार पर निर्मित है। माडल का काम तो कान ने ही किया है। कान की और क्या-क्या संभावनाएं हो सकती हैं, ये जब तक अचानक उद्घाटित न हो जाएं तब तक पता भी नहीं चल सकता।

-ओशो
गहरे पानी पैठ
प्रवचन नं. 3 से संकलित
पूरा प्रवचन एम. पी. थ्री. एवं पुस्तक में उपलब्ध है