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  ओशो-साहित्य परिचय
 
 

असंभव क्रांति

असंभव क्रांति पुस्तक ध्यान साधना शिविर, माथेरान में ओशो द्वारा दिये गये दस अमृत प्रवचनों अनुपम संकलन है।

पुस्तक का प्रकाशन पुणे के ओशो मीडिया इंटरनेशनल ने किया है। इसका प्रथम संस्करण सन् 1969 में प्रकाशित हुआ। 2012 में इस पुस्तक का द्वितीय संस्करण साजिल्द कवर पेज सहित प्रकाशित हुआ।

‘‘जीवन में चाहिए एक क्रांति, चाहिए एक परिवर्तन। और परिवर्तन अनेक अवसरों पर कष्टपूर्ण होता है। प्रसव की पीड़ा झेलनी पड़ती है। बच्चा पैदा होता है तो पीड़ा झेलनी पड़ती है। जीवन बदलता है तो बहुत सी पीड़ा झेलनी पड़ती है। उसकी तैयारी होनी चाहिए। आपकी तैयारी जितनी बढती जाएगी, मैं उतनी ज्यादा चोट पहुंचाने के लिए हमेशा उत्सुक रहूंगा। शायद धीरे-धीरे आपको यह दिखाई पड़े कि चोंटो ने आपका फायदा किया, आपको जगाया, आपको होश से भरा।’’

‘असंभव क्रांति’ कुछ ऐसे ही अलख जगाने वाली ओशो अमृत प्रवचनों संग्रह है। जिसके एक-एक प्रवचनों में कुछ अलग ही संदेश झलकता है। पुस्तक में क्रांति, ध्यान, धर्म और सत्य के अनूठे प्रवचनो का समावेश है। जो सद्गुरु ओशो के दिव्य संदेश की ओर ले जाते है।

पुस्तक में ओशो ने मनुष्य को जीने का सूत्र, भीड़ से मुक्ति, शास्त्र और किताब में फर्क क्या है? इसके अलावा धर्म और आत्मा के विज्ञान को बताने के साथ-साथ प्रेम को ही जीवन की सृजनात्मक आधार बताया है। ओशो कहते है-‘‘स्वतंत्रता विद्रोह नहीं है, क्रांति है।’’

‘असंभव क्रांति’ पुस्तक का पहला प्रवचन ‘सत्य के द्वार’ शीर्षक से शुरू होता है। जिसकी शुरूआत एक सम्राट की बोध कथा से होती है। जिसमें दुख और अशांति के कांटो से कैसे बचा जाए। आखिर इसके उपाय क्या हैं? पांचवें प्रवचन ‘क्रांति का क्षण’ में स्वयं के प्रकाश बनने के साथ ही ध्यान साधना के प्रयोगों पर ओशो ने अपनी दृष्टि से देखा है। इसके अतिरिक्त पुस्तक में कई अनसुलझे प्रश्नों को भी बड़ी आसानी से ओशो ने सुलझाया है। ‘असंभव क्रांति’ के मुख्य बिन्दुओं में मनुष्य होने की पहली शुरुआत भीड़ से मुक्ति है, धर्म आत्मा का विज्ञान है और प्रेम का जीवन ही सृजनात्मक जीवन है।

पुस्तक में कुल 196 पृष्ठ है जिसका मूल्य 340 रुपये मात्र है।

आस्तिक-नास्तिक

प्रस्तुत ओशो प्रवचन की डी.वी.डी. अपयु गई हिरई श्रृंखला के प्रवचन नं. 6 का सार है। जिसमें सदगुरु ओशो ने मनुष्यों के सर्वश्रेष्ठ आभूषणों की चर्चा की है। आस्तिकता और नास्तिकता के बारें में बोलते हुए ओशो कहते हैं: आस्तिक वह है जो जीवों में आस्था रखे, जो जीवन का अंगीकार करे। जो जीवन को कह सके ‘हा’ जिसके भीतर ‘नहीं’ न हो वही आस्तिक है।

इसलिए मैं बुद्ध को भी आस्तिक कहता हूं। उन्होंने ईश्वर को भी नहीं माना, आत्मा को भी नहीं, लेकिन फिर भी वे आस्तिक थे। महावीर को आस्तिक कहता हूं। यद्यपि वे भगवान को नही मानते हैं। ईश्वर से आस्तिकता और नास्तिकता से कोई संबंध नहीं हैं। यू तो दुनिया में भगवान को मानने वाले बहुत है। लेकिन आस्तिक कहां हैं अब हमें आस्तिक की कुछ नई गहराई खोजनी होगी। आस्तिक वह है जिसे कण-कण में भगवत्ता का बोध होता है।’’

ओशो संदेश प्रकाशन समूह की ओर से निर्मित आस्तिक-नास्तिक ओशो हिन्दी डी.वी.डी. का मूल्य 125 रुपये है।

अपनी पहचान

प्रत्येक मनुष्य की एक पहचान होती है वह पहचान है परमात्मा का अंश होना। प्रस्तुत हिन्दी प्रवचन डी.वी.डी. में सांच सांच सो सांच सीरीज़ के 9वें प्रवचन का प्रश्न नं. 1 व 2 में रहस्यदर्शी सद्गुरु बुल्लेशाह की वाणी पर बोले गए ओशो प्रवचनांश हैं। ओशो कहते हैं: ‘‘बुल्लेशाह की बातें तो ओस की बूंदों की तरह हैं मानों उनमें सागर समाया हुआ हो। और वह बूंद की क्या जिसमें सागर न समाया हो? वह शब्द ही क्या जिसमें निःशब्द की वीणा न बजती हो इसलिए बुल्लेशाह की अभिव्यक्ति को ज़रा और ढंग से लेना। वह कोई पंडित पुरोहित नहीं हैं। सिर्फ विचार करने बैठोगे तो चूक जाओगे। ये बातें तो निर्विचार में ही समाविष्ट होती हैं। होश में बैठकर विचार करो।’’

ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन के सौजन्य से निर्मित इस डी.वी.डी. के प्रवचन की अविधि 63 मिनट है। एवं मूल्य 300 रूपये है।

ओशो प्रेमियों एवं संन्यासियों के लिए यह ओशो साहित्य और डी.वी.डी. प्रवचन संग्रह नई दिल्ली स्थित ओशो वर्ल्ड गैलेरिया, ओशोधाम, ओशो राजयोग ध्यान केंद्र के अतिरिक्त हमारी वेबसाइट www.oshoworld.com पर भी उपलब्ध है।