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  रहस्यदर्शियों पर ओशो
 
 

संतों में कोहिनूर गोरख

गोरख ने जितना आविष्कार किया मनुष्य के भीतर अंतर-खोज के लिए, उतना शायद किसी ने भी नहीं किया है। उन्होंने इतनी विधियां दी की अगर विधियों के हिसाब से सोचा जाये तो गोरख सबसे बड़े आविष्कारक हैं

गोरख एक श्रृंखला की पहली कड़ी हैं। उनसे नए प्रकार के धर्म का जन्म हुआ, अविर्भाव हुआ। गोरख के बिना न तो कबीर हो सकते हैं, न नानक हो सकते हैं, न दादू, ना वाजिद, न फरीद, न मीरा-गोरख के बिना ये कोई भी न हो सकेंगे। इन सब के मौलिक आधार गोरख में है। फिर मंदिर बहुत ऊंचा उठा। मंदिर पर बड़े स्वर्ण-कलश चढ़े। लेकिन नींव का पत्थर नींव का पत्थर है। और स्वर्ण-कलश दूर से दिखाई दे जाते है, लेकिन नींव के पत्थर से ज्यादा मूल्यवान नहीं हो सकते है। और नींव के पत्थर किसी को दिखाई भी नहीं पड़ते, मगर उन्हीं पत्थरों पे टिकी होती है सारी व्यवस्था, सारी भित्तियां सारे शिखर। शिखरों की पूजा होती है, बुनियाद के पत्थरों को तो लोग भूल ही जाते है। ऐसे ही गोरख भी भूल गए हैं।

लेकिन भारत की सारी संत-परंपरा गोरख की ऋणी है। जैसे पतंजलि के बिना भारत में योग की कोई संभावना न रह जायेगी; जैसे बुद्ध के बिना ध्यान की आधारशिला उखड जायेगी; जैसे कृष्ण के बिना प्रेम की अभिव्यक्ति को मार्ग न मिलेगा-ऐसे गोरख के बिना उस परम सत्य को पाने के लिए विधियों की जो तलाश शुरु हुई, साधना की जो व्यवस्था बनी, वह न बन सकेगी। गोरख ने जितना आविष्कार किया मनुष्य के भीतर अंतर-खोज के लिए, उतना शायद किसी ने भी नहीं किया है। उन्होंने इतनी विधियां दी की अगर विधियों के हिसाब से सोचा जाये तो गोरख सबसे बड़े आविष्कारक हैं। इतने द्वार तोड़े मनुष्य के अंतरतम में जाने के लिए, इतने द्वार तोड़े कि लोग द्वारों में उलझ गये।

इसलिए हमारे पास एक शब्द चल पडा है-गोरख को तो लोग भूल गये-गोरखधंधा शब्द चल पडा है। उन्होंने इतनी विधियां दीं कि लोग उलझ गये की कौन-सी ठीक, कौन-सी गलत, कौन-सी करें, कौन-सी छोड़ें। अब कोई किसी चीज में उलझा हो तो हम कहते हैं, क्या गोरखधंधे में उलझ गया हो!

गोरख के पास अपूर्व व्यक्तित्व था, जैसे आइंस्टीन के पास व्यक्तित्व था। जगत के सत्य को खोजने के लिए जो पैने से पैने उपाय अलबर्ट आइंस्टीन दे गया, उसके पहले किसी ने भी नहीं दिये थे। हां, अब उनका विकास हो सकेगा, अब उन पर और धार रखी जा सकेगी। मगर जो प्रथम काम था वह आइंस्टीन ने किया है। जो पीछे आयेंगे वे नंबर दो होंगे। वे अब प्रथम नहीं हो सकते। राह पहली तो आइंस्टीन ने तोड़ी, अब इस राह को पक्का करनेवाले, मजबूत करनेवाले, मील के पत्थर लगानेवाले, सुंदर बनानेवाले, सुगम बनानेवाले बहुत लोग आयेंगे। मगर आइंस्टीन की जगह अब कोई भी नहीं ले सकता। ऐसी ही घटना अंतरजगत में गोरख के साथ घटी।

लेकिन गोरख को लोग भूल क्यों गये? मील के पत्थर याद रह जातें हैं, राह तोड़नेवाले भूल जाते हैं। राह को सजानेवाले याद रह जाते हैं, राह को पहली बार तोड़नेवाले भूल जाते हैं। भूल जाते हैं इसलिये कि जो पीछे आते हैं उनको सुविधा होती है संवारने की। जो पहले आता है, वह अनपढ़ होता है, कच्चा होता है। गोरख जैसे खदान से निकले हीरे हैं। अगर गोरख और कबीर बैठे हों तो तुम कबीर से प्रभावित होओगे, गोरख से नहीं। क्योंकि गोरख तो खदान से निकले हीरे हैं; और कबीर-जिन पर जौहरियों ने खूब मेहनत की, जिन पर खूब छेनी चली है, जिनको खूब निखार दिया गया है!

यह तो तुम्हें पता है ना कि कोहिनूर हीरा जब पहली दफा मिला तो जिस आदमी को मिला था उसे पता भी नहीं था कि कोहिनूर है। उसने बच्चों को खेलने के लिए दे दिया था, समझकर की कोई रंगीन पत्थर है। गरीब आदमी था। उसके खेत से बहती हुई एक छोटी-सी नदी की धार में कोहिनूर मिला था। महीनों उसके घर पड़ा रहा, कोहिनूर बच्चे खेलते रहे, फेंकते रहे इस कोने से उस कोने, आंगन में पडा रहा।

तुम पहचान न पाते कोहिनूर को। कोहिनूर का मूल वजन तीन गुना था आज के कोहिनूर से। फिर उस पर धार रखी गई, निखार किये गये, काटे गए, उस के पहलू उभारे गये। आज सिर्फ एक तिहाई वजन बचा है, लेकिन दाम करोड़ों गुना ज्यादा हो गये। वजन कम होता गया, दाम बढ़ते गये, क्योंकि निखार आता गया-और, और निखार। कबीर और गोरख साथ बैठे हों, तुम गोरख को शायद पहचानो ही न; क्योंकि गोरख तो अभी गोलकोंडा की खदान से निकले कोहिनूर हीरे हैं। कबीर पर धार रखी जा चुकी, जौहरी मेहनत कर चुके। कबीर तुम्हें पहचान में आ जायेंगे।

इसलिये गोरख का नाम भूल गया है। बुनियाद के पत्थर भूल जाते हैं।

गोरख के वचन सुनकर तुम चौकोंगे। थोड़ी धार रखनी पड़ेगी अनपढ़ हैं। वही धार रखने का काम मैं यहां कर रहा हूं। जरा तुम्हे पहचान आने लगेगी, तुम चमत्कृत होओगे। जो भी सार्थक है, गोरख ने कह दिया है। जो भी मूल्यवान है, कह दिया है।

-ओशो
पुस्तकः मरौ है जोगी मरौ,
प्रवचन नं. 1 से संकलित
पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. एवं पुस्तक में उपलब्ध है