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उत्तर प्रदेश, बिहार व मध्यप्रदेश के स्कूली बच्चों की उमड़ी भीड़

देशबन्धु, नई दिल्ली, 6 सितम्बर, 2012

पुस्तक मेले में आज दिल्ली सहित अन्य प्रदेशों से आए स्कूली बच्चों ने पुस्तक मेले का मजा किया और किताबे खरीदी। उत्तर प्रदेश, बिहार व मध्य प्रदेश के बच्चे मुख्य रूप से थे। सबसे ज्यादा माखन लाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय से थे। हर वर्ग के बच्चों ने अपनी अपनी पसंद की किताबें खरीदी। बच्चों में सबसे ज्यादा रूचि ई-पब्लिशिंग की जानकारी एकत्र करने में थी। वहीं फुल सर्कल प्रकाशन ने पाठकों के लिए ओशो दि गेस्ट किताब को लॉन्च किया। इस किताब के लॉन्च में मुख्य अतिथि के तौर पर मशहूर भक्ति गायक राजन मिश्रा उपस्थित थे।

राजन मिश्रा ने कार्यक्रम के दौरान कई भक्ति गीत गाए और पूरे माहौल को ओशोमय बना दिया। कार्यक्रम को लोगों ने काफी सराहा। इस किताब में ओशो ने संत कबीर के कथनों की व्याख्या की है। प्रकाशन विभाग की पुस्तक अज्ञेय का विमोचन कैलाश वाजपेई और ओम थानवी ने किया। इस पुस्तक के लेखक कृष्ण दत्त पाॅलीवाल है। साहित्य अकादमी ने एक कवि सम्मेलन का आयोजन किया। इस सम्मेलन में हिंदी , हरयाणवीं, संस्कृत, पंजाबी, भोजपुरी आदि भाषा के कवि शामिल हुए। कार्यक्रम में शिरकत करने वाले मुख्य कवियों हरेन्दर सिंह बंधु, अमरनाथ, रमाकांत शुक्ल आदि थे।

श्रोताओं से खचाखच भरे ऑडीटोरियम में लोगों ने कविताओं का जमकर लुत्फ उठाया और हास्य कविताओं पर जी भरकर ठहाके लगाए। श्रोताओं का मूड देखकर कवियों ने भी उत्साह के साथ उनका मनोंरजन किया। प्रौढ़ शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए नेशनल बुक ट्रस्ट ने विशेष प्राइमरी पुस्तक श्रृखंला प्रकाशित की है। नेशनल बुक ट्रस्ट के अधिकारी ने बताया कि उन्होंने नियमित पाठकों के लिए बुक क्लब की शुरूआत की है। इस क्लब की सदस्यता प्राप्त करने के बाद किताब खरीदने पर लाईफटाइम बीस प्रतिशत की छूट मिलेगी।

यूनानी तर्क और भारतीय प्रज्ञा

नया इंडिया, नई दिल्ली, 6 सितम्बर, 2012

जो लोग सोच-विचार करके सत्य को पाएंगे, उनके लिए यूनान की तर्क-पद्धति ठीक मालूम पड़ेगी। सोचना-विचारना ऐसे है जैसे मैं एक छोटे से दीये को लेकर महाअंधकार से घिरी रात्रि में कुछ खोजने को निकलूं। रात है बड़ी, अंधेरा है बहुत, दीये की रोशनी बहुत कम, दो-चार कदमों तक पड़ती है। कुछ दिखाई पड़ता है, बहुत कुछ अनदिखा रह जाता है। जो दिखाई पड़ता है, उसके बाबत जो भी निष्कर्ष लिए जाते हैं, वे टेटेंटिव, अस्थायी होंगे। क्योंकि थोड़ीदेर बाद कुछ और भी दिखाई पड़ेगा, जिसके दिखाई पड़ने के बाद निष्कर्ष को बदलना जरूरी होगा। फिर थोड़ी देर बाद कुछ और दिखाई पड़ेगा, और निष्कर्ष को पुनः बदलना जरूरी होगा।

इसलिए पश्चिम का विज्ञान, चूंकि यूनान के तर्क को मानकर चलता है, उसका कोई भी निष्कर्ष अंतिम नहीं हो सकता। उसके सभी निष्कर्ष अस्थायी, कामचलाऊं, अभी जितना जानते हैं उस पर आधारित है। कल जो जाना जाएगा उससे बदलाहट हो जाएगी।

इसलिए पश्चिम का कोई भी सत्य निरपेक्ष, एब्सोल्यूट नहीं है, पूर्ण नहीं है। सभी सत्य अपूर्ण हैं। और यह बड़े मजे की बात है कि सत्य अपूर्ण हो नहीं सकता। जो भी अपूर्ण होगा वह असत्य ही होगा। और जिसे हमें कल बदलना पड़ेगा वह आज भी सत्य नहीं था, सिर्फ मालूम पड़ता था। जिसे हमें कभी भी नहीं बदलना पड़ेगा वही सत्य हो सकता है। इसलिए पश्चिम में जिसे वे सत्य कहते हैं, वह केवल आज जितना हम जानते हैं उस जानने पर निर्भर असत्य है, जो कि कल के जानने से रूपांतरित होगा, परिवर्तित होगा। भारत की पद्धति सत्य को दीया लेकर खोजने की नहीं है। भारत की पद्धति ऐसी है जैसी अंधेरी रात हो, गहन अंधकार हो और बिजली कौंध जाए। बिजली कौंधे और सभी कुछ एक साथ, साइमलटेनियसली दिखाई पड़ जाए। थोड़ा पहले दिखाई पडे, थोड़ा बाद में दिखाई पड़े, फिर थोड़ा बाद में दिखाई पड़े, ऐसा नहीं है-रिवोल्यूशन हो जाए, सब एकदम से उघड़ जाए। सब रास्ते-दूर क्षितिज तक फैले हुए-सभी कुछ जो है, बिजली की कौंध में इकट्ठा पड़ जाए। फिर उसमें बदलने का कोई उपाय न रह जाए, पूरा ही जान लिया गया।

यूनान में जिसे वे तर्क कहते हैं, वह विचार के द्वारा सत्य की खोज है। भारत में हम जिसे अनुभूति कहते है, प्रज्ञा कहते हैं-कहें पश्चिम में हम जिसे लाज़िक कहते है और पूरब में जिसे इंट्यूशन कहते हैं-यह प्रज्ञा बिजली की कौंध की तरह सारी चीजों को एक साथ प्रगट कर जाने वाली है। वैसा ही प्रतिफलित होता है। फिर उसमें कुछ परिवर्तन करने का उपाय नहीं रह जाता।

ईशावास्य उपनिषद पुस्तक से

अंहिसा स्वास्थ्य है, हिंसा रोग

आज समाज, नई दिल्ली, 2 सितम्बर, 2012

हिंसा का मतलब है ऐसा चित्त, जो लड़ने को आतुर है; ऐसा चित्त, जिसका रस लड़ने में है; ऐसा चित्त, जो बिना लड़े बेचैन हो जाएगा; ऐसा चित्त, जो बिना किसी को चोट पहुंचाए, बिना किसी को दुख पहुंचाए सुख अनुभव न कर सकेगा।

स्वभावतः जो चित्त दूसरे को दुख पहुंचानें को आतुर है, या जिस चित्त का दूसरे को दुख पहुंचाना ही एकमात्र सुख बन गया हैं, ऐसा चित्त सुखी नहीं हो सकता । ऐसा चित्त भीतर गहरे में दुखी होगा।

एक बहुत गहरा नियम है कि हम दूसरे को वही देते हैं जो हमारे पास होता हैः अन्यथा हम दे भी नहीं सकते। जब मैं दूसरे को दुख देने को आतुर होता हूं, तो उसका इतना ही अर्थ है कि दुख मेरे भीतर भरा है और उसे मैं किसी पर उलीच देना चाहता हूं। जैसे, बादल जब पानी से भर जाते हैं, तो पानी को छोड़ देते हैं जमीन पर; ऐसे ही, जब हम दुख से भीतर भर जाते हैं, तो हम दूसरों पर दुख फेंकना शुरू कर देते हैं।

जो कांटे हम दूसरों को चुभाना चाहते हैं, उन्हें पहले अपनी आत्मा में जन्माना होता है; उन कांटों को हम लाएंगे कहां से? और जो पीड़ाएं हम दूसरों को देना चाहते है, उन्हें जन्म देने की प्रसव-पीड़ा बहुत पहले स्वयं को ही झेल लेनी पड़ती है। और जो अंधकार हम दूसरों के घरों तक पहुंचाना चाहते हैं, वह अपने दीए को बुझाए बिना पहुंचाना असंभव है।

अगर मेरा दीया जलता हो और मैं आपके घर अंधकार पहुंचानें जाऊं, तो उल्टा हो जायेगा-मेरे साथ आपके घर में रोशनी ही पहुंचेगी, अंधकार नहीं पहुंच सकता!

जो व्यक्ति हिंसा में उत्सुक है, उसने अपने साथ भी हिंसा कर ली है-वह कर चुका है हिंसा। इसलिए एक सूत्र और आपसे कहना चाहूंगा, और वह यह कि हिंसा आत्महिंसा का विकास है। भीतर जब हम अपने साथ हिंसा कर रहे होते हैं, तब वहीं हिंसा ओवरफ्लो होकर, बाढ़ की तरह फैलकर, किनारे तोड़कर स्वयं से दूसरे तक पहुंच जाती है। इसलिए हिंसक कभी भी स्वस्थ नहीं हो सकता, भीतर अस्वस्थ होगा ही। उसके भीतर हार्मनी, सामंजस्य, संतुलन, संगीत नहीं हो सकता। उसके भीतर विसंगीत, द्वंद्व, कान्फिलिक्ट, संघर्ष होगा ही। वह अनिवार्यता है। जो दूसरे के साथ हिंसा करना चाहता है, उसे अपने साथ बहुत पहले हिंसा कर ही लेनी पड़ेगी। वह पूर्व तैयारी है

इसलिए, हिंसा मेरे लिए अंतद्र्वंद है। दूसरे पर फैलकर दूसरों का दुख बनती है और अपने भीतर जब उसका बीज अंकुरित होता है और फैलता है, तो स्वयं के लिए द्वद्व और अंतर-संघर्ष, और अंतर-पीड़ा बनती है। हिंसा अंतर-संघर्ष, अंतर-असामंजस्य, अंतर-विग्रह, अंतर-कलह की स्थिति है। हिंसा दूसरे से बाद में लड़ती है, पहले स्वयं से ही लड़ती और बढ़ती है। प्रत्येक हिंसक व्यक्ति अपने से लड़ रहा है।

और जो अपने से लड़ रहा है, वह स्वस्थ नहीं हो सकता। स्वस्थ का सही अर्थ ही है, हार्मनी। स्वस्थ का अर्थ है, जो अपने भीतर एक समस्वरता को, एकरसता को, एक लयबद्धता को, एक रिदम को उपलब्ध हो गया है।

महावीर या बुद्ध के चेहरों पर संगीत की जो छाप है, वह वीणा लिए बैठे संगीतज्ञों के चेहरों पर भी नहीं है। वह महावीर के वीणा-रहित हाथों में है। वह संगीत किसी वीणा से पैदा होने वाला संगीत नहीं, वह भीतर की आत्मा से फैला हुआ समस्वरता का बाहर तक बिखर जाना है। बुद्ध के चलने में वह जो लयबद्धता है-वह जो बुद्ध के उठने और बैठने में-वह जो बुद्ध की आंखों में एक समस्वरता है, वह समस्वरता किन्हीं कड़ियों के बीच बंधे हुए गीत की नहीं, किन्ही वाद्यों पर पैदा किये गये स्वरों की नहीं-वह आत्मा के भीतर से सब द्वंद्व के विसर्जन से उत्पन्न हुई है।

अंहिसा एक अंतर-संगीत है। और जब भीतर प्राण संगीत से भरे जाते हैं, तो जीवन स्वास्थ्य से भर जाता है; और जब भीतर प्राण विसंगीत से भर जाते हैं, तो जीवन रुग्णता से, डिसीज से भर जाता है।

यह अंग्रेजी का शब्द ‘डिसीज’ बहुत महत्वपूर्ण है। वह डिस ईज़ से बना है। जब भीतर विश्राम खो जाता है, ईज़ खो जाती है; जब भीतर सब संतुलन डगमगा जाते हैं, और सब लयें टूट जाती हैं, और काव्य की सब कड़िया बिखर जाती हैं, और सितार के सब तार टूट जाते हैं, तब भीतर की जो स्थिति होती है, वह डिसीज है। और जब भीतर कोई चित्त रूग्ण हो जाता है, तो शरीर बहुत दिन तक स्वस्थ नहीं रह सकता है। शरीर छाया की तरह प्राणों का अनुगमन करता है।

इसलिए मैंने कहा, कि हिंसा एक रोग है, एक डिसीज है; और अहिंसा रोगमुक्त है, और अहिंसा स्वास्थ्य है।

जैसे मैंने कहा, अंग्रेजी का शब्द डिसीज महत्वपूर्ण है, वैसा हिंदी का शब्द ‘स्वास्थ्य’ महत्वपूर्ण है। स्वास्थ्य का मतलब सिर्फ हेल्थ नहीं होता, जैसे डिसीज का मतलब सिर्फ बीमारी नहीं होती। स्वास्थ्य का मतलब होता हैः स्वयं में जो स्थित हो गया है। स्वयं में जो ठहर गया है। स्वयं में जो खड़ा हो गया है। स्वयं में जो लीन हो गया है और डूब गया है। स्वयं हो गया है जो। जो अपनी स्वयंता को उपलब्ध हो गया है। जहां अब कोई परता नहीं, कोई दूसरा नहीं कि जिससे संघर्ष भी हो सके; कोई भिन्न स्वर नहीं, सब स्वर स्वयं बन गए-ऐसी स्थिति का नाम ‘स्वास्थ्य’ है।

अहिंसा इस अर्थ में स्वास्थ्य है, हिंसा रोग है।

ओशो दि गेस्ट का विमोचन

हरिभूमि न्यूज, नई दिल्ली

कार्यक्रमः मशहूर भजन गायक राजन मिश्रा ने कई भक्ति गीत सुनाएं, जिससे महौल ओशोमय बन गया।

पुस्तक मेला के दौरान फुल सर्कल प्रकाशन के स्टॉल पर मशहूर भजन गायक राजन मिश्रा के हाथों ‘ओशो द गेस्ट’ किताब का लोकार्पण हुआ। इस अवसर पर उन्होंने लोगों की फरमाईश पर कई भक्ति गीत भी सुनाए, जिससे माहौल ओशोमय बन गया। इस किताब में ओशो ने संत कबीर के कथनों की व्याख्या की है।

प्रकाशन विभाग के स्टॉल पर कृष्ण दत्त पालीवाल लिखित पुस्तक अज्ञेय का लोकार्पण कैलाश वाजपेयी ने किया। इस अवसर पर साहित्य अकादमी की तरफ से कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। जिसमें हिन्दी, हिरणावयी, संस्कृत, पंजाबी, भोजपुरी सहित कई अन्य भाषाओँ के कवि शामिल हुए।

प्रौढ़ शिक्षा के प्रोत्साहन को नेशनल बुक ट्रस्ट ने विशेष प्राइमरी पुस्तक श्रृखंला प्रकाशित की है। एनबीटी के अधिकारी ने बताया कि नियमित पाठकों के लिए बुक क्लब की शुरूआत की है। इसकी सदस्यता लेने के बाद किताब खरीदने पर हमेशा बीस फीसदी तक की छूट मिलेगी। नेशनल बुक ट्रस्ट अभी 32 भाषाओं में पुस्तकें प्रकाशित कर रहा है।

विरोधी किनारों पर टिका अस्तित्व

राष्ट्रीय सहारा, नई दिल्ली,15 सितम्बर, 2012

बुद्ध कहते हैं, युद्ध और शांति दोनों साथ हैं। यदि युद्ध मिट जाता है तो शांति स्वतः मिट जाएगी। वहां न युद्ध होगा और न शांति। यदि संसार में मृत्यु लुप्त हो जाए तो क्या यह जानने में समर्थ हो सकोगे कि तुम जीवित हो? जीवन को परिभाषित करने के लिए मृत्यु जरूरी है। शांति की स्पष्ट व्याख्या के लिए, उसको सीमांकित करने लिए युद्ध की आवश्यकता है। मित्रता को परिभाषित करने के लिए शत्रुता जरूरी है और प्रेम की स्पष्ट व्याख्या के लिए घृणा जरूरी है। इसलिए वे पृथक नहीं है। वे एक दूसरे को परिभाषित करते हैं, एक दूसरे पर आश्रित हैं। यदि उनमें से एक मिट जाता है तो दूसरे का भी लुप्त हो जाना सुनिश्चित है। तत्वज्ञान चुनाव करता है। वहां शांतिवादी दार्शनिक हैं, जो सोचते हैं कि वहां युद्ध होना ही नहीं चाहिए, केवल शांति होनी चाहिए-तब वहां केवल शांति ही होगी। यह संभव नहीं है। कृष्ण सत्य के कहीं अधिक निकट हैं, जब कहते हैं कि कभी इस जगह शांति होती हैं। तर्क कभी भी विरोधी छोर को अनुमति नहीं देता। अस्तित्व दो विरोधी छोरों पर ही आश्रित हैं। इसलिए तर्क और अस्तित्व कभी नहीं मिलते और तत्वज्ञान या दर्शनशास्त्र एक तार्किक प्रयास है।

बुद्ध कहते हैं यह असमंजस ही मनुष्य के मन की स्थिति है-हुआ जाए अथवा न हुआ जाए। लेकिन दोनों एक साथ हैं। यदि तुम बने रहने का निर्णय करते हो तो ठीक, इससे विपरीत तुम्हें न बने रहने का भी निर्णय लेना है। चुनाव करो ही मत। चीजों को वैसी बनी रहने दो, जैसी वे हैं। युद्ध होता है तो उसे होने दो। वहां शांति है, उसे होने दो। प्रेम हो तो उसे बना रहने दो। प्रेम न हो, तो उसे भी होने दो। तुम एक निरीक्षणकर्ता और साक्षी बनकर पृथक बने रहो। तुम केवल साक्षी हो और चीजें स्वयं अपने विपरीत छोर की ओर घूम रही हैं। शिखर घांटियों का अनुसरण कर रही है। यदि तुम चुनाव नहीं करते हो तो कर्ता विलुप्त हो जाता है, वह वाष्पीकृत होना शुरू हो जाता है। तब जो कुछ भी स्थिति हो, केवल तभी तुम उसके प्रति सचेत हो सकते हो। यही है नाव के पेंदे का छिद्रयुक्त होना और खंडित होना।

सृजनात्मकता को बनाएं जीवन का मुख्य धार

आज समाज, नई दिल्ली, 15 सितम्बर, 2012

जन्म से ही कलाकार होते हैं सभी बच्चे। यह अलग बात है कि बाद में हम उन्हें बरगाद कर देते हैं। वरना हर बच्चा दुनिया में महान सृजनात्मकता लेकर आता है। हम उसे पनपने नहीं देते क्योंकि हमें सृजनात्मकता से डर लगता है।

हमने सृजनात्मकता को केवल दायरे में और केवल कुछ लोगों के लिये ही पनपने की इजाजत दी है। हम नहीं चाहते की हर कोई कवि और चित्रकार हो जाये, क्योंकि अगर हर कोई कवि और चित्रकार हो गया तो दुनिया पूरी तरह कुछ की कुछ हो जाएगी। तब उसमें कोई संरचना नहीं रहेगी, कोई राजनीति नहीं होगी। कोई युद्ध संभव नहीं रह जायेगा। राजनेताओं को इस धरती से लापता हो जाना होगा। और तब धन के पीछे पागल होकर कौनभागेगा अगर दुनिया में बहुत-बहुत से कवि, बहुत से चित्रकार संगीतकार और गायक हो जाएंगे? धन के बारे में सोचेगा ही कौन? दरअसल यह पूरा ढांचा ही सृजनात्मकता को नष्ट करने पर निर्भर है। यह समाज है ही बेहद असृजनात्मक।

यह केवल कुछ हो लोगों को सृजनात्मक होने की अनुमति देता है, और वह भी सिर्फ मनोरंजन के उद्देश्य से। केवल एकरसता भंग करने के लिए ही। कभी एक बार संगीत सभा में चले गए और आनंद ले लिया। काम से भरी दुनिया में थोड़ी सी विश्रांति मिल गई। लेकिन कोई इसे गंभीरता और गहनता नहीं लेता। उसे कुछ अतिरिक्त माना जाता है, जैसे कि कोई साइड शो हो रहा है। सृजनात्मकता को मुख्य स्रोत बनना है। सृजनात्मकता को जीवन की मुख्य धार बनना है। तभी यह दुनिया कुछ भिन्न हो पाएगी। तब यह दुनिया धार्मिक होगी-इसलिए नहीं कि उसमे बहुत से चर्च होंगे बल्कि इसलिए कि उसमे बहुत से चित्रकार, बहुत से कवि, बहुत से गायक, बहुत से संगीतकार और बहुत से नर्तक होंगे।

असल में हर किसी को नृत्य करना, गाना और चित्र बनाना आना चाहिए। इन कामों के लिए विशेषज्ञता कि जरुरत क्यों पडे़, ये विशेषज्ञता कि मोहताज नहीं हैं। उन्हें सांस लेने की तरह, प्रेम करने की तरह सोने की तरह स्वाभाविक रूप से आना चाहिए। जो चित्र नहीं बना सकता वह व्यक्ति किसी चीज से वंचित है। जरुरी नहीं कि हर कोई वन गो हो, हर किसी को शेक्सपियर बनने की आवश्यकता भी नहीं। पर हर किसी को अपनी प्रेमिकाओं के लिए कुछ कविताएं लिखना तो आना ही चाहिए। लेकिन, मैंने सुना है कि जब लोग अपनी को कविताएं लिखकर भेजते भी हैं तो वह दूसरों कि कविता कि नकल होती है।

वे स्वयं अपने प्रेमपत्र भी नहीं लिख सकते। बाजार में किताबें बिकती हैं-प्रेमपत्र कैसे लिखें। लोगों को प्रेमपत्र लिखना भी सीखना पड़ता है। कितना कुरूप संसार है यह। हर किसी को एक गीत गाना तो आना ही चाहिए। कम से कम एक साज बजाना तो आना ही चहिए। ये सारी चीजें जीवन का हिस्सा होना चाहिये। केवल तभी हम अलग तरह कि ऊर्जा, अलग तरह कि मानवता रच पाएंगे।