Osho World Online Hindi Magazine :: September 2012
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युवा और नशा

नशीले पदार्थ सरकारों और धर्मों से अधिक शक्तिशाली प्रमाणित हुए हैं, क्योंकि किसी ने नशीले पदार्थ लेने वालों के मनोविज्ञान को समझने का प्रयास नहीं किया

सारे धर्म और सरकारें सदा से नशीलें पदार्थों के विरूद्ध रही हैः सभी धर्मों की हमेशा से यही कोशिश रही है कि लोग नशीली दवाएं न लें। सरकारों ने भी हमेशा नशीले पदार्थों का विरोध किया है।

लेकिन धर्म और सरकारें इसलिए नशीले पदार्थों के विरूद्ध रही है क्योंकि वे मनुष्य को दुखी और पीड़ित ही देखना चाहते है। पीड़ा में मनुष्य कभी विद्रोही नहीं हो सकता। जब वह बहुत दुखी और भीतर से टूट रहा होता है तो वह एक नए समाज, एक नई संस्कृति, एक नए मानव और एक नये युग की कल्पना भी नहीं कर सकता। अपने दुख के कारण वह सहजता से पंडितों और पुजारियों का शिकार बन जाता है। वे उसे सांत्वना देते है, उससे कहते हैं कि धन्य हैं वे जो गरीब हैं, धन्य हैं वे जो विनम्र हैं, धन्य हैं वे जो दुखी हैं, क्योंकि वे ही ईश्वर के राज्य के अधिकारी हैं।

यह पीड़ित मनुष्यता राजनीतिज्ञों के हाथों में खेलती है, क्योंकि दुखी मनुष्य को एक आशा चाहिए भविष्य में-एक बेहतर समाज की आशा, एक ऐसे समाज की आशा जहां दुख और पीड़ा न हो। वे अपनी पीड़ा को सहन कर सकते हैं अगर उन्हें दूर क्षितिज में एक स्वर्णयुग की आशा बनी रहे। और स्वर्णयुग आता ही नहीं कभी। बिल्कुल ऐसे जैसे कि मृगमरीचिका होती है-उसके पीछे तुम दौड़ते रहो, दौड़ते रहो लेकिन कभी उसे पा न सकागे। जब तक कि तुम थोड़ा आगे बढ़ोगे वह और आगे खिसक जाएगी। लेकिन एक आशा बंधी रहती है।

राजनीतिज्ञ वादे पर जीता है। पंडित वादे पर जीता है, परंतु पिछले दस हजार वर्षों में किसी ने कुछ किया? नहीं किया। उनके नशीले पदार्थों के खिलाफ होने का कारण यह है कि नशीले पदार्थ उनका व्यवसाय बंद कर देंगे। अगर लोगों ने अफीम, एल.एस. सी., गांजा, चरस लेना शुरू कर दिया तो उन्हें न तो राजनीति की चिंता होगी, न कल क्या होगा इसकी चिंता, न इसकी चिंता कि मरने के बाद क्या होगा, न ईश्वर की और न ही स्वर्ग और नर्क की। वे उस क्षण में तृप्त हो जाएंगे।

इसलिए धर्मों और संस्कारों का यह सारा विरोध है। अब तुम यह गहरी साजिश देखते हो-उनका कोई लेना-देना उस व्यक्ति के भले से नहीं है जो नशीली दवाएं ले रहा है, उनको सामाजिक ढर्रे को बरकरार रखकर अपना व्यवसाय जारी रखना है।

नशीले पदार्थ सरकारों और धर्मों से अधिक शक्तिशाली प्रमाणित हुए हैं, क्योंकि किसी ने नशीले पदार्थ लेने वालों के मनोविज्ञान को समझने का प्रयास नहीं किया है।

पच्चीस-छब्बीस साल की उम्र तक जब तम यूनिवर्सिटी से बाहर निकलते हो तो न तुम्हारी कोई जिम्मेदारियां होती हैं, न कोई बच्चे और न ही कोई चिंताएं। तुम्हारे सामने पूरा संसार होता है-स्वप्न देखने के लिए, उसे बेहतर बनाने के लिए, उसे ज्यादा खुशहाल बनाने के लिए, एक नये मनुष्य को जन्म देने के लिए एक नये समाज की शुरुआत के लिए। और यही दिन होते हैं-चौदह और चौबीस के बीच के-जबकि तुम स्वप्न देखते हो, क्योंकि तुम्हारी कामवासना परिपक्व हो रही है, और कामवासना के साथ-साथ स्वप्न भी परिपक्व हो रहे होते हैं।

सभी स्कूल, कालेज और धर्म कामवासना को दबाते हैं जिससे तुम्हारी सारी उर्जा स्वप्न देखने में केंद्रित हो जाती है। तुम बड़े-बड़े स्वप्न देखने लगते हो। तुम्हें लगने लगता है संसार को बदलना बड़ा आसान है।

और इसके एकदम बाद जब संसार की वास्तविकता से तुम्हारा आमना-सामना होता है तो तुम पराजित अनुभव करने लगते हो, क्योंकि जिस तरह से संसार काम करता है-ब्यूरोक्रेसी सरकार, राजनीति, समाज, धर्म काम करते हैं-उससे तुम्हें यह नहीं लगता कि तुम अपने स्वप्न को वास्तविकता बना पाओगे।

तुम यूनिवर्सिटी से घर लौटते हो नए विचारों, नई धारणाओं से भरे हुए लेकिन शीघ्र ही सारे विचार, धारणाए, योजनाएं एक-एक करके समाज की कठोर वास्तविकता से रौंद दी जाती हैं। एक कुंठा की पीड़ा तुम्हें घेर लेती है। शीघ्र ही तुम नए मनुष्य और बेहतर समाज के विषय में सब भूल जाते हो। समाज तो क्या, तुम्हें लगने लगता है कि तुम अपनी स्थिति भी नहीं बदल सकते। यही वह क्षण है जब तुम नशीले पदार्थो की ओर जाते हो, क्योंकि तुम्हें कोई और मार्ग नहीं सूझता।

नशीले पदार्थ तुम्हें अस्थायी राहत दे देते हैं लेकिन सभी नशीले पदार्थ-जो आज हैं-तुम्हें बिल्कुल लाचार बना देते हैं। फिर उनके बिना तुम नहीं रह सकते हो। और उनकी मात्रा बढ़ाते रहना पड़ता है। वे शरीर और मस्तिष्क दोनों के लिए हानिकारक हैं। जल्दी ही तुम बिल्कुल लाचार हो जाओगे, नशीले पदार्थो के बिना जिंदा न रह सकोगे। और नशे के साथ समाज में तुम्हारा कोई स्थान नहीं रह जाता। तुम सामाजिक मशीनरी से अलग पड़ जाते हो।

पूरी नई पीढ़ी, विशेषकर पश्चिम में, नशीली दवाओं की दौर से गुजरी है। और अब तो स्थिति और खराब हो चुकी है। अब तो स्कूल जाने वाले लड़के-लड़किया भी नशीली दवाएं ले रहे हैं। छह साल के, आठ साल के लड़के-लड़कियां भी करोड़ों की संख्या में नशीली दवाएं ले रहे हैं। और अगर एक बार किसी भी उम्र के बच्चे ने नशीली दवाओं का प्रयोग कर लिया तो वे उस अनुभव को नहीं भुला पाते। बाकी सब कुछ उन्हें बेकार लगता है। दिमाग बार-बार नशीले पदार्थ की मांग करता है, क्योंकि उससे उन्हें इस संसार से परे की झलक मिलती है, सब कुछ कैसा होना चाहिए उसकी झलक मिलती है।

भले ही यह झलक रासायनिक और क्षणभंगुर हो, लेकिन कुछ समय के लिए तो दुख के पार सुख की झलक मिल जाती है। यह अनुभव इतना अद्भुत होता है कि उसे बार-बार न दोहराना असंभव हो जाता है।

कोई सरकार इसे रोक नहीं सकती-सभी सरकारें प्रयास कर रही हैं लेकिन कोई इसे रोकने में सफल नहीं हो सकता।

जो लोग सत्ता में है वे निषेध और दंड जैसी मूर्खताएं लागू करने की कोशिश करते हैं। ड्रग्स की इस स्थिति के लिए युवा पीढ़ी दोषी नहीं है। उन्हें दंड देना और जेल में डाल देना निरी मूर्खता है। वे अपराधी नहीं हैं, शिकार हैं।

सत्ताधारी लोग जानते हैं कि निषेध हमेशा से रहा है, और निषेध कर उल्लंघन भी हमेशा से होता रहा है। अगर तुम शराब पर बंदी लगाओ तो और ज्यादा लोग शराब में उत्सुक हो जाएंगे। लेकिन फिर और दूसरी समस्याएं शुरू हो जाएंगी-लोग छिपकर घटिया और जहरीली शराबें बेचने लगेंगे। हर साल हजारों लोग जहरीली शराब पीने से मरते हैं।

और ये वर्षों से युवा पीढ़ी को जेल में दंड दे रहे हैं। बिना यह समझे कि अगर किसी व्यक्ति ने नशीली दवा ली या किसी नशीले पदार्थ से वह आसक्त रहा है तो उसे उपचार चाहिए, दंड नहीं। उसे किसी मनोवैज्ञानिक केंद्र में भेजना चाहिए जहां उसकी देखभाल हो सके, जहां उसे ध्यान सिखाया जा सके और जहां उसे धीरे-धीरे नशीलें पदार्थों से बेहतर दिशा दिखाई जा सके।

लेकिन वे उनको जेलों में डाल देते हैं-दस साल जेल में। उनके लिए मानव जीवन का कोई मूल्य ही नहीं है। अगर तुमने एक बीस साल के युवक को दस साल के लिए जेल में डाल दिया तो तुमने उसके जीवन का सबसे मूल्यवान समय व्यर्थ कर दिया और वह भी बिना किसी लाभ के, क्योंकि जेल में सभी नशीले पदार्थ किसी भी और जगह से अधिक सहजता से उपलब्ध हैं। जेल के पुराने कैदी नशीले पदार्थों के उपयोग में बहुत कुशल होते हैं और नए कैदियों के शिक्षक बन जाते हैं। दस साल के बाद व्यक्ति पूरी तरह से कुशल होकर बाहर निकलता है। तुम्हारे जेल एक ही बात सिखाते हैं कि जो भी तुम करते हो वह तब तक गलत नहीं है जब तक कि तुम पकड़े नहीं जाते, बस पकड़े मत जाना। और यहां पेशेवर लोग भी होते हैं जो तुम्हें फिर न पकड़े जाने की कला सिखा सकते है।

मनुष्य को सुखी और आनंदित बनाना ही नशीले पदार्थों को रोकने का एकमात्र उपाय है। यही मेरा संपूर्ण कार्य है, यही मेरी संपूर्ण कला है।

-ओशो
बैक टु इंडिया, दि बुक ऑफ दि बुक्स, लाइट ऑन दि पाथ,
दि रेबल, झेनः दि मिस्ट्री एंड दि पोयट्री ऑफ दि बियांड से संकलित