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रहस्यदर्शियों पर ओशो
संत कवि जगजीवन

‘‘जगजीवन जैसे बेपढ़े-लिखे संतों की वाणी में जो बल है वह बल शब्दों का नहीं है, वह उनके शून्य का बल है। शब्दों की सपंदा उनके पास बड़ी नहीं है, कामचलाऊं हैं; बोल-चाल की भाषा है। लेकिन बोल-चाल की भाषा में भी अमृत ढाला है’’

-ओशो

छोटा बच्चा था न पढ़ा न लिखा। गांव का गंवार चरवाहा। मगर मैं तुमसे कहता हूं की अकसर सीधे सरल लोगों को जो बात सुगमता से घट जाती है। वही बात जो बुद्धि से बहुत भर गए हैं और इरछे तिरछे हो गए हैं उनको बड़ी कठिनाई से घटती है। युगपत क्रांति हो गई। जिसको झेन फकीर सडन इनलाइटमेंट कहते हैं, एक क्षण में बात हो गई ऐसी जगजीवन को हुई।

प्यास, त्वरा, तीव्रता, अभीप्सा-पद शब्दों को याद रखो। कुतूहल से नहीं होगा कि चलो देखें, क्या होता है अगर गुरु सर पर हाथ रखे। कुछ भी नहीं होगा। और जब कुछ भी नहीं होगा तो कहोगे कि सब फिजूल है। जिज्ञासा से रखने कि शायद कुछ हो, तो भी नहीं होगा। जब तक कि अभीप्सा से न रखो। होना ही है, हुआ ही है इधर हाथ छुआ कि वहां हो जाना है-ऐसी श्रद्धा से मांगो तो जरुर होता है, निश्चित हो जाता है। सदा हुआ है। इस जगत के शाश्वत नियमों में से एक नियम है कि जो पूर्णता से प्यासा होगा उसकी प्रार्थना सुन ली जाती है। उसकी प्रार्थना पहुंच जाती है।

उस दिन बुल्लेशाह ने ही हांथ नहीं रखा जगजीवन पर, बुल्लेशाह के माध्यम से परमात्मा का हाथ जगजीवन के सिर पर आ गया। टटोल तो रहा था, तलाश तो रहा था। बच्चे की ही तलाश थी-निर्बोध थी, अबोध थी लेकिन प्रकृति से झलकें मिलनी शुरू हो गई थीं। कोई रहस्य आवेषित किए है सब तरफ से इसकी प्रतीति होने लगी थी, इसके आभास शुरू हो गए थे।

आज जो अचेतन में जगी हुई बात थी, चेतन हो गई। जो भीतर पक रही थी आज उभर आयी। जो कल तक कली थी, बुल्लेशाह के हाथ रखते ही फूल हो गई। रूपांतरण क्षण में हो गया। जगजीवन ने फिर कोई साधना इत्यादि नहीं की। बुल्लेशाह से इतनी ही प्रार्थना की, कुछ प्रतीक दे जाएं। याद आएगी बहुत, स्मरण होगा बहुत। कुछ और तो न था, बुल्लेशाह ने अपने हुक्के में से एक सूत का धागा खोल लिया-काला धागा, वह दायें हांथ पर बांध दिया जगजीवन के। और गोविन्दशाह ने भी अपने हुक्के में से एक धागा खोला-सफेद धागा और वह भी दायें हाथ पर बांध दिया।

जगजीवन को मानने वाले लोग जो सत्यनामी कहलाते हैं-थोड़े से लोग हैं-वे अभी भी अपने दायें हाथ पर काला और बायें पर सफेद धागा बांधते हैं। मगर उसमें अब कुछ सार नहीं है। वह तो बुल्लेशाह ने बांधा तो सार था। कुछ काले सफेद धागे में रखा है क्या? कितने ही बांध लो, उनसे कुछ होनेवाला नहीं है। वह तो जगजीवन ने मांगा था, उसमे कुछ था। और बुल्लेशाह ने बांधा था उसमे कुछ था। न तो जगजीवन हो, न बांधनेवाला बुल्लेशाह है। बांधते रहो।

इस तरह मुर्दा प्रतीक हाथ में रह जाते हैं। कुछ और नहीं था तो धागा ही बांध दिया। और कुछ पास था भी नहीं। हुक्का ही रखते बुल्लेशाह, और कुछ पास रखते भी नहीं थे। लेकिन बुल्लेशाह जैसा आदमी अगर हुक्के का धागा भी बांध दे तो रक्षाबंधन हो गया। उसके हाथ से छूकर साधारण धागा भी असाधारण हो जाता है।

और प्रतीक भी था। गोविन्द्शाह ने सफेद धागा बांध दिया, बुल्लेशाह ने काला धागा बांध दिया। मतलब? मतलब कि काले और सफेद दोनों ही बंधन हैं। पाप भी बंधन है, पुण्य भी बंधन है। शुभ भी बंधन है, अशुभ भी बंधन है। यह बुल्लेशाह कि देशना थी। यह उनका मौलिक जीवन-मंत्र था।

अच्छा तो बांध लेता है, जैसे बुरा बांधता है। नरक भी बांधता है, स्वर्ग भी बांधता है। इसलिए तुम बुरे से तो छूट ही जाना, अच्छे से भी छूट जाना। न तो बुरे के साथ तादात्य करना, न अच्छे के साथ तादात्य करना। तादात्य ही न करना। तुम तो साक्षी मानना अपने को कि मैं दोनों का द्रष्टा हूं। लोहे कि जंजीरे बांधती हैं सोने की जंजीरे भी बांध लेती हैं। जिसको तुम पापी कहते हो वह भी कारागृह में है, जिसको तुम पुण्यात्मा कहते हो वह भी कारागृह में है। चैंकोगे तुम।

चोरी तो बांधती ही है, दान भी बांध लेता है। अगर दान में दान की अकड़ है की मैंने दिया-अगर यह भाव है तो तुम बांध गए। जहां ‘मैं’ है वहां बंधन है। अगर दान में यह अकड़ नहीं है की मैंने दिया, परमात्मा का था। उसी ने दिया, उसी ने लिया, तुम बीच में आए ही नहीं, तो दान की तो बात ही छोड़ो, चोरी भी नहीं बांधती। अगर तुम अपने सारे कर्ता-भाव को परमात्मा पर छोड़ दो, फिर कुछ भी नहीं बांधता। फिर तुम नरक में भी रहो, तो मोक्ष में हो। कारागृह में भी स्वतंत्र हो। शरीर में भी जीवनमुक्त हो। लेकिन दोनों के साक्षी बनना।

ऐसा सूक्ष्म सन्देश था उसमें। यह कुछ कहा नहीं गया कहने की जरुरत न थी। वह जो हाथ रखा था गुरु ने और वह जो जीवन ऊर्जा प्रवाहित हुई थी और भीतर जो स्वच्छ स्थिति पैदा हुई थी, उस स्वच्छ स्थिति को कुछ कहने की जरुरत न थी। ये प्रतीक पर्याप्त थे।

उसी दिन से जगजीवन शुभ-अशुभ से मुक्त हो गये। उन्होंने घर भी नहीं छोड़ा। बड़े हुए, पिता ने कहा शादी कर लो, तो शादी भी कर ली। गृहस्थ हो गए। कहां जाना है? भीतर जाना है। बाहर कोई यात्रा नहीं है। काम-धाम में लगे रहे और सबसे पार और अछूते बने रहे जल में कमलवत।

ऐसे गैर पढ़े लिखे लेकिन असाधारण दिव्य पुरूष के वचनों में हम प्रवेश करें।

फिर नजर में फूल महकें दिल में फिर शमाएं जली।
फिर तसव्वुर ने लिया उस बज्म में जाने का नाम।।

जिसके भीतर प्यास है उन्हें तो इस तरह की यात्राओं की बात ही बस पर्याप्त होती है। फिर नजर में फूल महके उनकी आंखे फूलो से भर जाती हैं।

-ओशो
पुस्तकः नाम सुमिर मन बावरे
प्रवचन 1 से संकलित
पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. एवं पुस्तक में उपलब्ध है