Osho World Online Hindi Magazine :: September 2012
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समाचार सार
शिष्य का पूर्णत्व

राष्ट्रीय सहारा, नई दिल्ली, 18 अगस्त

बुद्ध का एक शिष्य था। उसका नाम था पूर्ण। शिक्षा पूरी हो जाने पर बुद्ध ने उस भिक्षु से कहा कि पूर्ण, अब तुम जाओ और प्रेम की खबर लोगों तक पहुंचाकर आओ। तुम उन जगहों में जाना जहां कोई न गया हो। हिंसा की खबरें बहुत पहुंचाई गई, कोई प्रेम की खबर भी पहुंचाए! यह सुनकर पूर्ण ने बुद्ध के पैर छुए और कहा, मुझे आज्ञा दें कि मैं बिहार के सूखा नाम के एक छोटे से हिस्से में जाऊं और वहां लोगों को आपका संदेश दूं। बुद्ध ने कहा कि पूर्ण यदि तुम वहां न जाओ तो बड़ी कृपा होगी क्योंकि वहां के लोग अच्छे नहीं हैं। पूर्ण ने कहा, तब तो मेरी अवश्य ही जरूरत है। जहां लोग बुरे हैं, वहीं तो प्रेम का संदेश ले जाना पड़ेगा। बुद्ध ने कहा, ठीक है पर जाने से पहले मैं तुमसे दो-तीन प्रश्न पूछता हूं। यदि उनके यथोचित्त उत्तर तुम दे दोगे तो सहर्ष चले जाना। पूर्ण ने कहा, पूछिए। बुद्ध ने पहला प्रश्न किया कि अगर वहां के लोगों ने तुम्हारा अपमान किया और तुम्हें गालियां दीं तो तुम्हें कैसे लगेगा? पूर्ण न कहा, क्या होगा! मैं सोचूंगा कि ये लोग कितने अच्छे हैं। सिर्फ गालियां ही देते हैं, अपमान ही करते हैं। मारते नहीं हैं जबकि मार भी सकते थे।

बुद्ध ने कहा, ठीक है। लेकिन अगर वे तुम्हें साथ-साथ मारने भी लगें तो! तुम्हारे प्रेम के संदेश पर पत्थर फेंकने लगें और लकड़िया सिर पर बरसने लगीं तो फिर क्या होगा! फिर भी मैं यहीं मानूंगा कि ये लोग अच्छे हैं। सिर्फ मारते ही तो हैं। जान से तो नहीं मार डालते न! बुद्ध ने कहा और अगर उन्होंने तुम्हें जान से ही मार डाला तो मरते क्षण तुम्हारे मन में क्या विचार आ रहा होगा? पूर्ण ने कहा, तब मुझे लगेगा कि कितने भले लोग हैं कि इन्होंने मुझे उस जीवन से ही मुक्त कर दिया, जिसमें मैं भी मारने को तैयार हो सकता था। इन लोगों ने मुझे उससे मुक्त कर दिया। बुद्ध ने कहा, अब तुम जाओ। तुम्हारा प्रेम पूरा हो गया। और जिसका प्रेम पूरा हो गया हो, वहीं युद्ध के विपरीत, हिंसा के विपरीत खबर और हवा ले जा सकता है। तुम जाओ!

आभारः ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन

सफल अभिनेता का सुनहरा सफर...

पंजाब केसरी, चण्डीगढ़, 15 अगस्त

विनोद खन्ना ने सफल अभिनेता होने के साथ-साथ फिल्म निर्माण व राजनीति में भी अपना जलवा दिखाया है। सन् 1968 में फिल्म 'मन के मीत' से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत करने वाले विनोद खन्ना ने सन् 1970 और 80 के दशक में कई सुपरहिट फिल्में दीं जिनमें 'सच्चा झूठा', 'मेरा गांव मेरा देश' 'दयावान' 'चांदनी' 'ईना मीना डीका', 'इक्का राजा रानी' आदि शामिल है। उन्होंने बहुत-सी फिल्मों में खलनायक की भूमिका निभाई थी जिस कारण लोग उनसे बात करने से डरते थे जबकि वह एक नेकदिल इंसान है। वह सब के साथ घुल-मिल नहीं पाते थे और अपने आप में रिजर्व रहते थे।

विनोद खन्ना के साथ लेखक की पहली मुलाकात सन 1990 में मुम्बई के चांदीवली स्टूडियों में मुकुल आनंद की फिल्म 'महासंग्राम' की शूंटिग के दौरान हुई थी। इस फिल्म में उनके साथ माधुरी दीक्षित काम कर रही थीं। इसके पश्चात् कई फिल्मों की शूटिंग के दौरान लेखक की उनसे मुलाकात होती रही। लेखक की मुबंई में फोटोग्राफी की सफलता के पीछे विनोद खन्ना का बहुत बड़ा योगदान रहा है। लेखक को याद है कि फिल्म 'धर्मसकंट' की शूंटिग के दौरान फिल्मसिटी स्टूडियों में अमृता सिंह के साथ विनोद खन्ना काम कर रहे थे। इस मौके पर लेखक को इन दोनों की एक साथ फोटों खींचने का मौका मिला। इस पर अमृता सिंह ने ऐतराज जताया लेकिन विनोद जी के कहने पर वह बाद में शांत हो गयी।

निर्देशक बरखा राय (रीना राय की बहन) तथा प्रोड्यूसर अनूप जलोटा के बैनर तले बन रही एक फिल्म की शूटिंग कवर करने के लिए इस फिल्म के पी.आर.ओ. राजू कारिया लेखक को डल्हौजी ले गए। इस फिल्म में रीना राय, शक्ति कपूर, जावेद जाफरी, रोनित राय भी काम कर रहे थे। इस फिल्म की शूटिंग के दौरान विनोद खन्ना के बेटे अक्षय खन्ना उनके साथ बैठे थे। इस दौरान लेखक ने इन दोनों की तस्वीरे अपने कैमरे में कैद कर लीं। फोटो खिचवाने के पश्चात विनोद खन्ना ने लेखक से कहा कि यह फोटो अभी किसी पेपर में मत छापवाना क्योंकि कुछ समय के पश्चात वह अपने बेटे अक्षय खन्ना को फिल्मों में लांच करने वाले हैं। दिन की शूंटिग समाप्त होने के पश्चात् रोजाना रात को विनोद खन्ना होटल माऊंट व्यू में महफिल सजाते थे।

सन् 1980 के पश्चात् वह फिल्म नगरी छोड़ आचार्य रजनीश के आश्रम में अपने परिवार के साथ चले गए थे। दोबारा उन्होंने कुछ वर्षों के पश्चात् फिल्म नगरी में कदम रखा और कई हिट फिल्में दी। सन् 1977 में फिल्म में 'हाथ की सफाई' के लिए उन्हें फिल्मफेयर का बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर तथा 1999 में फिल्मफेयर लाईफ टाईम अचीवमेंट अवार्ड दिया गया था।

डल्हौजी से विनोद खन्ना को काफी प्यार है। उन्होंने सन 1977 में बतौर फिल्म 'हिमालय पुत्र' से अपने बेटे अक्षय खन्ना को लांच किया। इस फिल्म की अधिकतर शूटिंग डल्हौजी में ही की गई थी। यह फिल्म सफल नहीं हो सकी। इस फिल्म के पश्चात् अक्षय खन्ना ने और कई फिल्मों में अभिनय किया जिनमें कुछ सफल रही और कुछ फ्लाप भी रहीं। विनोद खन्ना के दूसरे बेटे राहुल खन्ना भी मॉडलिंग के पश्चात कुछ ही फिल्मों में दिखाई दिए। विनोद खन्ना की हाल में आई फिल्मों में 'वांटेड' तथा दबंग (2010) आदि शामिल है। उन्होंने 1997 में भारतीय जनता पार्टी ज्वाइन कर राजनीति में भी अपना योगदान दिया है।

गुरु व परमात्मा का दायित्व

नया इंडिया, नई दिल्ली, 14 अगस्त

परमात्मा तुम्हें स्वतंत्रता देता है कि तुम्हें जो होना है, हो जाओ। वह तुम्हारे जीवन की किताब को कोरी छोड़ देता है, तुम्हें जो लिखना हो लिख लो। तुम्हें पाप करना है पाप करो, पुण्य करना हो पुण्य करो। तुम पूरी तरह स्वतंत्र हो व स्वभावतः नीचे उतरना आसान है, ऊपर चढना कठिन है। सो लोग नीचे उतरते हैं। लोग पाप मे उतरते हैं। पाप में प्रबल आकर्षण मालूम होता है, क्योंकि वह सरल मालूम होता है। परमात्मा ने स्वतंत्रता दी है व परिणाम यह है कि लोग गुलाम हो गये हैं-वासनाओं के, संसार के।

गुरु का काम ठीक उलटा है। गुरु अनुशासन देता है। गुरु जीवन को जीने का ढंग, शैली देता है। गुरु शास्ता है, शासन देता है। जीवन को रंग रुप देता है। तुम्हारे अनगढ़ पत्थर को ढालता है, इसलिये ऊपर से तो लगता है कि जो लोग गुरु के पास गये, वे गुलाम हो गये। ऊपर से ये बात ठीक भी मालूम पडती है, क्योंकि अब जो गुरु कहेगा, वैसा वे जियेंगे। गुरु का इशारा अब उनका जीवन होगा। गुरु के सहारे चलेंगे। गुरु की नाव में यात्रा होंगी। गुरु की शर्तें स्वीकार करनी होंगी। गुरु के प्रति समर्पण करना होगा, तो बडा विरोधाभास है।

परमात्मा स्वतंत्रता देता है व परिणाम है कि सभी लोग परतंत्र हो गये हैं व गुरु अनुशासन देता है व परिणाम में स्वतंत्रता उपलब्ध होती है। क्योंकि जैसै-जैसै व्यक्ति अनुशासित होता है, जैसै-जैसै व्यक्ति के जीवन में एक व्यवस्था, एक तंत्र पैदा होता है, जैसै-जैसै व्यक्ति जीवन में होश संभालता है। जैसै-जैसै व्यक्ति जागरुक जीवन होने लगता है, वैसै-वैसै स्वतंत्रता का नया आयाम खुलता है, स्वच्छंदता पैदा होती है। 'स्वच्छंदता' शब्द का अर्थ उच्छ्रंखलता मत लेना।

स्वच्छंदता का ठीक वही अर्थ होता है, जो स्वतंत्रता का है। स्वतंत्रता से भी बहूमूल्य शब्द है स्वच्छंदता। 'स्वच्छंद' का अर्थ होता है, जिसके भीतर का छंद जग गया, जिसके भीतर का गीत जग गया यानी जो अपना गीत गाने योग्य हो गया।

जो गीत गाने के लिये परमात्मा ने तुम्हें भेजा था व तुम भटक गये थे। जो बनने के लिये तुम्हें परमात्मा ने भेजा था, लेकिन तुम विपरीत चले गये थे, क्योंकि वह हजार आकर्षण थे व तुम्हें कुछ होश न था।

आभारः ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन

साधना और उपासना

आज समाज, गुड़गांव, 12 अगस्त

कृष्ण के व्यक्तित्व में साधना जैसा कुछ भी नहीं है। हो नहीं सकता। साधना में जो मौलिक तत्व है, वह प्रयास है, इफर्ट है। बिना प्रयास के साधना नहीं हो सकती। दूसरा जो अनिवार्य तत्व है, वह अस्मिता है, अहंकार है। बिना 'मैं' के साधना नहीं हो सकती। करेगा कौन? कर्ता के बिना साधना कैसे होगी, कोई करेगा तभी होगी। साधना शब्द, जिनके लिए कोई परमात्मा नहीं है, आत्मा ही है, साधना शब्द उनका है। आत्मा साधेगी और पाएगी।

उपासना शब्द बिल्कुल उलटे लोगों का है। आमतौर से हम दोनों को एक साथ चलाए जाते हैं। उपासना शब्द उनका है, जो कहते हैं कि आत्मा नहीं, परमात्मा है। सिर्फ उसके पास जाना, पास बैठना - उप-आसन, निकट होते जाना, निकट होते जाना। और निकट होने का अर्थ है, खुद मिटते जाना, और कोई अर्थ नहीं है। हम उससे उतने ही दूर हैं, जितने हम हैं। जीवन के परम सत्य से हमारी दूरी, हमारी डिस्टेंस उतना ही है, जितने हम हैं। जितना हमारा होना है, जितना हमारा मैं है, जितना हमारा ईगो है, जितनी हमारी आत्मा है, उतने ही हम दूर हैं। जितने हम खोते हैं और विगलित होते हैं, पिघलते हैं और बहते हैं, उतने ही हम पास होते हैं। जिस दिन हम बिलकुल नहीं रह जाते, उस दिन उपासना पूरी हो जाती है और हम परमात्मा हो जाते हैं। जैसे बर्फ पानी बन रहा हो, बस उपासना ऐसी है कि बर्फ पिघल रहा है, पिघल रहा है.....

साधना क्या कर रहा है बर्फ? साधना करेगा तो और सख्त होता चला जाएगा। क्योंकि साधना का मतलब होगा कि बर्फ अपने को बचाए। साधना का मतलब होगा कि बर्फ अपने को सख्त करे। साधना का मतलब होगा कि बर्फ और क्रिस्टलाइज्ड हो जाए। साधना का मतलब होगा कि बर्फ और आत्मवान बने। साधना का मतलब होगा कि बर्फ अपने को बचाए और खोए न।

साधना का अर्थ अंततः आत्मा हो सकता है। उपासना का अर्थ अंततः परमात्मा है। इसलिए जो लोग साधना से जाएंगे, उनकी आखिरी मंजिल आत्मा पर रुक जाएगी। उसके आगे की बात वे न कर सकेंगे। वे कहेंगे, अंततः हमने अपने को पा लिया। उपासक कहेगा, अंततः हमने अपने को खो दिया। ये दोनों बातें बड़ी उलटी हैं। बर्फ की तरह पिघलेगा। उपासक और पानी की तरह खो जाएगा। साधक तो मजबूत होता चला जाएगा।

इसलिए कृष्ण के जीवन में साधना का कोई तत्व नहीं है। साधना का कोई अर्थ नहीं है। अर्थ है तो उपासना का है। उपासना की यात्रा ही उलटी हैं। उपासना का मतलब ही यह है कि हमने अपने को पा लिया, यही भूल है। हम हैं, यही गलती है। टृ बी इज़ दि ओनली बांडेज। होना ही एकमात्र बंधन है। न होना ही एकमात्र मुक्ति है। साधक जब कहेगा तो वह कहेगा, मै मुक्त होना चाहता हूं। उपासक जब कहेगा तो वह कहेगा, मैं 'मैं' से मुक्त होना चाहता हूं। साधक कहेगा, मैं मुक्त होना चाहता हूं। मैं मोक्ष पाना चाहता हूं । लेकिन 'मैं' मौजूद रहेगा। उपासक कहेगा, 'मै' से मुक्त होना है। 'मैं' से मुक्ति पानी है। उपासक के मोक्ष का अर्थ है, 'ना-मैं' की स्थिति। साधक के मोक्ष का मतलब है, 'मैं' की परम स्थिति। इसलिए कृष्ण की भाषा में साधना के लिए कोई जगह नहीं है; उपासना के लिए जगह है।

अब यह उपासना क्या है, इसे थोड़ा समझें

पहली तो यह बात समझ लें कि उपासना साधना नहीं है, इससे समझने में आसानी बनेगी। अन्यथा भ्रांति निरंतर होती रहती है। और उपासक हममें से बहुत कम लोग होना चाहेंगे, यह भी ख्याल में ले लें। साधक हममें से सब होना चाहेंगे। क्योंकि साधक में कुछ खोना नहीं है, पाना है। और उपासक में सिवाय खोने के कुछ भी नहीं है, पाना कुछ भी नहीं है। खोना ही पाना है, बस। उपासक कौन होना चाहेगा? इसलिए कृष्ण को मानने वाले भी साधक हो जाते हैं। कृष्ण के मानने वाले भी साधना की भाषा बोलने लगते हैं। क्योंकि वह भीतर जो अहंकार है, वह साधना की भाषा बुलवाता है। वह कहता है, साधो! पाओ! पहुंचो!

सदगुरु का अंगरखा

दिव्य हिमाचल, चंडीगढ़, 4 अगस्त

तुम्हारा हृदय वहां पहुंच सकता है। जिस दिन तुम अपने हृदय को ही कसौटी का पत्थर बनाओगे, उस दिन तुम पहचान लोगे। लेकिन कुछ लोग रुक जाते थे। कुछ लोग गुरजिएफ के इस व्यवहार को देखकर भी रुक जाते थे, प्रतीक्षा करते। जो प्रतीक्षा करने को राजी होता गुरजिएफ का व्यवहार उससे बदल जाता। धीरे-धीरे गुरजिएफ का जो अपना व्यवहार था, वह प्रकट होता। यह बड़े मजे की बात है, जो गुरु तुम्हें धोखा देना चाहता है, उसका व्यवहार तुम पहले बहुत भला पाओगे। जैसे-जैसे तुम करीब जाओगे, वैसे-वैसे व्यवहार वास्तविक होगा, उतनी ही तुम मुश्किल में पड़ोगे। जितना छोटा आदमी होगा, दूर से देखोगे, बड़ा मालूम होगा, पास आओगे, छोटा होता जाएगा। जितने निकट आओगे, उतना ही छोटा होता जाएगा। जितना बड़ा आदमी होगा, जितने दूर से तुम देखोगे, उतना छोटा मालूम होगा। इसलिए मैं कहता हूं, यह बात गणित के बाहर है। जैसे-जैसे तुम करीब आओग, आदमी बड़ा होता जाएगा, उससे छोटा नहीं और अगर ऐसा होता हो तो ही जानना कि तुम ठीक दिशा में जा रहे हो। तुम्हारे पास आने से तो सभी छोटे हो जाते हैं, इसलिए राजनीतिज्ञ, जिसको कि बड़ा दिखने की आकांक्षा है, वह किसी को पास नहीं आने देता, वह दूर रखता है, तुम जितने दूर रहो, उतना ही बड़ा मालूम पड़ता है। तुम बड़े से बड़े राजनीतिज्ञ के पास चले जाओ, तुम पाओगे, वहां छोटा आदमी खड़ा है।

रिचर्ड निक्सन की जो निजी वार्ताएं प्रकाशित हो रहीं हैं। वे घबड़ाने वाली हैं। क्योंकि वह भी उन शब्दों का प्रयोग करता है, जो अत्यंत तुच्छ लोग प्रयोग करें। क्षुद्र गालियों का उपयोग करता है, अपनी निजी वार्ताओं में। यह बड़ी क्षुद्र बात है, जो कि अमेरिका के राष्ट्रपति से जिनकी आशा नहीं की जा सकती। लेकिन तुम यह मत सोचना कि यह निक्सन की गड़बड़ है। सभी राष्ट्रपतियों के साथ यही है। बस इतना ही कि निक्सन फंस गया है और चीजें जाहिर हो गई हैं। तुम्हारे सभी राजनीतिज्ञों की अंतर्वार्ताएं पकड़ ली जाएं, वे सभी इसी उलझन में पाएं जाएंगे। एक चेहरा है राजनीतिज्ञ का, जो बाजार में दिखाई पड़ता है। एक चेहरा उसका निजी है, जो उसके अंतरंग लोग जानते है, जो निकट है, वे जानते हैं।