Osho World Online Hindi Magazine :: September 2012
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संन्यास और गृहस्थः मनःस्थिति का फर्क है

संन्यासी और गृहस्थी में जगह का फर्क नहीं है, भाव का फर्क है। संन्यासी और गृहस्थी में परिस्थिति का फर्क नहीं है, मनःस्थिति का फर्क है


संन्यास जीवन का, जीवन को देखने का और ही ढंग है। बस, ढंग का फर्क है। संन्यासी और गृहस्थी में घर का फर्क नहीं है, ढंग का फर्क है। संन्यासी और गृहस्थी में जगह का फर्क नहीं है, भाव का फर्क है। संन्यासी और गृहस्थी में जगह का फर्क नहीं है, भाव का फर्क है। संन्यासी और गृहस्थी में परिस्थिति का फर्क नहीं है, मनःस्थिति का फर्क है। संसार में जो है...हम सभी संसार में होंगे। कोई कहीं हो-जंगल में बैठे, पहाड़ पर बैठे, गिरि-कंदराओं में बैठे-संसार के बाहर जाने का उपाय परिस्थिति बदल कर नहीं है। संसार के बाहर जाने का उपाय मनःस्थिति बदल के बाहर जाने का उपाय परिस्थिति बदल कर, बाई दि म्यूटेशन ऑफ दि माइंड, मन को रूपांतरित करके है।

मैं जिसे संन्यास कह रहा हूं वह मन को रूपांतरित करने की एक प्रक्रिया है। दो-तीन उसके अंग है, उनकी आपसे बात कर दूं।

पहला तो, जो जहां है, वह वहां से हटे नहीं। क्योंकि हटते केवल कमजोर है; भागते केवल वे ही हैं, जो भयभीत हैं। और जो संसार को भी झेलने में भयभीत है, वह परमात्मा को नहीं झेल सकेगा, यह मैं आपसे कह देता हूं। जो संसार का ही सामना करने में डर रहा है, वह परमात्मा का सामना कर पाएगा? नहीं कर पाएगा, यह मैं आपसे कहता हूं। संसार जैसी कमजोर चीज जिसे डरा देती है, परमात्मा जैसा विराट जब सामने आएगा, तो उसकी आंखें ही झप जाएंगी; वह ऐसा भागेगा कि फिर लौट कर देखेगा भी नहीं। यह क्षुद्र सा चारों तरफ जो है, यह डरा देता है, तो उस विराट के सामने खड़े होने की क्षमता नहीं होगी। और फिर अगर परमात्मा यही चाहता है कि लोग सब छोड़कर भाग जाएं, तो उसे सबको सबमें भेजने की जरूरत ही नहीं है।

नहीः उसकी मर्जी और मंशा कुछ और है। मर्जी और मंशा यही है कि पहले लोग क्षुद्र को, आत्माएं क्षुद्र को सहने में समर्थ हो जाएं, ताकि विराट को सह सकें। संसार सिर्फ एक प्रशिक्षण है, एक ट्रेनिंग है।

इसलिए जो ट्रेनिंग को छोड़कर भागता है, उस भगोड़े को, एस्केपिस्ट को मैं संन्यासी नहीं कहता हूं। जीवन जहां है, वहीं! संन्यासी हो गए, फिर तो भागना ही नहीं। पहले चाहे भाग भी जाते तो मैं माफ कर देता। संन्यासी हो गए, फिर तो भागना ही नहीं। फिर तो वहीं जम कर खड़े हो जाना। क्योंकि फिर संन्यास अगर संसार के सामने भागता हो, तो कौन कमजोर है? कौन सबल है? फिर तो मैं कहता हूं, अगर इतना कमजोर है कि भागना पड़ता है, तो फिर संसार ही ठीक। फिर सबल को ही स्वीकार करना उचित है।

तो पहली तो बात मेरे संन्यास की यह है कि भागना मत। जहां खड़े हैं, वहीं, जिंदगी के सघन में पैर जमा कर! लेकिन उसे प्रशिक्षण बना लेना। उस सबसे सीखना। उस सबसे जागना। उस सबको अवसर बना लेना। पत्नी होगी पास, भागना मत। क्योंकि पत्नी से भाग कर कोई स्त्री से नहीं भाग सकता। पत्नी से भागना तो बहुत आसान है। पत्नी से तो वैसे ही भागने का मन पैदा हो जाता है। पति से भागने का मन पैदा हो जाता है। जिसके पास हम होते हैं। उससे ऊब जाते हैं। नये की तलाश मन करता है।

पत्नी से भागना बहुत आसान है; भाग जाएं! स्त्री से न भाग पाएंगे। और जब पत्नी जैसी स्त्री को निकट पाकर स्त्री से मुक्त न हो सके, तो फिर कब मुक्त हो सकेंगे? अगर पति जैसे प्रीतिकार मित्र को निकट पाकर पुरूष की कामना से मुक्ति न मिली, तो फिर छोड़ कर कभी न मिल सकेगी।

इस देश ने पति और पत्नी को सिर्फ काम के उपकरण नहीं समझा; सेक्स, वासना का साधन नहीं समझा है। इस मुल्क की गहरी समझ और भी, कुछ और है। और वह यह है कि पति-पत्नी अंततः-प्रारंभ करें वासना से-अंत हो जाएं निर्वासना पर। एक-दूसरे को सहयोगी बनें। स्त्री सहयोगी बने पुरूष को कि पुरूष स्त्री से मुक्त हो सके। पुरुष सहयोगी बने पत्नी को कि पत्नी पुरुष की कामना से मुक्त हो सके। ये अगर सहयोगी बन जाएं, तो बहुत शीघ्र निर्वासना को उपलब्ध हो सकते हैं।

लेकिन ये इसमें सहयोगी नहीं बनते। पत्नी डरती है कि कहीं पुरुष निर्वासना को उपलब्ध न हो जाए। इसलिए डरी रहती है। अगर मंदिर जाता है, तो ज्यादा चैंकती है; सिनेमा जाता है, तो विश्राम करती है। चोर हो जाए, समझ में आता है; प्रार्थना, भजन-कीर्तन करने लगे, समझ में बिलकुल नहीं आता है। खतरा है। पति भी डरता है कि पत्नी कहीं निर्वासना में न चली जाए।

अजीब हैं हम! हम एक-दूसरे का शोषण कर रहे हैं, इसलिए इतने भयभीत हैं। हम एक-दूसरे के मित्र नहीं है! क्योंकि मित्र तो वही है, जो वासना के बाहर ले जाए। क्योंकि वासना दुख है और वासना दुष्पूर है! वासना कभी भरेगी नहीं। वासना में हम ही मिट जाएंगे, वासना नहीं मिटेगी। तो मित्र तो वही है, पति तो वही है, पत्नी तो वही है, मित्र तो वहीं है, जो वासना से मुक्त करने में साथी बने। और शीघ्रता से यह हो सकता है।

इसलिए मैं कहता हूं, पत्नी को मत छोड़ो, पति को मत छोड़ो; किसी को मत छोड़ो। इस प्रशिक्षण का उपयोग करो। हां, इसका उपयोग करो परमात्मा तक पहुंचने के लिए। संसार को दुश्मन मत बनाओ; बनाओ सीढ़ी। चढ़ो उस पर; उठो उससे। उससे ही उठ कर परमात्मा को छुओ। और संसार सीढ़ी बनने के लिए है।

-ओशो
पुस्तकः मैं कहता आंखन देखी
प्रवचन माला 37 से संकलित
पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री एवं पुस्तक में उपलब्ध है