Osho World Online Hindi Magazine :: September 2012
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युवा-ज़ोन
युवा और संघर्ष

"युवक का कोई भी संबंध शरीर की अवस्था से नहीं है। उम्र से युवा होने का कोई भी संबंध नहीं है। बूढ़े भी युवा हो सकते हैं, और युवा भी बूढ़े हो सकते हैं। ऐसा कभी-कभी होता है कि युवा भी बूढ़े हो सकते हैं। ऐसा कभी-कभी होता है कि बूढ़े युवा हों, ऐसा अक्सर होता है कि युवा बूढ़े होते हैं।"

-ओशो

हिंदुस्तान की जवानी तमाशबीन है। हम देखते रहते हैं खड़े होकर, जीवन का जैसे कोई जुलूस जा रहा है। पैसिव, रुके हैं, देख रहे हैं; कुछ भी हो रहा है। सारे मुल्क में कुछ भी हो रहा है। शोषण हो रहा है, जवान खड़ा हुआ देख रहा है! अन्याय हो रहा है, जवान खड़ा हुआ देख रहा है! बेवकूफियां हो रही हैं, जवान खड़ा देख रहा है! बुद्धिहीन लोग देश को नेतृत्व दे रहे हैं, जवान खड़ा हुआ देख रहा है! जड़ता धर्मगुरु बन कर बैठी है, जवान खड़ा हुआ देख रहा है! सारे मुल्कों के हितों को नष्ट किया जा रहा है, और जवान खड़ा हुआ देख रहा है! यह कैसी जवानी है?

कुरूपता से लड़ना पड़ेगा, असौंदर्य से लड़ना पड़ेगा, जिंदगी को विकृत करने वाले तत्वों से लड़ना पडेगा, जिंदगी के खून को पीने वाले तत्वों से लड़ना पड़ेगा। तो आदमी जवान होता है। वह सागर की लहरों पर जीता है फिर। फिर तूफानों में जीता है। फिर आकाश में उसकी उड़ान होनी शुरू होती है। लेकिन क्या लड़ोगे तुम? व्यक्तिगत लड़ाई ही नहीं है कोई, सामूहिक लड़ाई की तो बात अलग है। कोई फाइट नहीं है! और बिना फाइट के, बिना लड़ाई के जवानी निखरती नहीं। जवानी सदा लड़ती है और निखरती है। जितना लड़ती है, उतना निखरती है। सुंदर के लिए, सत्य के लिए, शिव के लिए जवानी जितनी लड़ती है, उतनी निखरती है। लेकिन क्या लड़ोगे?

तुम्हारे पिता आ जाएंगे, तुम्हारी गर्दन में रस्सी डाल कर कहेंगे-इस लड़की से विवाह कर लो! और तुम घोड़े पर बैठे जाओगे। तुम जवान हो? और तुम्हारे बाप जाकर कहेंगे कि दस हजार रूपया लेंगे इस लड़की से! और तुम मजे से मन में गिनती करोगे कि दस हजार में स्कूटर खरीदें कि क्या करें? तुम जवान हो? ऐसी जवानी दो कौड़ी की जवानी है। जिस लड़की को तुमने कभी चाहा नहीं, जिस लड़की को तुमने कभी प्रेम नहीं किया, जिस लड़के को तुमने कभी नहीं चाहा और जिस लड़के को तुमने कभी छुआ नहीं, उस लड़के से विवाह करने के लिए या उस लड़की से विवाह करने के लिए तुम पैसे के लिए राजी हो रहे हो? समाज की व्यवस्था के लिए राजी हो रहे हो? तो तुम जवान नहीं हो। तुम्हारी जिंदगी में कभी भी वे फूल नहीं खिलेंगे जो युवा मस्तिष्क जानता है। तुम कभी उन आकाश को नहीं छुओगे जो युवा मस्तिष्क छूता है। तुम हो ही नहीं तुम एक मिट्टी के लोंदे हो, जिसको कहीं भी सरकाया जा रहा है और कहीं भी लिया जा रहा है। तुम चुपचाप मानते चले जा रहे हो कुछ भी! न तुम्हारे मन में संदेह है, न जिज्ञासा है, न संघर्ष है, न पुकार है, न पूछ है, न इंक्वायरी है-कि यह क्या हो रहा है? कुछ भी हो रहा है, हम देख रहे हैं खड़े होकर! नही, ऐसे नहीं जवानी पैदा होती है।

इसलिए दूसरा सूत्र तुमसे कहता हूं और वह यह कि जवानी संघर्ष से पैदा होती है। जवानी संघर्ष से पैदा होती है। संघर्ष गलत के लिए भी हो सकता है, और तब जवानी कुरूप हो जाती है। संघर्ष बुरे के लिए भी हो सकता है, तब जवानी विकृत हो जाती है। संघर्ष अंधेरे के लिए भी हो सकता है, तब जवानी आत्मघात कर लेती है। लेकिन संघर्ष जब सत्य के लिए, सुदंर के लिए, श्रेष्ठ के लिए होता है, संघर्ष जब परमात्मा के लिए होता है, संघर्ष जब जीवन के लिए होता है, तब जवानी सुदंर, स्वस्थ, सत्य होती चली जाती है।

हम जिसके लिए लड़ते हैं, वही हम हो जाते हैं। इसे ध्यान में रख लेनाः हम जिसके लिए लड़ते हैं, अंततः हम वहीं हो जाते हैं। लड़ो सुंदर के लिए, और तुम सुन्दर हो जाओगे। लड़ो सत्य के लिए, और तुम सत्य हो जाओगे। लड़ो श्रेष्ठ के लिए, और तुम श्रेष्ठ हो जाओगे। और मत लड़ो-तुम खड़े-खड़े सड़ोगे और मर जाओगे और कुछ भी नहीं होओगे। जिंदगी संघर्ष है और जिंदगी संघर्ष से ही पैदा होती है। फिर जैसा हम संघर्ष करते हैं, हम वैसे ही हो जाते हैं।

हिंदुस्तान में कोई लड़ाई नहीं है, कोई फाइट नहीं है! हिंदुस्तान के मन में कोई भी लड़ाई नहीं है! सब कुछ हो रहा है, अजीब हो रहा है। हम सब जानते हैं, देखते हैं-सब हो रहा है। और होने दे रहे हैं! अगर हिंदुस्तान की जवानी खड़ी हो जाए तो हिंदुस्तान में फिर ये नासमझियां नहीं हो सकती जो हो रही हैं। एक आवाज में टूट जाएगी। चूंकि जवान नहीं है, इसलिए कुछ भी हो रहा है।

तो मैं यह दूसरी बात कहता हूँ लड़ाई के मौके खोजना-सत्य के लिए, सच्चाई के लिए, ईमानदारी के लिए। अगर अभी नहीं लड़ सकोगे तो बुढ़ापे में कभी नहीं लड़ सकोगे। अभी तो मौका है कि ताकत है, अभी मौका है कि अनुभव ने तुम्हें बेईमान नहीं बनाया है। अभी तुम निर्दोष हो, अभी तुम लड़ सकते हो, अभी तुम्हारे भीतर आवाज उठ सकती है कि यह गलत है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ेगी, अनुभव बढ़ेगा, चालाकी बढ़ेगी।

अनुभव से ज्ञान नहीं बढ़ता, सिर्फ कनिंगनेस बढ़ती है, सिर्फ चालाकी बढ़ती है।

अनुभव आदमी चालाक हो जाता है। उसकी लड़ाई कमजोर पड़ जाती है, वह अपना हित देखने लगता है-कि हमें क्या मतलब है! अपनी फिक्र करो, इतनी बड़ी दुनिया की झंझट में मत पड़ो।

जवान आदमी जूझ सकता है, अभी उसे कुछ पता नहीं । अभी उसे अनुभव नहीं है चालाकियों का।

इसके पहले कि चालाकियों में तुम दीक्षित हो जाओं और तुम्हारे उपकुलपति और तुम्हारे शिक्षक और तुम्हारे मां-बाप दीक्षांत समारोह में तुम्हें चालाकियों को सर्टिफिकेट दे दें, उसके पहले लड़ना। शायद लडाई तुम्हारी जारी रहे, तो तुम चालाकियों में नहीं, जीवन के अनुभवों में दीक्षित हो जाओ। और शायद लड़ाई तुम्हारी जारी रहे, तो वह जो छिपी है भीतर आत्मा, वह निखर आए, वह प्रकट हो जाए, उसके दर्शन तुम्हें हो जाएं। और जिस दिन कोई आदमी अपने भीतर छिपे हुए जीवन का पूरा अनुभव करता है, उसी दिन पूरे अर्थों में जीवित होता है।

और मैं कहता हूं, जो आदमी एक दफें एक क्षण को भी पूरे अर्थों में जीवन का रस जान लेता है, उसकी फिर कोई मृत्यु नहीं होती। वह अमृत से संबंधित हो जाता है।

युवा होना अमृत से संबंधित होने का मार्ग है।

युवा होना आत्मा की खोज है।

युवा होना परमात्मा के मंदिर पर प्रार्थना है।

-ओशो
पुस्तकः संभोग से समाधि की ओर
प्रवचन माला 11 से संकलित
पूरा प्रवचन एम.पी. थ्री एवं पुस्तक में उपलब्ध है।